जो मनका याद रखता है
त्सेमिन्यू, नागालैंड में, दो लोग और एक धीरे-धीरे मिटती कला। रुनोले, जिन्होंने पैंतीस साल चूल्हे की रोशनी में मनके पिरोए हैं, और अग्वासिन, एक युवा रेस्तराँ मालिक जिसने इस कला को पूरी तरह खोने से पहले थाम लिया। इन दोनों के बीच एक कहानी है, इस बारे में कि हम क्या आगे ले जाते हैं, क्या छोड़ देते हैं, और क्या होता है जब परंपरा को नए हाथ मिलते हैं।

कहानीकार : केसोञ्ये काथ
Himal Prakriti Storytelling Fellow
सेंडेन्यू गाँव, जिला त्सेमिन्यू
नागालैण्ड
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जब रुनोले लकड़ियाँ व्यवस्थित करने के लिए झुकी, तो मैंने धीरे से पूछा, “अन्यू, आप कब से पारंपरिक गहने बनाती आ रही हैं?”
बिना ऊपर देखे, वह आग को सुलगाती रही और बोली, “शादी से पहले मैंने कभी गहने बनाने के बारे में सोचा ही नहीं था। यह बात मेरे मन में कभी आई ही नहीं। शादी को अब करीब पैंतीस साल हो गए हैं, और शायद उतने ही साल से मैं गहने भी बनाती आ रही हूँ। दरअसल यह सब तब शुरू हुआ जब मैं माँ बनी। बच्चों के लिए छोटी-छोटी चीज़ें बनानी थीं, बालियाँ, हार, और ऐसे ही धीरे-धीरे यह मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बनता गया। कोई योजना नहीं थी, कोई इरादा नहीं था, बस होता चला गया।”
एक वक़्त था जब मनकों का बोझ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सहज ही घुला हुआ था। खेतों में जाते वक़्त गले में, रसोई में काम करते हुए कलाई पर, और दिन की धूप में चलते-फिरते उनकी चमक बिखरती रहती थी। आज वे मनके तह करके रख दिए गए हैं, निकाले जाते हैं तो बस तब, जब गाँव किसी खास मौके पर एक साथ जुटता है। उनकी कहानियाँ अब पहले से कम पहनी जाती हैं।
कई हफ्तों से मेरे मन में था कि रुनोले अन्यू के पास बैठूँ। पैंतीस साल से वह मनकों में यादें पिरोती आई हैं, एक ऐसी कला को थामे हुए जो अब चुपचाप कम होते हाथों से फिसलती जा रही है। लेकिन मेरे दिन बिखरे हुए थे, मास्टर्स की ऑनलाइन क्लासेस और अपनी बेटी की देखभाल की छोटी-छोटी, अनवरत लय के बीच बँटे हुए। वक़्त टुकड़ों में गुज़रता रहा, और वह मुलाकात इंतज़ार करती रही।

उस दोपहर, बिना किसी खास सोच के, मैंने फोन उठाया और उन्हें कॉल किया। “अन्यू, क्या आप घर पर हैं?”
दूसरी तरफ एक छोटी-सी खामोशी थी, उनकी आवाज़ के पीछे हलचल की धीमी-सी आहट। “हाँ,” उन्होंने बस इतना कहा।
ज़्यादा सोचे बिना, मैंने चाबी उठाई और निकल पड़ी। रास्ते में मन में यह सवाल उठा कि कहीं मैंने बहुत देर तो नहीं कर दी, कहीं वे कहानियाँ जो मैं सुनना चाहती थी, धुँधली तो नहीं पड़ने लगी हैं, ठीक उन मनकों की तरह जो अब लकड़ी के संदूकों और शांत कोनों में दुबके पड़े हैं। लेकिन उस दिन में कुछ था, दोपहर की वह स्थिरता, अधूरे इरादे का वह खिंचाव, जो कह रहा था कि अब चलो।
और मैं चल पड़ी, अपने साथ वे सवाल लेकर जो काफी समय से इंतज़ार में थे, और शायद कुछ कहानियाँ भी, जो खुद भी इंतज़ार कर रही थीं।
रुनोले अभी-अभी त्सेमिन्यू गाँव के सामुदायिक तालाब पर कपड़े धोकर लौटी थीं। दोपहर के ढाई बज चुके थे। सूरज उनके घर पर सुनहरी आकृतियाँ बना रहा था, हर कोने को एक शांत सुंदरता और गहराई से भर रहा था। यहाँ सर्दियों के दिन छोटे होते हैं, और हमारे इस हिस्से में सूरज जल्दी विदा ले लेता है, फिर भी जब हम उनके आँगन में बैठे तो आसमान अभी भी गर्म और स्वागत करने वाला लग रहा था।

