जो पहाड़ों ने नहीं बताया…वो आशा ने बताया
उत्तराखंड के पहाड़ों में दिखने वाली शांति के पीछे छुपी एक कहानी, आशा की। एक मुस्कुराती हुई औरत, जिसकी ज़िंदगी के धागे धीरे-धीरे खुलते हैं और सामने लाते हैं सपनों, जिम्मेदारियों और अधूरे रह गए रास्तों को। बचपन के खेलों से लेकर छुपकर की गई पढ़ाई तक, और फिर एक नए तरीके से खुद को खोजने की कोशिश, यह सिर्फ एक जीवन की कहानी नहीं है। यह उन अनकही ज़िंदगियों की झलक है, जो रोज़ जी जाती हैं, बिना सुने। आशा की कहानी आपको सिर्फ सुनाएगी नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करेगी, मज़बूती के पीछे आखिर क्या छुपा होता है?

कहानीकार- संगीता देव
हिमल प्रकृति कहानीकार
चंपावत, उत्तराखंड
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मैं उसे बस उसके अभी के किरदार की तरह ही समझती थी। लगनशील, धैर्य स्वभाव और मज़ाकिया बातें करने वाली, पर उसकी ज़िंदगी की असली कहानी हमें कभी पता नहीं चली। फिर हर दिन ऐसे ही बैठते-बैठते, बातों का एक छोटा-सा धागा खुला…और हम हैरान रह गए कि उस धागे के पीछे कितनी गहरी कहानी छुपी है।
उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बसे खेतीखान और चम्पावत दो अलग-अलग जगह, दोनो चंपावत झिले में स्थित, जहाँ सुबहें पंछियों की आवाज़ के साथ होती हैं और शामें पहाड़ी के पीछे ढ़लते सूरज में खो जाती हैं। हमेशा बाहर से देखने में बहुत शांत दिखनें वाले पहाड़ी इलाके देवदार के ऊँचे पेड़, खेतों की हरियाली, और हवा में घुली पहाड़ी मिट्टी की खुशबू सब कुछ इतना सुंदर कि लगता है यहाँ हर ज़िंदगी आसान होगी। लेकिन उसकी कहानी सुनकर पहली बार महसूस हुआ कि सुंदर जगहों में सबसे गहरी चुप्पियाँ भी छुपी होती हैं और उन चुप्पियों को सबसे ज़्यादा यहाँ की औरतें ही ढोती हैं।

उन्हीं औरतों में से एक थी आशा। हमने उसे हमेशा मुस्कुराते हुए देखा था, पर हमें यह नहीं पता था कि उसकी मुस्कान के पीछे कितने वर्षों का संघर्ष, कितनी जिम्मेदारियाँ और कितने दबे हुए सपने छुपे हैं। उस दिन से उसकी कहानी सिर्फ कहानी नहीं रही, बल्कि एक सफर बन गया जिसे समझना जरूरी था।
वह मेरे सामने अपने आंगन में आई धूप में बैठी थी, बेखौफ पाऊं पसारे, हरा गहरा सलवार, किनारे में रखी उसकी गरम चप्पलें और दुपट्टा जो हमेशा उसे आरामदायक महसूस करा रहा था। बात करते समय वो कभी हाथों से इशारे करती तो कभी मुझे कल्पना करने में मज़बूर करती जैसे वह फिर से वो पल जी रही हो।
उसके चेहरे का भाव उसकी कहानी की तरह बार बदलता जा रहा था, उसकी हँसी, उसकी खामोशी, उसका पछताना, उसका गुस्सा।
आशा के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान और चमक थी, जब वह अपने दोस्तों के साथ बिताए गए उन खास पलों के बारे में बता रही थी। वह समय ऐसा था, जब बच्चे अपने मन से, आसपास मौजूद चीज़ों को देखकर, खेल खुद ही बना लिया करते थे और पूरे मन से उन्हें खेला करते थे।
वैसे ही आशा और उसके साथियों ने भी एक खेल बनाया, जिसे उन्होंने नाम दिया, “ढून–ढून”। इस खेल में वे एक बोरी में सूखी चीड़ की पत्तियाँ भरते, उसे पहाड़ी की चोटी तक ले जाते और वहाँ से नीचे की ओर ‘ढूनका’ देते। जिसकी बोरी सबसे पहले नीचे पहुँचती, वही जीत जाता। और यह खेल वे बार-बार खेलते, हर बार बोरी भरकर, हँसते-बतियाते हुए, फिर से पहाड़ी पर चढ़ जाते।
आशा की कहानी सुनते-सुनते, मैं अपनी पीढ़ी और उसकी पीढ़ी की आपस में तुलना करने लगी। उनके समय में बच्चे अपने आसपास की चीज़ों से खेल बना लेते थे, जबकि हमारे समय में खेल ज़्यादातर मोबाइल तक सिमट गए हैं।
पहले खेल सिर्फ जीतने के लिए नहीं होते थे, बल्कि साथ रहने के लिए होते थे। अचानक मेरे मन में एक सवाल रह गया, क्या वैसा जुड़ाव आज हम महसूस कर पाते हैं?
यह सोचकर मैं आशा से कुछ नहीं पूछ पाई, शायद फर्क खेलों में नहीं, बल्कि खेलने के तरीके में है।

