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यातुर पेनाम – जीवितों और आत्माओं के बीच एक सेतु

कोहरे से घिरे गाँव मिद्पु में, छोटी कानाम एक पवित्र दिन पर जागती है—उसके पिता बोटयातुरकी तैयारी कर रहे हैं, जो पुरुषों को बीमारी और दुर्भाग्य से बचाने के लिए किया जाने वाला एक शक्तिशाली न्यीशी अनुष्ठान है। जब बाग से मंत्रों की गूंज उठती है और न्यूब (शामन) पूर्वजों की आत्माओं का आह्वान करता है, तब कानाम प्रकृति के हर कोने में वास करने वाली उई—आत्माओं—की अनदेखी दुनिया पर सवाल उठाने लगती है। अपने पिता की कोमल कहानी कहने की शैली के ज़रिए वह परंपराओं, लैंगिक भूमिकाओं और तानी समुदाय की पूर्वजों से जुड़ी जड़ों का अर्थ समझने लगती है। दृश्यमान और अदृश्य के बीच बसे संसार में, यातुरपेनाम आपको उस दुनिया में ले जाता है जहाँ हर फुसफुसाहट मायने रखती है, और जहाँ अनुष्ठान जीवितों और आत्माओं के बीच सेतु का काम करते हैं।

कहानीकार : ताबा डोमिना
गाँव टोरू, ज़िला पापुम पारे
,
अरुणाचल प्रदेश

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सूरज अभी उगा भी नहीं था जब सात साल की कानाम की आँख खुली।अरुणाचल प्रदेश के पापुम पारे ज़िले के एक छोटे से गाँव, मिद्पु, पर हलका-सा कोहरा छाया हुआ था। उनके पारंपरिक घर की बांस की फर्श, न्योप , चरमराहट की हल्की आवाज़ें कर रही थी, जिनमें उसकी माँ और बुआओं की धीमी बातचीत और बीच-बीच में उठती हँसी घुली हुई थी। वे सब सुबह का खाना बनाने में जुटी थीं। यही परिचित आवाज़ों का संगम और सर्द सुबह की ठंडी हवा थी, जिसने कानाम को नींद से धीरे-धीरे जगाया।

मिद्पु गाँव। फोटो: टाना ज़ेनाइट

मिद्पुगाँव न्यीशीजनजाति का घर है, जो अरुणाचल प्रदेश की सबसे बड़ी जनजाति है। इनका जीवन प्रकृति के प्रति गहरी श्रद्धा में रचा-बसा है। आत्मवादी विश्वासों से प्रेरित होकर, न्यीशी लोग प्रकृति को जीवित मानते हैं—उनका विश्वास है कि इसमें आत्माएँ बसती हैं। उनके अनुसार, इन अदृश्य शक्तियों के साथ सामंजस्य बनाए रखना व्यक्तिगत और सामाजिक कल्याण के लिए बहुत ज़रूरी है। प्राचीन रीति-रिवाज़ रोज़मर्रा के जीवन में इस तरह जुड़े हैं कि वे इंसानी और आध्यात्मिक दुनियाओं के बीच सेतु का काम करते हैं। ऐसी ही एक परंपरा यातुरपेनाम है, एक पवित्र अनुष्ठान जो कभी न्यीशी जीवन का अहम हिस्सा हुआ करता था। इसे बुरी शक्तियों को दूर करने और व्यक्ति या परिवार के स्वास्थ्य व समृद्धि की रक्षा के लिए किया जाता है। यह परंपरा आज भी इस जनजाति के प्रकृति के साथ संतुलन और सद्भाव के गहरे संकल्प को दर्शाती है।

न्यीशी पुरुष अपनी पारंपरिक पोशाक में। फोटो: ताबा डोमिना

पहले के समय में, यातुर  कई कारणों से किया जाता था—घर में प्रवेश के समय (नामा यातुर), फसल को आशीर्वाद देने के लिए, या किसी महत्वपूर्ण यात्रा पर निकलने से पहले, जहाँ सुरक्षा और सफलता की कामना होती थी। योद्धा और शिकारी युद्ध और शिकार से पहले यातुर करते थे, ताकत और सुरक्षा के लिए दिव्य कृपा माँगते थे। विभिन्न प्रकारों में से, बोट यातुर आज भी सबसे अधिक किया जाने वाला अनुष्ठान है। यह विशेष रूप से परिवार के पुरुष सदस्यों के लिए किया जाता है— बीमारी को ठीक करने, घर की रक्षा करने, और बुरी आत्माओं द्वारा होने वाली दुर्घटनाओं और त्रासदियों से बचाव के लिए।

‘हमारे चारों ओर की हर चीज़—बाहर की विशाल दुनिया से लेकर घर के शांत कोनों तक—आत्माओं से भरी हुई है, जिन्हें हम उई  कहते हैं। ये आत्माएँ न तो अच्छी होती हैं और न ही बुरी—वे बस मौजूद होती हैं। जब कोई दुर्भाग्य आता है—बीमारी, दुर्घटना या मृत्यु—तो यह संकेत होता है कि माँ प्रकृति की आत्माएँ हमसे नाराज़ हो गई हैं। यदि इन चेतावनियों को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो परिणाम और भी बड़े संकटों में बदल सकते हैं। मनुष्यों और इन अदृश्य उई  की दुनिया के बीच एक नाज़ुक संतुलन होता है। इसलिए हमें सम्मानपूर्वक, सावधान और सचेत रहना चाहिए, क्योंकि हमारे कर्म और शब्द केवल इस दुनिया में ही नहीं, बल्कि उस अदृश्य दुनिया में भी गूंजते हैं।’