“आज अचानक गाँव आना कैसे हुआ?” अन्यू रुनोले ने मुस्कुराते हुए पूछा, जैसे ही वह मोरा पर बैठीं, उस बाँस की बुनी हुई छोटी चौकी पर, जो उनके बैठते ही धीरे से चरमराई।
वह कुछ ही दिन पहले हॉर्नबिल फेस्टिवल, 2025 से लौटी थीं, जहाँ वह और इक्यावन अन्य लोग किसामा, नागा हेरिटेज विलेज में रेंगमा समुदाय का प्रतिनिधित्व करने गए थे।
“आह, पानी में रहकर दिन भर कपड़े धोने के बाद यह धूप कितनी सुकून देती है,” अन्यू ने एक लंबी साँस लेते हुए कहा, खुद को धीरे से फैलाते हुए, जैसे धूप को अपने ऊपर उतरने दे रही हों। उनकी आवाज़ में उस सफर के निशान थे, दिनों तक गाने और नाचने से भरी हुई, और कड़कड़ाती सर्दी में लंबे घंटों से थकी हुई। हमारे पास धूप में पसरे हुए रखे थे एक पारंपरिक कूटने का बिछौना और हाथ से बुनी हुई टोकरियाँ। वे भी उत्सव तक गई थीं, रेंगमा मोरुंग में काम आई थीं, और अब चुपचाप घर वापस आकर विश्राम कर रही थीं।

मोरुंग कभी नागा गाँव के जीवन का केंद्र हुआ करता था, एक पारंपरिक छात्रावास जहाँ शादी से पहले युवा और अविवाहित पुरुष एक साथ रहते थे। यह सिर्फ सोने की जगह नहीं थी। यह वह जगह थी जहाँ वे जीना सीखते थे। शामें कहानियों, सीख और शांत अवलोकन से भरी होती थीं, बड़े-बुज़ुर्ग बोलते, हुनर सीखे जाते, और परंपराएँ आगे बढ़ती थीं, बिना कभी यह महसूस कराए कि यह कोई पाठ है। यहीं अनुशासन आकार लेता था, यहीं मूल्य जड़ें जमाते थे, और यहीं पहचान धीरे-धीरे पनपती थी। समय के साथ, मोरुंग बदल गया। अब वह उस तरह नहीं रहा जैसा कभी था। आज वह निवास से ज़्यादा एक याद की तरह खड़ा है, एक ऐसी संरचना जो अपने भीतर उस सब की स्मृति समेटे हुए है जो कभी था। फिर भी इस शांत भूमिका में भी, मोरुंग का बोझ कम नहीं हुआ। यह आज भी इतिहास और विरासत का एक सशक्त प्रतीक बना हुआ है, नागालैंड के गाँवों, जनजातियों और समुदायों की कहानियों और साझे अतीत को एक धागे में पिरोए हुए।

ढलती रोशनी का होश आते ही मैंने बातचीत को जल्दी से घर के अंदर की तरफ मोड़ा। सूरज पहाड़ियों के पीछे छुपे, उससे पहले हम उनकी रसोई की गर्माहट में आ गए, जहाँ चूल्हे की आँच ठंड के खिलाफ धीमी-धीमी दमक रही थी।

फोटो: केसोन्ये काथ
वह आग के थोड़ा और करीब झुकीं, लकड़ियों को सही जगह सरकाते हुए, फिर बोलती रहीं, जैसे खुद से ही सोच रही हों। “मुझे ठीक से याद नहीं कि माँ से सीखा हो,” उन्होंने कहा। “वो तो मेरी चाचियाँ थीं… शायद उन्हीं से देखते-देखते सीख लिया।”
वह एक पल के लिए रुकीं, फिर बोलीं, “उन्होंने कभी मुझे बिठाकर ठीक से सिखाया नहीं। मैं बस उन्हें देखती रहती, पास बैठी रहती, और धीरे-धीरे खुद करने की कोशिश करती। शुरुआत में तो बस यही था कि मनके सही हों, बिना गड़बड़ाए एक साथ पिरोए जाएँ। लेकिन धीरे-धीरे वे बताने लगीं कि रंगों का क्या मतलब होता है, कौन सा मनका कहाँ लगता है, और यह क्यों ज़रूरी है।”
बोलते-बोलते उनके हाथ खुद-ब-खुद चलने लगे, जैसे अभी भी कोई अदृश्य धागा पिरो रही हों। “वक़्त लगा। बहुत धैर्य लगा। लेकिन धीरे-धीरे मुझे अच्छा लगने लगा… और फिर मैं करती ही चली गई।”
वह हल्के से मुस्कुराईं। “जो काम मैंने अपने बच्चों के लिए शुरू किया था… वह कुछ और ही बन गया। उसने मुझे फिर से अपने परिवार से जोड़ा, अपने लोगों से… उस जगह से जहाँ से मैं आती हूँ।”

