आ..छू…बस एक छींक
परिवर्तन ही शायद असली शगुन है, अपशगुन की कहानी से निकला हुआ
दीवाली की सफ़ाई के बीच टूटे हुक्के की चिलम एक ऐसी कहानी खोलती है, जो गाँव कुलाहन के अतीत और वर्तमान को चुपचाप जोड़ देती है। छींक, कौवे की कांव-कांव और अपशकुन जैसे रोज़मर्रा के विश्वास एक युवा के सपनों की राह में कैसे दीवार बन जाते हैं, यह कहानी उसी टकराव को सामने लाती है। परत-दर-परत खुलती स्मृतियाँ यह सवाल छोड़ जाती हैं कि परंपरा और अंधविश्वास के बीच रेखा कहाँ खिंचती है। अंत में, कहानी एक ऐसे सच की ओर मुड़ती है जो रिश्तों, पहचान और सोच—तीनों को नए अर्थ दे देता है।

कहानीकर्ता : रेखा देवी
गाँव कुलाहन, ज़िला कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश
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आज भी कुछ नया न था, बस था तो वही माँ का सफाई वाला आलम! दीवाली आने पर घर में सफाई का माहौल चल रहा है। सुबह-सुबह सभी अपने काम में व्यस्त थे। पापा हॉस्पिटल जा रहे थे, माँ उनके लिए टिफिन बना रही थी। तभी पापा ने मुझे आवाज दी और कहा, “ रीवा बेटा! आज मैं गाड़ी से नहीं, स्कूटी से जाऊँगा। तू जाकर स्कूटी को गेट पर लगा दे।”
मैंने जाकर स्कूटी को गेट पर लगा दिया। मैं घर की तरफ आ रही थी तो माँ कि आवाज आई, “स्टोर रूम की सफाई बाकी है अभी। तू कर दे जाके।”
बहुत दिनों के बाद, आज मैंने स्टोर रूम खोला और देखा कि वह मकड़ियों के जालों से भर चुका था। चारों तरफ धूल जमी हुई थी। मैं धीरे-धीरे सफाई करने लग गई और अचानक, “धड़ाम”। मैं तेजी से घूमी और देखा कि सफाई करते-करते मेरा हाथ हुक्के की चिलम से जा लगा और वो नीचे गिर के टूट गयी।

मैं उन टूटे हुए टुकड़ों को समेटने लगी। हथेलियों में चुभते किनारों के बीच अचानक दादा जी का चेहरा उभर आया। वह हुक्का उन्हीं का था। बरसात के दिन याद आ गए जब आंगन में अंगीठी सुलगती रहती, धुएँ की पतली लकीरें हवा में घुलती जातीं और दादा जी हुक्का हाथ में लिए अपने मित्रों के साथ बैठे रहते। उनकी आवाज़ में ठहराव होता था, बात कहने का अपना ही ढंग। लम्बा कद, सफेद बाल और दाढ़ी, हाथ में छड़ी और सलीके से पहना कुरता पजामा। उन्हें देखना अपने आप में एक दृश्य था। कई बार मैं चुपचाप पास बैठ जाती और उनकी बातों में बहती चली जाती।
जब भी मैं उन्हें याद करती हूँ, उनकी सुनाई हुई एक कहानी अपने आप सामने आ जाती है, जो न जाने क्यों अब तक मेरे साथ बनी हुई है। एक शाम वे अपने मित्रों के साथ महफिल जमाए हुए थे और मैं भी वहीं जा पहुँची। उस दिन किसी शामू नाम के युवक की चर्चा चल रही थी। मैं सुनने लगी। दादा जी बता रहे थे कि वह हमारे ही गाँव कुलाहन, ज़िला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश, का रहने वाला, पढ़ाई में रुचि रखने वाला बीस वर्षीय युवक था, जो रोज़ महाविद्यालय पढ़ने जाया करता था।
“मैं महाविद्यालय जा रहा हूँ, दादी माँ,” शामू ने कहा।
“अच्छा जा, पर समय से घर लौटना। पशुओं के लिए चारा भी लाना है,” दादी की आवाज़ आई।