यह बात कानाम के पिता ने उसे एक दिन पहले तब बताई थी, जब वे गाड़ी से कानाम के पिता के मामा के घर जा रहे थे। वहाँ वे बोट यातुर करने वाले थे, जिसे वे हर तीन साल में एक बार करते हैं। कुछ लोग इसे वार्षिक रूप से करते हैं ताकि घर में हमेशा सुख-शांति बनी रहे, जबकि कुछ इसे केवल बीमारी या किसी संकट के समय कराते हैं।

अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े कानाम के पिता अक्सर अपनी पहचान को सँजोकर रखने की ज़रूरत पर बात करते हैं, खासकर उस दौर में जब नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा तक भूलती जा रही है। जब से कानाम चार साल की थी, तब से जब भी उन्हें कोई पारंपरिक अनुष्ठान देखने का मौका मिलता, वे उसे अपने साथ ले जाते। एक बच्ची होने के नाते, कानाम उन अनुष्ठानों के अर्थ नहीं समझ पाती थी, लेकिन उसके पिता ने कभी उस पर समझने का दबाव नहीं डाला। उनका बस इतना मानना था कि वह वहाँ मौजूद रहे— बुजुर्गों और अपने सांस्कृतिक सुरों के बीच। उन्हें विश्वास है कि एक दिन यह देखना और यह अनुभव ही समझ में बदल जाएगा।

सुबह के पाँच भी नहीं हुए थे, लेकिन घर में हलचल शुरू हो चुकी थी—सिर्फ बच्चे ही अभी तक सपनों में खोए थे। कानाम अंगीठी की गर्माहट के पास बैठी थी, चेहरा धोने के बाद अपनी ठंडी और सुर्ख हथेलियों को सेंकते हुए। उसने नज़दीक ही एक दूसरी अंगीठी के पास बैठे अपने पिता की ओर देखा, जो एक बुज़ुर्ग व्यक्ति से गहरी बातचीत में मग्न थे। उस बुज़ुर्ग ने एक पुराना सा स्लेटी रंग का कोट पहन रखा था और उसके सिर पर एक बोपिया, न्यीशी समुदाय की पारंपरिक टोपी, सजी हुई थी।

बोपिया, एक पारंपरिक न्यीशी टोपी। फोटो: ताबा डोमिना

न्यीशी समुदाय के घर आमतौर पर लंबे और आयताकार होते हैं, जिन्हें बांस और लकड़ी से बनाया जाता है। इनकी ढलवाँ छतें टोकोओक्क (लिविस्टोनाजेनकिंसियाना)- एक प्रकार की ताड़ की प्रजाति से बनी होती हैं। मुख्य प्रवेश द्वार को बोटू कहा जाता है, जो अक्सर लकड़ी या बांस की सीढ़ी से पहुँचा जाता है। घर के दूसरी ओर होता है बाग, जो एक फैला हुआ चौबारा होता है—जहाँ लोग आपस में बातचीत करते हैं, आराम करते हैं या अनाज सूखाते हैं।

टोको ओक्क। फोटो: ताना आपू ताबा

“आ जा, कानाम, खाना खा ले,” उसकी माँ ने पुकारा। मुर्गा और चावल से बना कज, एक प्रकार का दलिया, अपनी जानी-पहचानी खुशबू से सुबह की ठंड में गर्माहट घोल रहा था।

कुछ देर बाद, कानाम ने देखा कि वह बुज़ुर्ग व्यक्ति, जो थोड़ी देर पहले उसके पिता से बातें कर रहे थे, बाग  में बाहर आ गए। सुबह अभी भी अंधेरी और तीखी ठंडी थी। बाग में बैठे उस बुज़ुर्ग ने बोलना शुरू किया। उनकी आवाज़ में एक लय था—जैसे किसी अदृश्य उपस्थिति से बात कर रहे हों। कभी वह कुछ विनती करने लगते, तो कभी जैसे किसी से सवाल पूछ रहे हों या कोई समझौता कर रहे हों। उनके शब्द धीरे-धीरे हवा में गूंजने लगे, जैसे कोई मंत्र हो। उस लय के बीच कानाम  ने कुछ जाने-पहचाने नाम सुने—अपने पिता और दादा के—जो उन पवित्र शब्दों में बुने हुए थे।

न्यीशी पारंपरिक घर। फोटो: कामले टाइम्स

आबू (पापा), ये कौन हैं?’ कानाम ने पूछा, जब उसके पिता ने आग सुलगाते हुए उसे भुना हुआ मक्का दिया।

‘ये न्युब (शामन) हैं, आने (बेटी),’ उसके पिता ने जवाब दिया। ‘यही यातुर का अनुष्ठान करेंगे। याद है, कल गाड़ी में मैंने तुझसे क्या कहा था?’

कानाम ने सिर हिलाया और फिर पूछा, ‘तो वो बाहर बाग में क्यों हैं? इतनी ठंड में। वो क्या बोल रहे हैं?’