आग भड़की, धीमी-धीमी चटखती हुई। मैं चूल्हे के और करीब झुकी और फिर से पूछा,
“गहने बनाना आपके लिए क्या मायने रखता है, एक कला के रूप में भी, और अपनी ज़िंदगी के हिस्से के रूप में भी?”
वह रुकीं, हाथ घुटनों पर टिके हुए।
“गहने हमेशा से हमारी पहचान का एक अहम हिस्सा रहे हैं,” उन्होंने कहा। “यह कोई ऐसी चीज़ नहीं थी जो हम सिर्फ त्योहारों पर पहनते थे। यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था।”
“जहाँ तक मुझे याद है,” रुनोले ने चूल्हे के पास बैठते हुए कहा, “माँ के ज़माने में औरतें त्यू-सिन जैसे बाजूबंद और हार खेतों में जाते वक़्त भी पहना करती थीं।”

वह आगे झुकीं और धीरे से फूँक मारी, अंगारे और चमक उठे, छत की तरफ धुएँ की पतली लकीरें उठने लगीं।
“काम करते वक़्त वे गहनों को कपड़े में लपेटकर अपनी बाँस की टोकरियों में रख देती थीं,” उन्होंने एक और लकड़ी आग में डालते हुए कहा। “और घर आने से पहले फिर पहन लेती थीं। जो हम आज खास मौकों के लिए बचाकर रखते हैं, वह कभी हर रोज़ पहना जाता था, पहनावे और पहचान दोनों में बुना हुआ।”
एक मुर्गी रसोई में घुस आई, दरवाज़े के पास बिखरे दानों को चोंच मारने लगी। बिना अपनी बात रोके, “शू,” रुनोले ने पैर से उसे भगा दिया।
“यहाँ तक कि जिन, यानी बाजूबंद, धान कूटते वक़्त भी पहने जाते थे,” उन्होंने मुस्कुराते हुए जोड़ा। “यह सौभाग्य की निशानी थी।”
मैंने पूछा, “अन्यू, क्या अलग-अलग उम्र की औरतों के गहने अलग-अलग होते थे?”
“हाँ, बिल्कुल,” उन्होंने जवाब दिया, एक बर्तन उठाते हुए सिंक पर धोने लगीं। पानी की हल्की छपछपाहट के बीच वह बोलती रहीं।
औरतों के लिए गहने सिर्फ सजावट नहीं थे, वे जीवन के पड़ावों की निशानी थे। रेंगमा समुदाय में, बालियाँ हर उम्र को पहचान देती थीं, एक औरत के सफर को वक़्त के साथ-साथ दर्ज करती थीं।
“जन्म से पाँच-छह महीने तक, बच्ची को न्येश्ये बालियाँ पहनाई जाती थीं। आठ से दस साल की उम्र में, न्येसिन। किशोरावस्था में आने पर, न्ये त्यूत्से। और जब वह विवाह योग्य हो जाती, तो न्ये त्यूज़ि।”

उन्होंने बर्तन एक तरफ रखा और उँगलियों पर पड़ाव गिनने लगीं, बीच में आग चटखती रही।
“एक औरत अपनी पूरी ज़िंदगी में छह तरह की बालियाँ पहनती है। न्ये-सो बालियाँ खास थीं और हर कोई इन्हें नहीं पहन सकता था। सिर्फ संपन्न औरतें पहनती थीं। वे जिनके पास ज़्यादा ज़मीन थी, ज़्यादा मवेशी थे, और बड़े खेत थे।”
जैसे ही वह रसोई में इधर-उधर आती-जाती रहीं, चूल्हे की बिखरी राख साफ करते हुए, मैं गर्माहट के और करीब सिमट आई और पूछा,
“पुराने ज़माने में गहने बनाने की जानकारी आगे कैसे बढ़ती थी?”