शामू की दादी पुराने विश्वासों में गहरी आस्था रखने वाली और घर में सब पर अपना रोब जमाए रखने वाली बूढ़ी औरत थीं। उनकी बात टालना आसान नहीं था। शामू मित्रों के साथ महाविद्यालय की ओर निकल पड़ा। परिसर में कदम रखते ही उसका ध्यान चारों ओर बिखरे दृश्य पर चला गया। कहीं अध्यापक विद्यार्थियों से बात कर रहे थे, कहीं किताबें हाथ में लिए छात्र समूहों में खड़े थे। इस दृश्य को देखते हुए उसके मन में वही इच्छा फिर से उभर आई, जो वह काफी समय से अपने भीतर सँजोए हुए था। वह अक्सर सोचता था कि वह दिन कब आएगा जब वह भी इन्हीं की तरह शिक्षक बनेगा और विद्यार्थियों के बीच खड़ा होगा।
“हा-हा-हा,” उसकी यह बात सुनकर मित्र हँस पड़े और बोले, “तू तो हमेशा सपनों की दुनिया में ही जीता रहता है। अभी जवान है, युवावस्था के मज़े ले। चल, अब कक्षा में चलते हैं, समय हो रहा है।”

“टन टन टन” घंटी की आवाज़ गूँजी और दिन की कक्षाएँ समाप्त हो गईं। शामू ने मित्रों की ओर देखते हुए कहा, “अच्छा ठीक है मित्रों, सारी कक्षाएँ खत्म हो चुकी हैं। मुझे घर जाना है, ज़रा काम है।”
महाविद्यालय से लौटते ही वह दादी की बनाई हुई दिनचर्या के अनुसार खेत की ओर चला गया। सिर पर घास का भारी बोझ था। धूप तेज़ थी और चलते-चलते उसकी साँस फूलने लगी। मन ही मन वह बड़बड़ाया, “न जाने मुझे कब मुक्ति मिलेगी इन घर के फालतू कामों से। एक तो सिर पर इतना भारी घास और ऊपर से गर्मी, गला भी सूख रहा है।”
घर पहुँचते ही उसने ज़ोर से आवाज़ दी, “अरे माँ, माँ, पानी पिला दो ज़रा। बहुत थक गया हूँ आज मैं।”
सामने से शीला बोली, “भैया, माँ घर पर नहीं हैं। सब्ज़ी लेने दुकान गई हैं। मैं झाड़ू लगा देती हूँ, आप पानी पी लो।”
“अच्छा, लगा ले,” शामू ने कहा।
शीला उसकी छोटी बहन थी। उसके लिए स्कूल की दुनिया उतनी ही थी, जितनी शामू घर आकर उसे बता देता था। तभी दादी की कर्कश आवाज़ आंगन में गूँजी, “सिर पर दुपट्टा नहीं है तेरे, ऐसे लगाती है झाड़ू। अपशगुनी कहीं की। दुपट्टा ले सिर पर।”
शीला ने हिम्मत करके कहा, “दादी, आप हर बार ऐसा ही कहती रहती हो। अगर नहीं लूँगी तो क्या ही होगा?”
“चुप कर, ज़ुबान लड़ाती है। जितना कहूँ उतना कर,” दादी ने तीखे स्वर में कहा।
आंगन के एक कोने में बैठा शामू यह सब सुन रहा था। वह मन ही मन सोचने लगा कि दादी शीला को हर वक्त भला बुरा कहती रहती हैं और उसे कितना बुरा लगता होगा। लड़की होना जैसे उसके लिए अपशगुन बन गया था।
कुछ देर बाद माँ सब्ज़ी लेकर घर लौटीं। शामू उनके पास जाकर बोला, “अरे माँ, आप आ गईं। आप मुझे सुबह जल्दी उठा देना, मुझे पढ़ाई करनी है। मेरी शिक्षक भर्ती आ रही है।”
माँ ने सहज भाव से कहा, “अच्छा, कोई बात नहीं, उठा दूँगी मैं तुझे।”
अगली सुबह सूरज की किरणें आँगन में फैल चुकी थीं। पक्षियों की चहचहाहट और भूख से व्याकुल पशुओं की आवाज़ों के बीच उसकी अचानक आँख खुली। उसने घड़ी देखी और चौंक पड़ा। “अरे, दस बज गए। हे भगवान, कब होगी मेरी तैयारी?”