उसके पिता उसकी जिज्ञासा पर मुस्कुरा उठे। ‘यातुर के दौरान, न्युब घर के अंदर मंत्र नहीं पढ़ सकते, क्योंकि यातुर की एक भारी ऊर्जा होती है—जो दुर्घटनाओं और अचानक मौतों से जुड़ी होती है। यह घर के भीतर नहीं लाया जाता’ उन्होंने समझाया। ‘न्युब अभी योब उई को पुकार रहे हैं—वे रक्षक आत्माएँ जो पुरुषों की शिकार, युद्ध और अदृश्य खतरों से रक्षा करती हैं। इनकी रक्षा बेहद ज़रूरी होती है, क्योंकि इनके बिना आदमी की आत्मा कमज़ोर हो जाती है और शरारती या दुष्ट आत्माओं के लिए आसान शिकार बन जाती है। कहते हैं कि जब योब उई तुम्हारे साथ हों, तो ओयो (पारंपरिक हथ्यार) की एक खरोंच भी तुम्हें नहीं छू सकती।’

ओयो। फोटो: ताबा डोमिना

कानाम की भौहें सिकोड़ी। ‘आबू, योब उई किसी की रक्षा करना क्यों बंद कर देते हैं?’

‘जब कोई आदमी उन्हें नाराज़ कर दे—अपने कर्मों, व्यवहार, या शब्दों से,’ उसके पिता ने जवाब दिया। ‘इसीलिए हमें हमेशा सही काम करना चाहिए और अपने शब्दों का चयन सोच-समझ कर करना चाहिए। उई हमेशा देख रहे होते हैं, हमेशा सुन रहे होते हैं।’

‘तो फिर मुझे कौन बचाता है, आबू? अगर योब उई सिर्फ़ पुरुषों की ही रक्षा करते हैं?’ कानाम ने पूछा। उसकी छोटी-छोटी हथेलियाँ गरम-गरम भुने हुए मक्का के चारों ओर लिपटी हुई थीं।

उसके पिता मुस्कुराए। ‘ऐसा नहीं है कि वे महिलाओं की रक्षा नहीं करते—वे करते हैं। पुराने समय में ज़्यादातर पुरुष ही युद्ध में जाते थे और शिकार करते थे, उन्हें सबसे ज़्यादा सुरक्षा की जरूरत होती थी। इसलिए यह माना जाता है कि योब उई मुख्य रूप से पुरुषों के साथ रहते हैं। मैंने कभी नहीं सुना कि महिलाओं के लिए यातुर किया गया हो, शायद इसलिए क्योंकि वे युद्धों या शिकार में बहुत कम शामिल होती थीं।’ उन्होंने कानाम को पानी का गिलास दिया और आगे कहा, ‘चिंता मत कर, महिलाओं के लिए भी रीतियाँ होती हैं।’

कानाम ने एक घूंट लिया, जोर से सोचते हुए। ‘क्या न्यूब सच में आत्माओं को देख सकता है? क्या आत्माएँ हम जैसी दिखती हैं?’

‘नहीं, आने। आत्माएँ निराकार होती हैं। आम लोग उन्हें नहीं देख सकते या महसूस नहीं कर सकते—सिर्फ़ न्यूब ही उन्हें देख सकता है। इसी वजह से न्यूब हमारे समाज में इतनी महत्वपूर्ण जगह रखता है। बिना न्यूब के कोई भी अनुष्ठान नहीं हो सकता, क्योंकि वह मानव और आत्मा की दुनिया के बीच पुल होता है। यातुर के दौरान, न्यूब एक मध्यस्थ के रूप में काम करता है, हमारे ओर से उई से संवाद और बातचीत करता है। वह प्रकृति के सभी पवित्र तत्वों को पुकारता है, जैसे कि न्योंक (भूमि), पोबु (नदियाँ), डोन्यीपोल (आसमान), लन (चट्टानें)— उन्हें निवेदन करता है कि वे मिलकर उस व्यक्ति या परिवार की आत्मा को मजबूत करें, ताकि वह वर्तमान और भविष्य में आने वाली किसी भी हानि से सुरक्षित रह सके।’

कानाम की आँखें चमक उठीं। ‘क्या मैं न्यूब बन सकती हूँ, आबू? मैं भी उई से बात करना चाहती हूँ!’ उसके मन में जो आत्मा की दुनिया थी, वह जादुई और अद्भुत महसूस हो रही थी।

उसके पिता ने धीरे से मुस्कराते हुए कहा, ‘न्यूब बनने का फैसला कोई ऐसे ही अपने आप नहीं ले सकता है, आने। इसे तो जन्म से ही विरासत में पाता है। बहुत छोटी उम्र से ही, एक न्यूब में दुर्लभ बुद्धिमत्ता दिखाई देती है, जो उसे दूसरों से अलग करती है। वे स्वाभाविक रूप से शब्दों के साथ सहज होते हैं और एक गहरी आध्यात्मिक समझ रखते हैं। जो भाषा वे अनुष्ठानों के दौरान उपयोग करते हैं, वह पवित्र होती है—हमारी रोज़ की बोली नहीं। केवल वही लोग जो सच में विद्वान होते हैं, इसे सही तरीके से समझ सकते हैं।’

आबू,’ मैंने थोड़ी झिझक से पूछा, ‘तो… अगर कोई न्यूब है, तो क्या इसका मतलब है कि बाकी लोग नहीं हो सकते? क्या उन्हें बाहर रखा जाता है?’