वह चावल चलाने के लिए रुकीं, फिर सोचते हुए बोलीं,
“शायद मेरे पास सब जवाब न हों। लेकिन उस वक़्त गहने और पारंपरिक पहनावा आसानी से नहीं मिलता था। ज़िंदगी कठिन थी।”
उन्होंने कलछी रख दी और अपने रंग-बिरंगे ब्लाउज़ पर हाथ पोंछे।
“ये चीज़ें ज़्यादातर उन्हीं के लिए थीं जो इन्हें खरीद सकते थे। तो कौन क्या पहनेगा, यह बहुत तय था, यह आपकी हैसियत पर निर्भर करता था।”
मैंने पूछा, “बचपन से जो आपने देखा है, उसमें क्या आपको लगता है कि आज गहनों का इस्तेमाल बदल गया है?”
रुनोले ने सिर हिलाया, फिर से आग में फूँक मारी जैसे लपटें धीमी पड़ रही थीं।
“पहले औरतें गहने भरपूर और गर्व से पहनती थीं। लगभग सभी कोन्मी-त्यू और त्यू-ज़ि पहनते थे। मर्द भी पहनते थे।”

उन्होंने एक और मुर्गी को तेज़ तालियाँ बजाकर भगाया।
“अब,” वह बोलती रहीं, “हम इन्हें सिर्फ खास दिनों पर पहनते हैं, न्गादा जैसे त्योहारों पर, हमारे फसल उत्सव पर।”
जब मैंने सामग्री के बारे में पूछा, तो वह धीरे से हँसीं, एक थाली माँजते हुए।
“पुराने ज़माने में मनके असम के व्यापारियों से आते थे। मिलना मुश्किल था। लोग जो भी मिल जाए उसी से काम चला लेते थे, चाहे मनके ऊबड़-खाबड़ ही क्यों न हों।”
उन्होंने थाली रैक पर सूखने के लिए रख दी।
“अब प्लास्टिक के मनके हर जगह मिलते हैं। हम अच्छे से अच्छा चुनते हैं। मैं अपनी दिवंगत माँ का त्यू-रो हार तीन-चार बार फिर से बना चुकी हूँ, जब भी बेहतर मनके मिलते हैं, पुराने बदल देती हूँ।”

“इतने बदलावों को अपनी आँखों से देखने वाले के लिए,” मैंने पूछा, “मनको की मौलिकता में आए इस बदलाव को आप किस नज़र से देखती हैं?”
रुनोले चुप हो गईं। वह एक पल के लिए वहीं ठहर गईं, आग की लपटों में खोई हुई-सी।
“आज के गहने देखने में भले ही सुंदर लगते हों,” उन्होंने धीरे से कहा। “पर पुराने, बेतरतीब मनको की अपनी ही एक सुंदरता है। उनमें एक भार है। उनमें बसी हैं कहानियाँ — हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, और वह संस्कृति जिसने हमें गढ़ा है।”

तब मैंने उनसे पूछा,
“पैंतीस साल में जब से आप गहने बना रही हैं, क्या कभी कोई सीखने आया?”
वह हँसीं, फिर से हाथ पोंछते हुए।
“नहीं। लोग गहने लाते हैं ठीक करवाने के लिए या नए सिरे से बनवाने के लिए, हाँ। लेकिन सीखने कोई नहीं आता।”
बदलते फैशन और नए ज़माने के डिज़ाइनों के बारे में पूछा कि क्या ये पारंपरिक गहनों के लिए खतरा हैं।
“हाँ,” उन्होंने दृढ़ता से कहा, लकड़ियाँ फिर से करीने से रखते हुए।
“इसीलिए हम एक-दूसरे को चेताते रहते हैं कि अपने गहनों का असली मतलब न बदलें। हमारे गाँव में, चर्च में भी, हमने लोगों से कहा है कि ऐसे गहने न बनाएँ जो सिर्फ चलन के लिए हों।”