जल्दी जल्दी मुँह धोते हुए उसने ऊँचे स्वर में कहा, “माँ, आपने मुझे जगाया क्यों नहीं। मैं इतनी देर तक सोता रहा तो कैसे होगी मेरी तैयारी?”

“क्या परीक्षा-परीक्षा करता रहता है। तुझे नहीं पता कि पशुओं को चारा भी डालना है और खेतों में सिंचाई भी करनी है,” दादी ने कड़े स्वर में कहा। “पूरा दिन पढ़ाई के नाम पर आवारागर्दी करता रहता है।”
शामू ने उनकी ओर देखे बिना कहा, “अच्छा बस करो दादी अब। मैं मुँह हाथ धो लेता हूँ, फिर चला जाता हूँ। पढ़ने के लिए तो कोई कभी नहीं कहता, घर के काम ही चाहिए बस,” यह कहते हुए उसकी आवाज़ अपने आप धीमी हो गई।
इतने में आँगन में किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ हुई। शामू ने मुड़कर देखा तो माँ दूध की बाल्टी लिए ज़मीन पर बैठी थीं और सफ़ेद दूध मिट्टी में फैल रहा था। वह घबराकर उनके पास पहुँचा। “अरे माँ, आप ठीक तो हैं। कहीं लगी तो नहीं?” उसने जल्दी से पूछा।
दादी की आवाज़ फिर गूँज उठी। “सत्यनाश तेरा अपशगुनी। ये क्या कर दिया। सुबह-सुबह दूध गिरा दिया। इतना बड़ा अपशकुन कर दिया। न जाने अब कौन सा संकट आ जाएगा।”

“छोड़ो दादी, जाने दो इन सब बातों को। मेरी शिक्षक भर्ती के लिए आज फ़ॉर्म भरना है। वहाँ समय पर पहुँचना भी ज़रूरी है। अभी सारे दस्तावेज़ भी संभालने हैं,” शामू ने कहा।
फिर माँ की ओर देखकर बोला, “अच्छा माँ, चलता हूँ। आने में ज़रा देर हो जाएगी।”
उसके जाते ही आँगन में उसके कदमों की आवाज़ धीरे-धीरे दूर होती चली गई। शीला झाड़ू उठाते हुए मन ही मन सोचने लगी कि जल्दी से आँगन साफ़ कर दे, नहीं तो फिर कोई न कोई टोकेगा। वह झाड़ू लगाने ही लगी थी कि दादी सामने आ गईं। उन्होंने उसकी चोटी खींच ली और गुस्से में बोलीं, “तेरा भाई अभी शुभ काम के लिए गया है और तू झाड़ू लगाने लग गई। कितनी बार कहा है कि जब कोई घर से निकलता है तो झाड़ू नहीं लगाते। तू तो पैदा ही अपशकुन करने के लिए हुई है। चल, निकल यहाँ से।”
दरवाज़े के पास खड़ी माँ यह सब देख रही थीं। शीला के साथ होता यह व्यवहार उन्हें भीतर तक मथ रहा था। वह चाहती थीं कि कुछ कहें, कुछ रोकें, पर शब्द गले में ही अटक गए। न कभी उन्होंने अपनी बात कहने की हिम्मत जुटाई थी और न ही किसी ने उनकी राय जानना ज़रूरी समझा था।
तभी पड़ोस से अचानक रोने की आवाज़ आई। पता चला कि दादी की पड़ोसन सहेली के बेटे की मृत्यु हो गई है।
“हे भगवान, यह क्या हो गया। कल तक तो ठीक था बेचारा,” दादी रोते हुए बोलीं।
ऐसा लग रहा था जैसे उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। वे अपना कलेजा थामे गाँव की सहेलियों के साथ पड़ोसन के घर पहुँचीं। वहाँ का दृश्य भारी था। पड़ोसन पूरी तरह टूट चुकी थी। उसके चारों ओर लोग खड़े थे और उसे ढाँढस बँधा रहे थे। दादी भी उसके पास जा बैठीं, उसे गले लगाया और बोलीं, “रो मत बहन। हिम्मत रख, भगवान पर भरोसा रख। जिसने यह दुख दिया है, वही इससे उबारने की ताक़त भी देगा।”