पिता ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया। ‘नहीं, कानाम। कोई भी न्यूब हो सकता है। यह वंशज से नहीं मिलता—फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस परिवार में पैदा हुए हो। कोई गरीब हो, कोई अमीर, लेकिन न्यूब होने से कोई अमीर नहीं बन जाता। तुम वैसे ही अपनी ज़िन्दगी जीते हो जैसे हमेशा जीते आए हो। शक्ति बस… मौजूद होती है, और जैसे-जैसे तुम बड़े होते हो, यह बढ़ती है। लोग इसका सम्मान करते हैं और जो दे सकते हैं, देते हैं—शायद शराब की बोतल, कुछ मुर्गियाँ, मांस, या आजकल पैसे भी। लेकिन अंत में, न्यूब भी सबकी तरह ही जीता है, और जब उसकी मृत्यु होती है, तो शक्ति भी उसके साथ ही समाप्त हो जाती है।’

कानाम धीरे-धीरे सिर हिलाती है, फिर उसके मन में एक और विचार आता है। ‘आबू, मैंने उन्हें दादा जी का नाम भी बोलते सुना।’

‘हाँ,’ उसके पिता ने उत्तर दिया। ‘हमारी संस्कृति में, परिवारों के नाम का गहरा महत्व होता है। इसी के ज़रिए हम अपने पूर्वजों की पहचान करते हैं, आबोतानी तक — जो सभी तानी लोगों के आदिपुरुष माने जाते हैं।’

तानी लोग—न्यीशी, आपातानी, गालो, आदि, तागिन और मिसिंग — ऐसी जनजातियों का समूह है, जिनकी पूर्वजता, संस्कृति और भाषा समान है, जो मुख्य रूप से अरुणाचल प्रदेश और आसाम के कुछ हिस्सों और तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (चीन) में बसे हुए हैं। हालांकि प्रत्येक जनजाति अलग है, उनकी जड़ें गहराइ से आपस में जुड़ी हुई हैं।

‘जब यहाँ हमारा समय समाप्त हो जाता है,’ उसके पिता ने जारी रखा, ‘हम उस आत्मा की दुनिया में चले जाते हैं जहाँ हमारे आबूआपा (पूर्वज) रहते हैं। वे वहाँ से हमारी देखभाल करते हैं और हमें आशीर्वाद देते हैं, उन घरों में रहते हैं जिन्हें पहले वहाँ जाने वालों ने बनाया था।’

वह पीछे झुके और बांस की चिमटी एक ओर रख दी। ‘इसलिए, न्यूब ने मेरा और दादा जी का नाम लिया—ताकि हमारी और आत्मा की दुनिया के बीच का संबंध स्थापित हो सके, ताकि वे ठीक से जान सकें कि हमारे परिवार से कोई संपर्क कर रहा है। अगर हम तुम्हारे लिए एक अनुष्ठान कर रहे होते, तो न्यूब आबू का नाम तुम्हारे नाम के साथ जरूर लेता।’

कानाम उन्हें हाथ धोने के लिए उठते हुए देख रही थी, उनके शब्द हवा में बिखरे हुए थे, एक अदृश्य दुनिया की कहानियाँ बुनते हुए।

मासाप (बांस का चिमटा)। फोटो: ताबा आनिया

आबू, हम यह अनुष्ठान मामा के घर क्यों कर रहे हैं? क्या हम इसे घर पर नहीं कर सकते?’ कानाम ने पूछा।

पास में रखे तौलिए से हाथ पोंछते हुए, उसके पिता ने सिर हिलाया। ‘हम कर सकते हैं। दरअसल, हम इसे हमारे किसी भी रक्त-संबंधी के घर में कर सकते हैं, अगर ज़रूरत हो। लेकिन इसे मामा के घर करने से इसके प्रभाव और आशीर्वाद में वृद्धि मानी जाती है। हमारी संस्कृति में, मामा को बहुत सम्मान दिया जाता है। वे अपनी बहन के परिवार के रक्षक, मध्यस्थ और संरक्षक होते हैं। उनका क़दम विशेष रूप से उनकी भतीजी और भतीजे की शादी के समय महत्वपूर्ण होता है, जहाँ उनके आशीर्वाद को शुभ माना जाता है। यही कारण है कि मामा के घर से आशीर्वाद लेना और प्रार्थनाएँ अर्पित करना बहुत प्रभावी माना जाता है। इसलिए, मेरे बच्चे, हमेशा अपने मामा का आदर करो, उनकी देखभाल करो, और उनके आशीर्वाद को संजोकर रखो। अन्यथा, आन डोन्यी (माँ सूरज) तुमसे नाखुश हो जाएगी।’

कानाम ने नाक सिकोड़ते हुए पूछा, ‘लेकिन… हमेशा मामा ही क्यों? मासी क्यों नहीं? क्या उनके आशीर्वाद मायने नहीं रखते?’

