• एक नदी का उत्थान और पतन

    tirthan river

    लेखक: परस राम भारती     Read this story in English तीर्थन नदी से मेरी कई निजी यादें जुड़ी हुई हैं। मेरा घर नदी से करीब 100 गज की दूरी पर ही है। बचपन से ही मैंने इस नदी में खेलना, कूदना, तैरना और मछली पकड़ना सीखा है। अपने जीवन काल में देश व प्रदेश की बहुत नदियां देखी लेकिन इस नदी का शीशे की तरह साफ पानी और यहाँ पर पाई जाने वाली ट्राउट मछली की वजह से यह अपनी विशेष पहचान रखती है। वर्ष 2015 के बाद से तो भरपूर पर्यटन सीज़न के दौरान सैलानीयों को तीर्थन नदी में फिशिंग, पिकनिक, नदी भ्रमण और रिवर क्रॉसिंग करवाना तो लगभग रोज…

  • स्पिति के लोग आज भी पत्थर खाते हैं

    लेखक: छेरिंग नोंरबु Read this story in English मेरा नाम छेरिंग नोंरबु है।  मैं ग्राम डैमुल, ज़िला – लाहौल स्पिति, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक अमची (अमची का मतलब है “सभी जीवों की माँ”) हूँ। मेरा परिवार सैकड़ों वर्षों से वंशानुगत सोवा रिग्पा (उपचारात्मक प्राचीन विज्ञान) पद्धति से उपचार व प्रचार करते आ रहा है ओर इसे संरक्षित कर रहा है। इस पद्धति के पूरे कोर्स अगर आप किसी संस्थान में करते है तो ५ वर्ष लगते हैं। परन्तु मैं बचपन से ही अपने दादा जी एवं पिता जी से भोटी भाषा लिपि के पश्चात सोवा रिग्पा के ज्ञुत झी- चार बुनियादी चिकित्सा ग्रन्थ (Secret Oral Tradition Of The Eight Branches Of The…

  • माटी के रंग – हिमालयी जड़ी बूटियों व पेड़ों से ऊन की रंगाई

    लेखिकाः बीना नित्वाल Read this story in English मेरा जन्म भोटिया परिवार में बागेश्वर जिले में हुआ। भोटिया समुदाय ऊनी कारोबार, भेड़ पालन के लिये प्रसिद्ध थे और कहा जाता था कि पूरे कुमांउ के ऊनी वस्त्र यहीं से जाते थे। मैंने बचपन में ज़्यादा खेती करना सीखा था क्योंकि हमारे पास काफी खेत थे। मैंने अपनी माँ से ऊन की प्राकृतिक रंगाई के बारे में सुना तो था पर शादी के बाद मैं जब मुनस्यारी में सरमोली आई, तभी जाकर खुद रंगाई व बुनाई का काम करने लगी। जब हम लोग रंगों के लिये पेड़ के पत्ती, फल के बखल,  जड़ी बूटी के जड़ को देखते हैं तो इनको…

  • बाघ कथा: पुरुषवाडी

    adult tiger walking on brown grass

    महाराष्ट्र के पुरुषवाडी गाँव के एक शिक्षक ने जंगली बाघों की पूजा करने की पीढ़ी-पुरानी प्रथा साझा की, जो आज भी जारी है

  • हिमालय के सिद्ध पुरुष

    लेखक: छेरिंग नोंरबु Read this story in English मेंरा नाम छेरिंग नोंरबु है।  मैं ग्राम डैमुल, ज़िला लाहौल स्पिति, हि० प्र० के निवासी हुँ।  मुझे बचपन से ही गाँव के बुज़ुर्गो के साथ बैठकर पुराने कहावतें, कहानियाँ व सांस्कृतिक के विषय पर सुनने व जानने का शौक़ था।  जब भी मुझे पाठशाला से छुट्टियाँ मिलता था मैं बुज़ुर्गों से मिलता था और उनसे अलग अलग कहानियाँ के बारे में  जानकरियाँ हासिल करते थे फिर हर शाम को दिन के आपबीती बातें अपनी डायरी में लिख देता था ताकि भविष्य में भावी पीढ़ी के साथ जानकारी साँझा कर सकूँ । मैंने गियु मम्मी के बारे में कई लोगों से  सुना परन्तु  जाने का मौक़ा नहीं मिला। कुछ…

  • एक पेड़ से आर्सी तक का सफर

    मैं इस फोटो निबन्ध के ज़रिये आप को अखरोट के पेड़ से लकड़ी के तख्ते चीरकर, उनपर नक्काशी कर, कैसे हमने आर्सी तैयार किये- इस कहानी को चित्रों में बता रहा हूँ।

  • बालक घुघूती का जीवन कौओं ने कैसे बचाया

    silhouette of bird on fence on focus photo

    आज उसी की याद में माघ के पहले दिन सारे कुमांऊ में कौव्वो को बुलाते है - “काले कव्वा- काले कव्वा, घुघूती माला खाले" करके बच्चें कौव्वों को बुलाते है।