पड़ोसन और उसकी बहू लाश के पास बैठी ज़ोर-ज़ोर से रो रही थीं। बार-बार उसी ओर देखते हुए वे कह रही थीं, “तू हमें इस दुनिया में अकेला छोड़कर कहाँ चला गया।” वहाँ खड़े लोग चुप थे। आँसुओं और सिसकियों के बीच घर का माहौल भारी हो गया था।
तभी पड़ोसन की नज़र अचानक अपनी बहू पर पड़ी। उसका चेहरा बदल गया। उसने बहू को धक्का देते हुए कहा, “मेरे नौजवान बेटे को खा गई, डायन कहीं की। अब यहाँ मगरमच्छ के आँसू बहा रही है। मेरी आँखों के सामने से दूर हो जा। मैं तेरा चेहरा भी नहीं देखना चाहती।”
रोती हुई बहू ने काँपती आवाज़ में कहा, “ये क्या कह रही हैं आप, माँजी। आपके बेटे के साथ-साथ वह मेरे पति भी थे। मुझे भी उतना ही दुख है जितना आपको। इसमें मेरी क्या गलती है।”
उसकी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि पड़ोसन और उसकी सहेलियों ने मिलकर उसके हाथ पकड़ लिए। उसकी चूड़ियाँ एक-एक कर टूटने लगीं और काँच के टुकड़ों से उसके हाथ लहूलुहान हो गए। उसी बीच गाँव के लोग शव उठाकर श्मशान की ओर बढ़ चले। उनके मुँह से एक ही स्वर निकल रहा था, “राम नाम सत्य है।”
पड़ोसन और उसकी बहू दोनों का रो रोकर बुरा हाल था। दादी और गाँव की अन्य औरतों ने मिलकर बहू को सफेद कपड़े पहना दिए। आसपास खड़ी औरतें धीमी आवाज़ में आपस में कह रही थीं, “भरी उम्र में ही अपने पति को खा गई, मनहूस कहीं की।”
दादी और दूसरी औरतें उसे लगभग घसीटते हुए अलग ले आईं। गाँव में चली आ रही परंपराओं का पालन करते हुए उसके सिर के बाल काट दिए गए। वह चुपचाप बैठी रही। उसके चेहरे पर आँसू थे और आँखों में एक गहरी ख़ामोशी।

“छोड़ो मुझे, छोड़ो। मुझे दर्द हो रहा है। हाय, मेरी किस्मत में यह सब क्यों लिख दिया तूने भगवान। न जाने किस बात की सज़ा मिल रही है मुझे,” पड़ोसन की बहू रोते हुए कह रही थी। उसकी आवाज़ में थकान भी थी और बेबसी भी।
मृतक को गुज़रे पाँच दिन हो चुके थे। इन दिनों में उसका जीवन जैसे एक ही दिशा में धकेल दिया गया था। पड़ोसन, दादी और गाँव के अन्य लोगों ने मिलकर उसे गाँव से बाहर कर दिया। उसे किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या शुभ कार्य में शामिल होने से मना कर दिया गया। सास और गाँव वालों के बदले हुए व्यवहार को वह चुपचाप सहती रही। बाहर से वह शांत दिखती थी, लेकिन भीतर ही भीतर पूरी तरह टूट चुकी थी।
शामू ने यह सब बहुत पास से देखा था। यह घटनाएँ उसके मन में गहरे उतर गई थीं। वह कई दिनों तक चुप रहा, लेकिन भीतर सवाल उमड़ते रहे। एक दिन यही बातें दादी के सामने आ गईं और दोनों के बीच तीखा विवाद हो गया।
“दादी, आप एक औरत होकर दूसरी औरत के साथ इतना बुरा कैसे कर सकती हैं,” शामू ने कहा। “आपने क्यों गाँव वालों के साथ मिलकर किस्मत की मारी उस नारी पर इतना ज़ुल्म किया। उसे देखकर आपका हृदय काँपा क्यों नहीं?”