पिता हल्के से मुस्कुराए, ‘अरे, क्यों नहीं। मामा और मासी—दोनों के आशीर्वाद की अपनी अहमियत है। बस पहले के समय में ऐसा होता था कि जब औरत शादी करके अपने नए घर चली जाती थी, तो वह हर समय मदद के लिए मौजूद नहीं रह पाती थी। मामा अपने घर पर ही रहते थे, इसलिए धीरे-धीरे लोगों ने उन्हें रक्षक मानना शुरू कर दिया। लेकिन आज के समय में शादियों और रस्मों में मासी भी उतनी ही मौजूद और ज़रूरी होती हैं जितने मामा। ये औरतों को कम आँकने की बात नहीं थी, बल्कि उस दौर के समाज की व्यवस्था का असर था।’

कानाम सिर हिलाती है, और उसके पिता आगे कहते हैं, ‘हालांकि, अगर हम यह अनुष्ठान अपने घर पर करना चुनते हैं, तो हमें पहले चजी, उई और न्यूब के बीच का दिव्य संदेशवाहक, से मार्गदर्शन लेना होता है, और एक कहावत है, ‘चजी कभी झूठ नहीं बोलता।’ हर घर में आत्माएँ बसी होती हैं, जो परिवार की देखभाल करती हैं। वे हमारे घर के रक्षक होते हैं, और उनका आशीर्वाद किसी भी पवित्र अनुष्ठान से पहले बहुत महत्वपूर्ण है। बिना उनकी अनुमति के इसे करना एक गंभीर अपराध होगा, क्योंकि यह उनकी सुरक्षा पर सवाल उठाता है। इससे न केवल परिवार पर बल्कि न्यूब पर भी आपत्ति हो सकती है जो अनुष्ठान कर रहा है।’

उन्होंने जोड़ा, ‘अगर वे अपनी मंजूरी देते हैं, तभी हम आगे बढ़ सकते हैं। लेकिन एक नियम है—जब यातुर अपने घर पर किया जाता है, तो यातुर युगु  बाग  पर बनाना होता है। लेकिन किसी रिश्तेदार के घर में इसे बाहर जमीन पर स्थापित किया जाता है। क्योंकि हर घर के अपने रक्षक होते हैं, और किसी दूसरे परिवार का अनुष्ठान उनके स्थान में लाना वहाँ रहने वाली आत्माओं के प्रति असम्मान होगा।’

यातुर युगु (वेदी)। फोटो: नंगबिया तापिन

‘हम चजी का मार्गदर्शन कैसे प्राप्त करते हैं, आबू?’ कानाम ने जिज्ञासापूर्वक पूछा।

‘बहुत अच्छा सवाल, कानाम! घर पर कोई अनुष्ठान करने से पहले च्वज्व की अनुमति और मार्गदर्शन लेने के लिए, न्युब एक पवित्र प्रक्रिया अपनाता है जिसे पोछु कोट कहा जाता है,’ उसके पिता ने कहा। ‘इसके लिए, वह ढाई हफ्ते से ज़्यादा पुराने नहीं हुए छोटे चूज़ों का उपयोग करता है, जो आत्मिक संवाद के माध्यम माने जाते हैं। वह च्वज्व से प्रार्थना करता है कि वे चूज़ों के जिगर पर निशान और आकृतियाँ बनाएं, जो उसके सवालों के उत्तर के रूप में देखी जाती हैं। वह अलग-अलग चूज़ों के साथ यह प्रक्रिया तब तक दोहराता है जब तक उत्तर स्पष्ट न हो जाए। कभी-कभी, इसमें पूरा दिन या उससे भी ज़्यादा समय लग जाता है, और कई चूज़ों की बलि देनी पड़ती है—कभी-कभी चालीस से भी अधिक। जिगर की व्याख्या हमारे अनुष्ठानों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है।’

अधिक लकड़ी आग में डालते हुए, उन्होंने जारी रखा, ‘यातुर में भी यही प्रक्रिया उपयोग की जाती है, जहाँ एक रोप तली (लाल पंखों वाला मुर्गा) की बलि दी जाती है ताकि नुकसान पहुँचाने वाली आत्माओं की पहचान की जा सके। इसके पीछे एक पुरानी कहानी है कि हम यातुर में लाल मुर्गे का उपयोग क्यों करते हैं, और यह कहानी सीधे आबोटानी से जुड़ी हुई है। इस बार, न्यूब चजी से नहीं पूछता, बल्कि आत्माओं से सीधे सवाल करता है— क्या तुम वह हो जो हानि पहुँचा रहे हो? न्यूब के सवालों के जवाब मुर्गे के यकृत में प्रकट होते हैं। केवल न्यूब— या एक सहायक जिसे आध्यात्मिक दृष्टि हो— इन विशिष्ट निशानों की व्याख्या कर सकता है। साधारण लोग इन निशानों को न तो पढ़ सकते हैं और न ही समझ सकते हैं। यह कदम उई पाट्ट(आत्माओं का प्रमुख अनुष्ठान) से पहले महत्वपूर्ण है, जिसमें पहचानी गई आत्माओं को शांत करने के लिए मुर्गी, सूअर, बकरी या गायल (मिथुन) जैसे पशुओं की बलि दी जाती है। बिना पहचान के आगे कोई भी अनुष्ठान नहीं हो सकता।’

जब सुनहरी धूप ज़मीन पर बिखरने लगी और चूल्हे की गर्मी उसकी चमक के सामने फीकी पड़ने लगी, कानाम और उसकी रिश्तेदार गुमसी बाहर खेलने के लिए निकली। उनका बनावटी रसोई घर, जो मोहल्ले के बच्चों के लिए आकर्षण का केन्द्र था, जल्दी ही और छोटे रसोइयों से भर गया, उनकी हंसी सुबह की हल्की हवा की सरसराहट में घुल गई।