उन्होंने जोड़ा, आखिरी बार मुर्गियों को भगाते हुए,
“जो गहने सिर्फ दिखावे के लिए बनाए जाएँ, उन्हें हम ठीक नहीं मानते।”
अंत में मैंने पूछा, “क्या आपको कभी डर लगता है कि रेंगमा और नागा के पारंपरिक गहने कहीं लुप्त न हो जाएँ?”
रुनोले ने धीरे से सिर हिलाया, आग पर रखे बर्तन को ठीक करते हुए।
“गहने शायद बचे रहें, अगर आगे पहुँचते रहें,” उन्होंने कहा। “लेकिन इन्हें बनाने की कला खो सकती है, अगर इसे अपनाया न जाए और अभ्यास न किया जाए।”
उन्होंने मेरी तरफ देखा, उनका चेहरा आग की रोशनी में नहाया हुआ था।
“इसे बचाने का एक ही रास्ता है, अपने बच्चों को सिखाना, इसका मतलब, इसका इस्तेमाल, और इसे बनाना, ताकि वे इसे आगे ले जा सकें।”
आग धीमे-धीमे चटखती रही, मुर्गियाँ बाहर जाकर बैठ गईं, और शाम चुपचाप रसोई में उतर आई, अपने साथ उनके शब्द लेकर। जब मैंने धुँधले होते क्षितिज की तरफ देखा, तो मन में एक सवाल उठा, हम युवा पीढ़ी, अपनी संस्कृति की इस धीरे-धीरे मिटती कला को आगे कैसे ले जा रहे हैं?

हाथों का बदलाव
जब मैं केपवुशेन का पहुँची, जो त्सेमिन्यू के दो युवा उद्यमियों द्वारा पाला-पोसा एक रेस्तराँ है, दोपहर के तीन बज चुके थे। सर्दियों की धूप त्सेमिन्यू न्यू टाउन पर सुनहरी आभा बिखेर रही थी, छतों और नीचे घुमावदार सड़कों को गर्माहट दे रही थी। अग्वासिन अभी भी रसोई में था, गहरे रंग का एप्रन पहने, चुपचाप चूल्हों और काउंटरों के बीच आता-जाता। कुछ ग्राहक अपने ऑर्डर का इंतज़ार कर रहे थे, रेस्तराँ शांत था फिर भी बर्तनों की हल्की खनखनाहट और धीमी बातचीत से जीवंत था।
रेस्तराँ चलाने वाले उद्यमी की ज़िंदगी से परे, अग्वासिन, जो अपनी तीसवीं के मध्य में है, मनकों के गहने बनाने में अपना अर्थ और सुकून ढूँढता है।

हम बालकनी में बैठे, जहाँ से त्सेमिन्यू शहर का विस्तृत नज़ारा दिखता था। जगह अपने नाम पर खरी उतरती थी, दोस्ती की जगह। अग्वासिन अपनी कुर्सी पर टिककर बैठा था, शांत, आश्वस्त, और भीतर से एक हल्की उम्मीद लिए हुए।
“मैं हमेशा से मनके के गहनों की तरफ खिंचता रहा हूँ,” उसने कहा। “जब छोटा था तब भी मैंने देखा था कि इन्हें बनाने वाले बहुत कम बचे हैं। वह कमी मेरे मन में कहीं टिकी रह गई।”

उसने 2022 में इस कला को गंभीरता से सीखना शुरू किया।
“जब मैंने शुरुआत की,” उसने समझाया, “मैंने इसे कभी व्यवसाय की तरह नहीं देखा। मेरे लिए यह एक ऐसी जानकारी थी जिसे सीखना और आगे पहुँचाना ज़रूरी था।”
शुरुआत में उसका ध्यान समकालीन डिज़ाइनों पर था, ब्रोच और हार जो पुराने मनकों को आधुनिक रूपों के साथ मिलाते थे, ताकि तेज़ फैशन में जीने वाले युवाओं की ज़रूरतें पूरी हो सकें।
“मैं चाहता था कि अतीत को वर्तमान में लेकर आऊँ,” उसने कहा। “कुछ ऐसा बनाऊँ जिसे युवा पहन सकें और परंपरा से दूरी महसूस न करें।”

रेंगमा और नागा समुदायों में, पारंपरिक मनके के गहने हमेशा से महँगे रहे हैं, सामग्री में भी और अर्थ में भी। आज के कई युवा, जो अपनी स्वतंत्रता की राह पर हैं, अक्सर किफ़ायती विकल्प तलाशते हैं।
“इसीलिए मेरे ब्रोच काम करते हैं,” उसने समझाया। “ये पहुँच में हैं। युवा इन्हें खरीद सकते हैं, और हर रोज़ पहन सकते हैं, औपचारिक कपड़ों के साथ, साधारण कपड़ों के साथ, किसी के भी साथ।”