“चुप कर। तू चौबीस घंटे ज्ञान बाँटता फिरता है। सभी स्त्रियों को बलिदान देने ही पड़ते हैं,” दादी ने कड़े स्वर में कहा। यह कहते-कहते उनकी आवाज़ भर आई। थोड़ी देर चुप रहने के बाद वे बोलने लगीं, “याद है मुझे, जब मैं गर्भवती थी। मेरी सासू माँ ने दाई को बुलाया था पेट देखने के लिए। दाई ने पेट देखते ही कह दिया था कि लड़की है। यह सुनते ही ससुराल वालों ने मेरे पेट में पल रहे बच्चे को जीते जी मार डाला था। मुझ पर तब किसी ने दया नहीं की। मुझसे मेरा अंश छीन लिया गया। क्या मैंने खुद को नहीं संभाला। जीवन में इतनी समस्याएँ आईं कि उनसे निकलते-निकलते, अब इन बातों से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”
दादी की बातें सुनकर शामू कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “छोड़ो दादी, आपसे तो बात करना ही बेकार है।”
पड़ोसन के बेटे को गुज़रे दो हफ्ते हो चुके थे। गाँव फिर से अपनी रोज़मर्रा की गति में लौट आया था। लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त थे। ढलते सूरज की लाल होती किरणों में नहाया हुआ शामू आँगन से माँ को ज़ोर से आवाज़ दे रहा था।
“इतनी ज़ोर से क्यों चिल्ला रहा है,” माँ ने पूछा।
“माँ, मेरी कल भर्ती है, जिसका मैं एक साल से इंतज़ार कर रहा था। परीक्षा केंद्र गाँव से तीस किलोमीटर दूर है। रास्ता भी उबड़ खाबड़ है। पर कोई बात नहीं, सपने के लिए ये छोटी मोटी मुश्किलें सह लूँगा।”
“हाँ, कोई बात नहीं। मैं तेरा खाना बाँध दूँगी,” माँ ने जवाब दिया।
अगली सुबह उगते सूरज की किरणें, पक्षियों का मधुर कलरव और हवा में झूमते पेड़ शामू को कुछ अलग ही लग रहे थे। उसके मन में एक अजीब सी खुशी थी।
“ठंडे-ठंडे पानी से नहाना चाहिए। सर्दी हो या गर्मी हो, हमें तो बस बहाना चाहिए,” नहाते हुए वह धीमे स्वर में गुनगुना रहा था।
अच्छे से तैयार होकर उसने नाश्ता किया और माँ ने उसे दही शक्कर भी खिलाई।
“अच्छा दादी, अब मैं चलता हूँ। मेरी परीक्षा तीन बजे है। मुझे आशीर्वाद दो कि मैं कामयाब होकर आऊँ,” शामू ने दादी के पैर छूते हुए कहा।

“विजय भव,” दादी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा।