जब वे खेल रही थीं, कानाम की नज़र पास में काम कर रहे दो आदमियों पर पड़ी। उनके हाथ बहुत सहजता से चल रहे थे, जैसे उन्हें बांस का काम अच्छी तरह आता हो। आसपास बांस की पट्टियाँ बिखरी हुई थीं — कुछ पतली सींखों में तराशी गई थीं, कुछ से छोटी थैली जैसी चीज़ बनाई जा रही थी। कानाम उनको ध्यान से एक त्रिकोणीय संरचना को जोड़ते हुए देख रही थी।

यह जटिल रचना यातुर युगु है — यातुर वेदी, जो इस अनुष्ठान का मुख्य हिस्सा है। इस वेदी की अपनी एक खास बनावट होती है — साधारण, फिर भी अर्थपूर्ण। दोनों ओर दो मज़बूत बांस की छड़ें खड़ी होती हैं, जिन पर कोयले से बनी तिरछी रेखाओं की सजावट होती है। बीच में कोरा सन (मीठे शाहबलूत के पेड़) की एक डाली होती है, जो दोनों बांसों से जुड़ी रहती है। कोरा ओक्क (शाहबलूत की पत्तियाँ) वेदी के आधार के चारों ओर सजाई जाती हैं — किसी और पौधे का उपयोग नहीं किया जा सकता। अंत में, छूहा (एक छोटी बांस की थैली) को जहाँ बांस और डाली मिलते हैं, वहाँ बाँधा जाता है, जिससे यह रचना पूरी होती है।

कोरा सन (मीठा चेस्टनट पेड़ और कोरा ओक्क (मीठा चेस्टनट पत्तियां)। फोटो: ताना डोय तारा

न्यिशी परंपरा में, प्रत्येक धार्मिक वेदी अद्वितीय होती है, जिसे प्राकृतिक स्थानीय सामग्री से तैयार किया जाता है, और हर एक हिस्सा गहरी महत्वता रखता है। यातुरयुगु एक निश्चित डिजाइन का पालन करता है, लेकिन अन्य अनुष्ठानों की वेदियाँ उस उई (आत्माओं) के आधार पर भिन्न होती हैं जिन्हें आह्वान किया जा रहा है। बांस की छड़ों की संख्या, उनके अलंकरण और संरचना कोई संयोग नहीं होती—हर एक विवरण दिव्य मार्गदर्शन से निर्धारित होता है, जिसे न्यूब पोचुकोट (चूजे के जिगर की व्याख्या) के माध्यम से समझता है। आज भी, ये पवित्र वेदियाँ अपरिवर्तित रहती हैं, जो लकड़ी और बांस से बनाई जाती हैं, और यह न्यिशी लोगों के प्रकृति और उनके पूर्वजों के साथ गहरे संबंध को दर्शाती हैं।

छूहा (थैली)। फोटो: ताबा डोमिना

कुछ देर बाद, कानाम ने अपने पिता को एक पड़ोस के लड़के के साथ वेदी की ओर आते देखा। उस लड़के के हाथ में एक लाल मुर्गा था, जिसमें काले पंख भी थे। कानाम भी उनके पास चली गई और देखा कि लड़का मुर्गे के पैर बांधकर उसे युगु के बीच में उल्टा लटका रहा था।

आबू, ये उस अंकल का मुर्गा है क्या?’ उसने पूछा।

‘नहीं,’ पिता ने जवाब दिया, ‘मैंने इसे इस लड़के के परिवार से खरीदा है। क्वी का मुर्गा बहुत बूढ़ा है, और इस रस्म के लिए न ज़्यादा बूढ़ा और न ही बहुत छोटा मुर्गा होना चाहिए।’

कानाम कुछ देर तक युगु  को निहारती रही; मुर्गा कभी-कभी पंख फड़फड़ाकर बेचैनी से विरोध कर रहा था, जिसे वह ध्यान से देख रही थी। पास में एक बांस का झाड़ू देख, उसने उसे उठाया और वेदी के आसपास के क्षेत्र को साफ करने के लिए अपने दोस्तों के साथ शामिल हो गई, जब उसके पिता घर के अंदर वापस चले गए।

बच्चे खुशमिजाज थे, अपनी हंसी और खेल के दिलचस्प संसार में खोए हुए थे—जब तक कि उन्हें धीरे से चुप नहीं कराया गया। तभी न्यूब बाग से नीचे उतरे। यातुर में, संबंधित व्यक्ति की उपस्थिति जरूरी नहीं होती। वे दूर भी हो सकते हैं, और फिर भी उनका परिवार या रिश्तेदार उनके नाम पर अनुष्ठान कर सकते हैं। उन्हें अनुष्ठान के दौरान युगु  के पास मौजूद रहना ज़रूरी नहीं होता।

कानाम पास ही खड़ी थी, उसकी नज़र न्युब पर टिकी हुई थी, जो अपना पवित्र कार्य शुरू कर रहा था। कुछ ही पलों में मुर्गा जोर से बांग देने लगा और बेचैनी से हिलने लगा। हर बार जब वह हिलता, वेदी के पास बैठे लोग एक लयबद्ध गिनगिनानेवाला आवाज़ निकालते, जिसे रुम्द कहा जाता है, और उसके साथ कीगो नाम का एक विशेष मंत्र भी गाया जाता। यह क्रम तब तक चलता रहा जब तक न्युब ने अपनी पवित्र वंदनाएँ पूरी नहीं कीं। ऐसा माना जाता है कि मंत्रों के दौरान मुर्गे की बेचैनी योब उई की उपस्थिति का संकेत होती है — जो भेंट को स्वीकार करने के लिए वहाँ आता है।