सपनों की उम्र, और फैसलों की शुरुआत
अब आशा ने बात को एक नई तरफ मोड़ दिया। उसने बताया कि उसका परिवार बेहद शांत, सादगी भरा और भक्ति से जुड़ा हुआ था। पिता शिक्षक थे, माँ गृहिणी, और घर में लगभग बारह लोग रहा करते थे जिनमे उनके ताऊजी के बच्चे भी शामिल थे। इतना बड़ा परिवार होते हुए भी घर में एक सुंदर-सी लय थी। हर शाम वो साथ मिलकर आरती करते, उसके पिता अपने लिखे भजन सभी के साथ मिलकर गाते, वाद्ययंत्र बजाते, और उसके बाद ही सारे बच्चे पढ़ने जाते। ऐसे माहौल में आशा की पढ़ाई के प्रति चाह और भी बढ़ जाती थी। वह एक जिज्ञासु लड़की थी, हर चीज़ जानने, हर कौशल सीखने की इच्छा रखती थी। लेकिन उसके आस-पास की कई लड़कियाँ आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ चुकी थीं। आशा ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि उसके पिता उसे हमेशा समझाते थे, “अगर तू आज पढ़ेगी-लिखेगी, तो कल किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।”
उसी के साथ–साथ, वे उसे खाली समय में कढ़ाई-बुनाई करने को कहते थे, ताकि वह बाकी हुनर से भी परिचित हो पाए।

पर उस घर में एक और सच था, उसकी माँ का डर। उस समय यह आम बात थी कि लड़की को शादी के बाद पूरा घर संभालना पड़ता था, इसलिए माँ चाहती थीं कि आशा पढ़ाई के साथ-साथ घर का काम भी सीखे। वह उसे कहती थीं कि दोनों चीज़ें आनी जरूरी हैं, क्योंकि पता नहीं आगे उसकी कैसे घर में शादी हो। और आशा, जो हर चीज़ सीखने की चाह रखती थी, अपने पापा से छुप-छुपकर घर के काम भी सीख लेती थी उसी लगन से, जिस लगन से वह पढ़ाई करती थी।
समाज लड़कियों के परिवार को याद दिलाता रहता है कि उनके पास जिम्मेदारियां है। लड़कियों को अक्सर ज़िम्मेदारी का दूसरा रूप माना जाता है। और जिनकी सभी लड़कियों की शादी हो जाती थी, उन्हें कहा जाता था कि “तुमने गंगा नहा लिया।”
इसी तरह आशा के परिवार को लोगों की कही-सुनी सुनाई देने लगी कि आपके पास तो अभी 4 जिम्मेदारियां और है और इसी के चलते आशा ने अपनी शादी के लिए हां कर दी। उसकी शादी खेतीखान के एक गांव में हुई, जहाँ की औरतें दिन भर घर के और खेतों के कामों में ही व्यस्त रहती थीं।
अब इस कहानी का एक नया पड़ाव शुरू होता है…….
सीखने की चाह, और रुकते हुए रास्ते
समाज अक्सर कहता है कि शौक और उम्र का कोई मेल नहीं होता। लेकिन आशा के लिए ये सब बातें मायने नहीं रखतीं।
जिस तरह उस समय एक औरत ही घर के सारे काम किया करती थी, शादी के बाद, आशा को भी सारे काम करने पड़े। शुरुआती दौर में आशा के लिए घर के कुछ काम करना काफी कठिन हो गया था, उसने बताया कि कैसे घास काटते–काटते उसने एक दिन अपने हाथ और पाऊं कि उंगलियों को काट दिया। गांव की लड़कियां उसकी मदद करती थी जब उससे वो सब काम नहीं होता था। अक्सर पहाड़ की सारी औरते और लड़कियां साथ में जंगल जाया करती थी, झुंड बना कर।
धीरे–धीरे आशा ने साथ में जाकर वो सारे काम सीखे जिनके बारे में उसे पहले पता भी नहीं था, पेड़ में चढ़ना, उसकी पत्तियाँ काटना, आदि। उत्तराखंड में जंगलों का काम वन पंचायतों के माध्यम से होता है, इसलिए महिलाएँ अक्सर अपनी ही वन पंचायत के अंतर्गत आने वाले जंगलों में जाती हैं। अब आशा का दिन सुबह से शाम तक इन्हीं कामों में बीतता था।
धीरे-धीरे उसकी पढ़ाई और शौक जैसे कुछ समय के लिए गायब हो गए। लेकिन फिर भी इस दौरान उसने अपनी गाँव वाली पढ़ाई यानी खेती, रीति रिवाज, पहाड़ी झोड़ा गीत को अपने आस-पास रह रहे लोगों से सीखा और उसमें खुद को मज़बूत बना लिया।
शादी से पहले, आशा ने कॉलेज के कला स्नातक कोर्स में एडमिशन ले लिया था। उसे हिंदी साहित्य और नागरशास्त्र विषय में काफी दिलचस्पी थी। लेकिन शादी के बाद, उसके ससुराल वालो ने उसे आगे पढ़ाई के लिए मना कर दिया, लेकिन उसने हार नहीं मानी। दिन भर घर और खेतों के काम से हुई थकान मिटाने के बाद वह अपने कमरे में जाकर सब दरवाज़े और खिड़कियों के छेद बंद कर देती और लैंप जलाकर चुपचाप किताब पढ़ती और खुद को सीखने में डूबा लेती।