फिर भी यह कला अपनी चुनौतियाँ लेकर आती है।
“माँग मौसमी है,” उसने माना। “और पारंपरिक मनके महँगे हैं। किफ़ायत और प्रामाणिकता के बीच संतुलन बनाना हमेशा मुश्किल होता है।”
इसके बावजूद, अग्वासिन ने एक बदलाव महसूस किया है, एक ऐसा बदलाव जो उसे उम्मीद देता है।
“पिछले कुछ सालों में जागरूकता बढ़ी है,” उसने कहा। “सोशल मीडिया के ज़रिए, हॉर्नबिल जैसे त्योहारों के ज़रिए, युवा अपनी संस्कृति को फिर से देख रहे हैं। अब दिलचस्पी खाली नहीं रही।”
वह एक पल के लिए रुका, फिर बोला,
“पहले ज़्यादातर लोग समकालीन गहने चाहते थे। अब कई लोग पारंपरिक गहनों के बारे में पूछ रहे हैं।”
इस बदलाव ने उसके काम को नया रूप दिया है।
“मेरा ध्यान धीरे-धीरे फिर से पारंपरिक मनके के गहनों की तरफ जा रहा है,” उसने कहा। “क्योंकि रुचि वापस आ रही है।”
लेकिन जागरूकता, उसका मानना है, अभी भी अधूरी है।

“बहुत से लोग गहने पहनते हैं बिना यह जाने कि उनका मतलब क्या है,” उसने कहा। “यह मुझे चिंता में डालता है।”
उसके लिए गहने बेचना एक सिखाने का पल भी है।
“जब भी युवा मुझसे खरीदते हैं, मैं ज़रूर बताता हूँ कि इसका मतलब क्या है, इसे क्यों पहना जाता है, यह क्या दर्शाता है। मुझे ज़िम्मेदारी महसूस होती है।”

वह हल्के से मुस्कुराया।
“इस कला के ज़रिए मैंने अपनी संस्कृति के बारे में बहुत कुछ सीखा है। अब इसे बचाना मेरा फ़र्ज़ लगता है।”
याद रखने वाले हाथों से, फिर से गढ़ने वाले हाथों तक
रुनोले की रसोई में, मनके स्मृति हैं, जतन से संभाले हुए, कपड़े में लपेटे हुए, भुलाए जाने से बचाए हुए। उनके चूल्हे के पास आग धीमी और स्थिर जलती है, माँओं से बेटियों तक, खेतों से घरों तक कहानियाँ पहुँचाती हुई।
अग्वासिन की कार्यशाला और रेस्तराँ में, मनके गतिशीलता हैं, नए रूप में ढले हुए, फिर से कल्पित, रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पहने जाने वाले। उसकी बालकनी से शहर आगे फैला है, संभावनाओं और बदलाव से भरा हुआ।
इन दोनों के बीच एक साझा धागा है।
रुनोले अतीत को श्रद्धा से थामे हैं, यह मानते हुए कि अस्तित्व सिखाने में है, अर्थ, विधि और कला के धैर्य को आगे पहुँचाने में।
अग्वासिन भविष्य को उम्मीद से थामे है, यह मानते हुए कि अस्तित्व प्रासंगिकता में है, परंपरा को साँस लेने देने में, बदलने देने में, और फिर से पहने जाने देने में।
एक ने यह कला ज़रूरत से सीखी, अपने बच्चों के लिए।
दूसरे ने यह कला अभाव से सीखी, ताकि यह मिटे नहीं।
मिलकर, वे एक निरंतरता बनाते हैं।
जो मनके वे संभालते हैं, ऊबड़-खाबड़ हों या परिष्कृत, पुराने हों या नए आकार में ढले, वे महज़ आभूषण नहीं हैं। वे संग्रहालय हैं। वे खेतों और त्योहारों को याद रखते हैं, मोरुंगों और बाज़ारों को, चूल्हों और क्षितिजों को। वे पहचान का बोझ और नवीनीकरण का वादा दोनों एक साथ उठाते हैं।

जब तक ऐसे हाथ हैं जो इन्हें जतन से पिरोने को तैयार हैं, और ऐसी आवाज़ें हैं जो इनकी कहानियाँ सुनाने को तैयार हैं, ये मनके चुप नहीं होंगे।
ये याद रखेंगे।
और इनके ज़रिए, लोग भी।