जैसे ही प्रार्थना समाप्त हुई, कानाम ने देखा कि न्युब ने मुर्गे का सिर काट लिया और उसे युगु से बंधे हुए छूहा  में रख दिया। फिर कुछ पंखों का चयन किया और उन्हें वेदी पर सजाया, फिर धीरे से मुर्गे के शरीर को उसके आसपास घुमाया, जिससे उसका रक्त संरचना को अभिषेक कर सके। भले ही यह दृश्य बाहरी व्यक्ति को खूनखराबा लग सकता है, लेकिन न्यिशी आध्यात्मिक परंपरा में यह कार्य गहरे धार्मिक महत्व का माना जाता है और इसे श्रद्धा के साथ किया जाता है, न कि हिंसा के रूप में। यह पवित्र माना जाता है, न कि किसी नुकसान या निरर्थक हत्या के रूप में।

कानाम के पास संतरे की एक टोकरी रखी थी, और वह उप्पी (बांस की चटाई) पर लेटी हुई थी, उसकी आंखें बाग  पर इकट्ठे हुए वयस्कों की तरफ घूम रही थीं। अपने पिता के साथ बैठकर, न्युब और तीन अन्य पुरुष गहरे संवाद में थे, निकाले हुए रोसिन (मुर्गे के जिगर) का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते हुए, आत्माओं की प्रतिक्रिया को समझने की कोशिश कर रहे थे। यह रहस्योद्घाटन का क्षण था—आत्माओं द्वारा छोड़ी गई निशानियों को न्युब ने समझा, जो एक व्यक्ति या परिवार के भविष्य के बारे में जानकारी प्रदान करते थे।

उप्पी (बांस की चटाई)। फोटो: ताना आपू ताबा

अगर योब उई शांत है, उसकी सुरक्षा अडिग है, तो कोई और अनुष्ठान नहीं करने की आवश्यकता होती। लेकिन समस्याओं के संकेत मिलने पर कार्रवाई करनी होती है। एक परेशान जिगर का मतलब दो चीजों में से हो सकता है: या तो योब उई ने अपनी सुरक्षा वापस ले ली है, किसी बात या क्रिया से असंतुष्ट होकर, या फिर एक अधिक जटिल स्थिति में, योब उई तो सुरक्षा प्रदान कर रहा है, लेकिन एक अज्ञात उई  हमारे खिलाफ काम कर रही है। ऐसी स्थिति में, पोचु कोट किया जाता है ताकि अपराधी आत्माओं की पहचान की जा सके। कभी-कभी, परेशानी युलो (उच्च आत्माओं) से नहीं बल्कि निम्न आत्माओं से होती है, या फिर पूर्वजों की आत्माएं जो अपने वंशजों द्वारा भूली हुई महसूस करती हैं।

कभी-कभी, उई पाट्ट , महान शांति अनुष्ठान के बाद भी, खतरे बने रहते हैं। यह अक्सर अनुष्ठान में गलती को संकेत करता है—या तो आत्माओं की गलत पहचान की गई थी, या उनकी मांगों को पूरी तरह से नहीं माना गया था। ऐसी गलतियाँ न केवल शामिल परिवार के लिए खतरे का कारण बन सकती हैं, बल्कि उस न्युब के लिए भी जो इसे संपन्न करता है, जो यह दर्शाता है कि यह काम कितना जोखिमपूर्ण और भारी जिम्मेदारी है।

न्युब की भूमिका के लिए कड़े नियम होते हैं। वह एक महीने में एक से ज्यादा बार यातुर नहीं कर सकते या एक ही व्यक्ति के लिए एक साल में एक से अधिक बार नहीं कर सकते। दृश्य और अदृश्य के बीच संवाद करने वाले न्युब को सावधानी से कदम रखना होता है—बार-बार एक ही उई को आह्वान करने से उसे नाराज करने का खतरा होता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

आसमान में तारे चमक रहे थे और चाँदनी मिद्पु गांव को अपनी चांदी जैसी रोशनी से नहला रही थी। घर के अंदर, तेम ओपो (बाजरा शराब) की समृद्ध खुशबू लोगों की हंसी और बातचीत के साथ मिल रही थी। कानाम अपनी रिश्तेदार गुमसी के पास बैठी थी, जब उसकी माँ उनका रात का खाना परोस रही थी।

बाजरे से बनी शराब बनाती महिला। फोटो: टिंगोम गोडाक

आने, अपना मुर्गा गुमसी के साथ मत बांटना,’ उसकी माँ ने उन्हें धीरे से समझाया। ‘यह यातुर का मुर्गा है, और तुम इसे सिर्फ अपने पिता के साथ बांट सकती हो, समझी?’ गुमसी की तरफ मुंह मोड़ते हुए, उन्होंने उसे तसल्ली दी, ‘चिंता मत करो, आने  गुमसी। हमने सबके लिए मुर्गा पकाया है। हमने सबके लिए काफी खाना तैयार किया है, जो चाहो, चुन लो, ठीक है?’