तभी मुंडेर पर बैठा कौवा कांव-कांव करने लगा। दादी ने उसकी ओर देखा और बोलीं, “अरे, लगता है आज घर में मेहमान आने वाले हैं। लगता है मेरी भाभी आने वाली है। शामू, तू भी उनसे मिलकर जा। उन्हें अच्छा लगेगा।”
“नहीं दादी, मैं लेट हो जाऊँगा। मुझे समय पर पहुँचना है,” शामू ने कहा।
“दूसरे ही पहर तो है तेरी परीक्षा। पहले जाकर क्या करेगा। अभी बहुत समय है, रुक जा,” दादी बोलीं।
थोड़ी देर सोचकर शामू ने कहा, “अच्छा, थोड़ी देर रुक जाता हूँ।”
घर में अचानक हलचल बढ़ गई। रसोई में बर्तनों की आवाज़ें गूंजने लगीं और आँगन में साफ सफाई होने लगी। समय धीरे-धीरे बीतता गया। देखते ही देखते बारह बज चुके थे, लेकिन अभी तक कोई नहीं आया था।
“दादी, मुझे जाने दो। कोई भी नहीं आने वाला। मैं जा रहा हूँ, मुझे देर हो रही है,” शामू ने बेचैनी से कहा।
वह निकलने ही वाला था कि तभी शीला को छींक आ गई।
“अरे मनहूस, तुझे बिना अपशकुन किए खाना नहीं हज्म होता क्या,” दादी ने तुरंत कहा।
“अब क्या कर दिया मैंने, दादी,” शीला ने सहमी हुई आवाज़ में पूछा।
“तूने छींक क्यों मारी। चल, अब दूसरी भी मार। जब तक दूसरी छींक नहीं आएगी, शामू यहाँ से नहीं जाएगा। एक छींक का आना बहुत बड़ा अपशकुन होता है। कर्मजली कहीं की, सत्यानाश,” दादी ने गुस्से में कहा।

“साढ़े बारह बज चुके थे, लेकिन अभी तक उसे छींक नहीं आई थी। छोड़ो दादी, मुझे जाना है, नहीं तो मेरी बस निकल जाएगी,” शामू ने बेचैनी में कहा।
उसने जल्दी से बैग उठाया और गली की ओर बढ़ने लगा। तभी माँ ने उसे रोक लिया। उसके हाथ में एक नींबू, लोहे का छोटा सा टुकड़ा और लाल मिर्च थी। माँ ने उन्हें उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा, “आते समय रात हो जाएगी। काली नज़र और भूत प्रेत डराते हैं। ये सब अपने साथ रख लेना।”
लगभग एक बज चुका था। भागते-भागते शामू का गला सूख गया था। ऊपर से गाँव का पथरीला रास्ता उसकी चाल और धीमी कर रहा था। हर कदम पर समय फिसलता हुआ महसूस हो रहा था।
“हे भगवान, अच्छा हुआ, मैं बस स्टॉप पर पहुँच गया,” वह मन ही मन बुदबुदाया।
उसने पास खड़े एक बाइक चालक से पूछा, “अरे भाई साहब, क्या शहर जाने वाली बस चली गई?”