यातुर के नियमों में से एक यह है कि बलि चढ़ाए गए मुर्गे को केवल वही व्यक्ति खा सकता है, जिसके लिए अनुष्ठान किया गया है, उनके परिवार के करीबी सदस्य, और समान कुल के लोग। न्यिशी एक कुल आधारित समाज है, जहां एक ही कुल के लोग रिश्तेदार माने जाते हैं, जो साझा वंश से जुड़े होते हैं—इसलिए उनके बीच विवाह सख्त रूप से निषिद्ध है। वे केवल अपने कुल के बाहर किसी से विवाह कर सकते हैं।

हालाँकि, एक पारंपरिक निषेध यह कहता है कि जिन महिला परिवार सदस्यों का मासिक धर्म शुरू हो चुका है, वे इस मांस का सेवन नहीं कर सकतीं क्योंकि मासिक धर्म को धार्मिक रूप से अशुद्ध माना जाता है। लेकिन जो समुदाय स्वयं प्रकृति की पूजा करता है, उसके लिए किसी प्राकृतिक प्रक्रिया जैसे मासिक धर्म को अपवित्र मानना शायद प्राचीन विश्वास नहीं रहा होगा। बहुत पहले, जब स्वच्छता के साधन उपलब्ध नहीं थे और महिलाएँ मुड़े हुए कपड़ों का इस्तेमाल करती थीं जो अक्सर दाग छोड़ देते थे, तब समुदाय ने इसे अस्वच्छ समझा, विशेषकर पवित्र अनुष्ठानों के दौरान। धीरे-धीरे यह व्यावहारिक सोच एक धार्मिक रिवाज़ में बदल गई और आने वाली पीढ़ियों ने मासिक धर्म को स्वयं में अशुद्ध मानना शुरू कर दिया। आज परंपरा के प्रति सम्मान और मानव शरीर की प्राकृतिक प्रक्रियाओं की व्यापक समझ के बीच संतुलन बनाना आधुनिक पीढ़ियों के लिए एक चुनौती बन गया है।

इन्हीं बातों के बीच, कानाम ने अपने पिता की आवाज़ सुनी। वे अफ़सोस जता रहे थे कि आधुनिकता ने कैसे अनेक पुरानी परंपराओं को मिटा दिया है। वह अक्सर अपने पिता को कहते सुनती थी कि आजकल न्युब को बुलाना कितना महँगा हो गया है, क्योंकि अब उन्हें दूर-दराज़ के गाँवों से बुलाना पड़ता है, कई जगह तो अब कोई न्युब बचा ही नहीं। आज केवल डोनी-पोलो के अनुयायी, जो अरुणाचल प्रदेश के आदिवासी धर्मों में से एक है,  इन पवित्र परंपराओं को जीवित रखे हुए हैं। डोनी (सूर्य ) और पोलो (चाँद ) को सर्वोच्च देवता मानकर उनकी आराधना करने वाला यह विश्वास अपने पूर्वजों की विरासत को अब भी संजोए हुए है।

अपने पिता की लगन और उनके प्रयासों की गहराई को देखते हुए, कानाम ने मन ही मन एक मौन संकल्प लिया, कि वह भी अपने पिता के साथ खड़ी रहेगी, और उस संस्कृति और परंपरा की रक्षा करेगी जिसने उनके अस्तित्व को आकार दिया है।

डोन्यी-पोलो का ध्वज. फोटो: टिंगोम गोडाक

Meet the storyteller

Taba Domina
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Taba Domina is a twenty-four-year-old from the village of Toru, Papum Pare district in Arunachal Pradesh. She has completed her Bachelors and Masters in English Literature and is currently pursuing a B.Ed. She loves to sing, read, write and is a lover of lyricism. She hopes to one day become a good lyricist in her language, Nyishi.

ताबा डोमिना अरुणाचल प्रदेश के पापुम पारे जिले के टोरू गाँव की 24 वर्षीय युवती हैं। उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में अपनी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री पूरी की है और वर्तमान में B.Ed. की पढ़ाई कर रही हैं। उन्हें गाना, पढ़ना, लिखना और काव्यात्मकता से प्रेम है। वह एक दिन अपनी भाषा, न्यिशी में एक अच्छी गीतकार बनने की आशा रखती हैं।

Tani Language Foundation
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The Tani Language Foundation (TLF) is a student-founded not-for-profit entity dedicated to reviving the ancient Tanilanguage and its rich cultural heritage. Rooted in regions of India and China, TLF unites Tani dialects to preserve ancestral traditions and linguistic diversity. Through open-source archives, language resources, and a commitment to simplifying the Tani script, TLF empowers communities to reclaim their identity. Driven by love for their resilient ethnicity, TLF strives to safeguard the Tani people's voice and legacy, ensuring it thrives on for future generations.

तानी  भाषा फाउंडेशन (TLF) एक छात्र-स्थापित गैर-लाभकारी संस्था है, जो प्राचीन तानी  भाषा और इसकी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को पुनर्जीवित करने के लिए समर्पित है। भारत और चीन के क्षेत्रों में स्थापित, TLF तानी  बोलियों को एकजुट करता है ताकि पूर्वजों की परंपराओं और भाषाई विविधता को संरक्षित किया जा सके। ओपन-सोर्स पुरालेख, भाषा संसाधनों, और तानी  लिपि को सरल बनाने की प्रतिबद्धता के माध्यम से, TLF समुदायों को उनकी पहचान को पुनः प्राप्त करने में सशक्त बनाता है। अपनी मजबूत जातीयता के प्रति प्रेम से प्रेरित, TLF तानी  लोगों की आवाज़ और विरासत की रक्षा करने के लिए प्रयासरत है, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए जीवित रहे।

Voices of Rural India
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Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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