“हाँ, पाँच मिनट पहले ही निकल गई,” बाइक चालक ने जवाब दिया।
शामू का चेहरा उतर गया। फिर उसने हिम्मत करके कहा, “भाई साहब, क्या आप शहर की तरफ जा रहे हैं। तो मुझे भी ले चलिए। मैं आपका एहसान कभी नहीं भूलूँगा।”
“हाँ, लेकिन मैं शहर से सात किलोमीटर पहले तक ही जाऊँगा। वहाँ तक चल पड़ो,” बाइक चालक बोला।
“धन्यवाद। आप नहीं जानते कि आपने मेरी कितनी बड़ी मदद की है,” शामू ने राहत की साँस लेते हुए कहा।
बाइक की मदद से वह तेईस किलोमीटर का सफ़र तय कर चुका था। अब केवल सात किलोमीटर का रास्ता बचा था। उसने आसपास खड़े लोगों से पूछा कि क्या परीक्षा केंद्र की ओर कोई वाहन जाएगा। लोगों ने बताया कि अब कोई साधन नहीं मिलेगा क्योंकि ढाई बज चुके थे।
उन्होंने उसे परीक्षा केंद्र तक पहुँचने का एक छोटा रास्ता बताया और पैदल जाने की सलाह दी। समय निकल चुका था, लेकिन शामू ने रुकने के बारे में सोचा भी नहीं। जैसे तैसे वह परीक्षा केंद्र पहुँचा। वहाँ पहुँचकर उसे एक पल के लिए लगा कि उसकी मेहनत रंग लाने ही वाली है। मंज़िल सामने थी।
वह जल्दी से परीक्षा कक्ष की ओर बढ़ा, लेकिन निरीक्षक ने उसे रोक लिया। देरी से आने का कारण बताते हुए उसे परीक्षा में बैठने नहीं दिया गया और कक्षा से बाहर जाने को कह दिया।
शामू वहीं खड़ा रह गया। उसके हाथ में बैग था और आँखों में वह सपना, जिसके लिए वह इतना दूर तक भागता हुआ आया था।

शामू वहाँ से चुपचाप लौट आया। पूरे रास्ते उसके मन में जैसे तूफ़ान उमड़ता रहा। कदम आगे बढ़ रहे थे, लेकिन भीतर पछतावे और ग़ुस्से की हलचल थम नहीं रही थी। उसे बार-बार यही खयाल आ रहा था कि अगर दादी ने उसे न रोका होता तो वह समय पर पहुँच जाता। उस दिन उसे किसी की बात नहीं सुननी चाहिए थी।
इसी उफान के साथ वह घर पहुँचा। माँ ने उसे देखते ही कहा, “शामू, आज तो तेरा सपना पूरा हो गया ना?”
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बिना कुछ कहे वह वहाँ से हट गया। उसके चेहरे पर उदासी और भविष्य की चिंता साफ़ झलक रही थी। वह एक कोने में जाकर बैठ गया, बत्ती बुझी हुई थी और मन ग्लानि से भरा हुआ।
थोड़ी देर बाद दादी सामने आईं। उन्हें देखते ही उसके भीतर जमा सारा आक्रोश बाहर आ गया। वह सब लिहाज़ भूल बैठा और बोल पड़ा, “दादी, क्या बात है। आप तो सर्वज्ञानी हो। आपको तो सब पता चल जाता है। आज क्यों नहीं पता चला कि अगर आप शामू को रोकेंगी तो वही अपशकुन हो जाएगा। अगर आप मुझे न रोकतीं तो मैं अपनी परीक्षा दे पाता। मेरी बस न छूटती और मैं समय पर परीक्षा केंद्र पहुँच जाता।”
यह कहते-कहते उसका गला भर आया। शब्द वहीं अटक गए और आँखों में वह सपना तैर गया, जिसे वह हाथों में लेने ही वाला था।

“आपके इन चंद मिनटों के अंधविश्वास ने मेरी साल भर की मेहनत पर पानी फेर दिया। पूरी उम्र मुझे यह कांव-कांव और छींक की आवाज़ याद दिलाती रहेगी कि मैंने कैसे अंधविश्वास में आकर अपनी वर्ष भर की मेहनत पर खुद ही मिट्टी डाल दी,” शामू ने भारी स्वर में कहा।
“चुप कर,” दादी ने तेज़ आवाज़ में कहा। “तू मुझसे क्या बोल रहा है। यह सब तो तेरी माँ और बहन का किया धरा है। वे दोनों अपशकुन पर अपशकुन करती रहती हैं। कभी दूध गिरा देती हैं, कभी झाड़ू लगाने लगती हैं, तो कभी छींक मार देती हैं। यह सब इन्हीं का किया धरा है।”
शामू समझ चुका था कि दादी से बात करना दीवार पर सिर मारने जैसा है। शब्दों का वहाँ कोई अर्थ नहीं था।
कई दिनों तक वह इसी ग्लानि में डूबा रहा। भीतर कहीं कुछ टूट चुका था, लेकिन उसी टूटन के बीच उसने एक निर्णय भी लिया। वह अब अपने जैसा किसी और के साथ नहीं होने देगा। उस दिन उसने अपने भीतर के उस पुराने शामू को जैसे पीछे छोड़ दिया। उसी पल उसने ठान लिया कि उसके घर में अब न छींक और न ही कौवे की कांव-कांव किसी की किस्मत तय करेगी।
समय के साथ शामू इस घटना से बाहर निकला और जीवन की एक नई शुरुआत की। उसने अपने गाँव की युवा पीढ़ी को शिक्षा का महत्व समझाना शुरू किया और उन्हें यह भी बताया कि अंधविश्वास कैसे ज़िंदगी को पीछे खींच ले जाता है। उसने गाँव में एक शिक्षण केंद्र खोला, जहाँ बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जाने लगी।
यह घटना पचास साल पहले की थी। समय बीत गया। शामू की शादी हुई और उसके दो बच्चे हुए। उसने अपने बेटे का समय पर दाखिला करवाया और उसे पढ़ाया लिखाया, वह शिक्षा जिसे वह खुद समय पर पूरा नहीं कर पाया था।
यह कहानी सुनते-सुनते मैं बोल पड़ी, “दादाजी, फिर शामू के बेटे का क्या हुआ?”
दादाजी मुस्कुराए और बोले, “अब तो वह बहुत बड़ा डॉक्टर बन गया है। शाम को तेरे पापा आएँगे, तो उनसे ही पूछ लेना।”
मैंने तुरंत कहा, “डॉक्टर तो मेरे पापा भी हैं।”
“हाँ,” दादाजी हँसते हुए बोले, “तो शामू भी तो तेरा दादा ही है।”
यह सुनकर वे ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे और मुझे कुछ पल लगे यह समझने में कि जिस शामू की कहानी मैं इतने मन से सुन रही थी, वह और कोई नहीं, मेरे दादाजी ही थे।

सोचते-सोचते मैं जाने कहाँ पहुँच गई थी। दादा जी की मृत्यु को कुछ ही वर्ष हुए थे। उनकी अनुपस्थिति अब भी घर के हर कोने में महसूस होती थी।
मैं टूटे हुए चिलम के टुकड़े समेट रही थी, जैसे दादाजी के अतीत को ही बटोर रही हूँ। दादी के हाथ कभी शीला की चोटी में उलझे रहे होंगे, पर सच तो यह था कि दादी खुद समाज की पकड़ में थीं। वही समाज, जिसने डर और अंधविश्वास की जकड़न उन्हें सौंप दी थी।
आज मैंने मन ही मन ठान लिया। सफ़ाई सिर्फ़ आँगन और कमरे की नहीं होगी। आज पुराने डर भी बाहर जाएँगे। मैंने चिलम की राख हथेली में उठाई और मिट्टी में डाल दी। वह राख, जो कभी अंधविश्वास की कहानी ढोती थी, अब उसी में नई सोच के बीज मिल गए थे।
उस पल मुझे लगा कि सफ़ाई केवल जगह की नहीं, सोच की भी उतनी ही ज़रूरी है। परिवर्तन ही शायद असली शगुन है, अपशगुन की कहानी से निकला हुआ।
क्योंकि हर परंपरा अंधी नहीं होती। कुछ विश्वास पीढ़ियों की सोच और अनुभव से उपजे होते हैं, सावधानी सिखाते हैं और जीवन की रक्षा करते हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें औरतों को दबाने और पितृसत्ता को बनाए रखने के लिए गढ़ा गया। मैंने तय किया है कि मैं उन विश्वासों को सँजोकर रखूँगी जिनमें समझ और संरक्षण है, और उन परंपराओं को यहीं मिट्टी में छोड़ दूँगी, जो किसी की आज़ादी छीनती हैं।