काफी समय तक आशा के पास किताब होने के कारण एक दिन कॉलेज से उसके मायके में एक नोटिस आया कि किताब जल्द से जल्द वापस करे। तभी आशा का भाई उस किताब को लेने उसके घर आया। इसी बीच परिवार वालों को पता चला कि आशा छुप-छुप कर पढ़ाई भी कर रही थी।
आशा ने तब भी हार नहीं मानी। उसने हर संभव रास्ता खोजा अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए। आंगनबाड़ी टीचर बनने जैसे अवसर के लिए उसने अपने परिवार को मनाने की कोशिश की, लेकिन वे उसके लिए राज़ी नहीं हुए और उनका कहना था, “अगर तुम नौकरी करोगी तो हमारी गायों को कौन पालेगा।”

यह वाक्य बोलते ही आशा कहती, “अगर मैं अभी जैसी आशा, पहले होती, तो मैं कभी यह सब सहन नहीं करती,” उसने अपने हाथों की मुट्ठी को देर तक बाध लिया।
सरकार द्वारा लड़का-लड़की के बीच भेदभाव को कम करने के लिए कई नीतियाँ बनाई गई हैं, लेकिन इनमें से कुछ नीतियाँ या तो अपनी बनावट में ही कमज़ोर हैं, या फिर ज़मीनी स्तर पर सही तरह से लागू नहीं हो पातीं। और तो और, अभी भी कुछ घरों में लड़कियों को ‘पराया धन’ ही बताया जाता है। सरकार द्वारा आर्थिक तरीके से सहयोग तो मिलता है लेकिन सामाजिक तौर पर अभी भी लोगों की सोच बदलने में क्यों इतनी कठिनाई होती है?
कुछ साल बाद, अपने बच्चों की परवरिश के लिए, आशा चंपावत के एक शहरी इलाके में रहने लगी। वह समय आसान नहीं था, उसके तीनों बच्चे छोटे थे। उन्हें स्कूल ले जाना, वापस लाना, घर के काम संभालना, और सर्दियों के लिए पास के गांव के जंगल से लकड़ी लाना, ये सब उसकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा था। इसी बीच, उसने अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दिया और उन्हें पाँचवीं तक पढ़ाया। बच्चों के साथ-साथ उसके भीतर भी फिर से सीखने की इच्छा जागी। उसने अपनी पढ़ाई को नए सिरे से शुरू किया और साथ ही अपनी सिलाई, बुनाई और कढ़ाई की कला को भी फिर से अपनाया।
ऐसी ज़िंदगियाँ अक्सर अलग से दिखाई नहीं देतीं, ये कई घरों में, कई औरतों के दिनों में चुपचाप चलती रहती हैं, बिना किसी खास नाम या पहचान के।

कुछ साल बाद आशा को फिर से महसूस हुआ कि अभी भी मेरे पास समय है दूसरों पर निर्भर ना होने का और उसने लोगों से बातचीत करके फिर से ‘प्रांतीय रक्षक दल’ नौकरी करने का सोचा जो कि उसकी कौशल के ही अनुसार थी। और उसने फिर से अपने परिवार को समझाने की कोशिश की अबकी बार फिर एक बहाना सामने आया, “बच्चे को कौन संभालेगा?”
यह आखिरी बार था जब आशा ने अपने परिवार से उम्मीद लगाई थी। उसके बाद कभी आशा ने अपनी नौकरी के बारे में जिक्र नहीं किया और ऐसे ही धीरे–धीरे उसकी उम्र भी सरकारी नौकरियों के लिए खत्म हो गई। लेकिन आशा का कहना है कि उसे बहुत खेद होता है कि काश वह अपने परिवार की बातों में न आई होती तो आज वह एक अच्छी नौकरी कर रही होती और नए-नए अनुभव ले रही होती।
आशा ने अपने ऊपर आई जिम्मेदारियों और हालातों के साथ चलते हुए अपनी सोच में भी धीरे-धीरे बदलाव लाने की कोशिश की है, खासकर अपने बच्चों के साथ। वह उन्हें सहयोग देती है, प्रोत्साहित करती है, और उनकी पढ़ाई व रुचियों में उनके साथ खड़ी रहती है, साथ ही अपने सुझाव भी देती है। यह सफर अभी जारी है।
“आशा कहती है, जिसकी सीखने की चाह होती है, वो कुछ भी सीख लेता है और जिसे पढ़ने की चाह होती है, वो कैसे भी पढ़ लेता है।”
फिर से शुरू करने की रोशनी
पुस्तकालय की एक सुन्दर शाम है। फर्श पर गोल घेरा बनाकर बच्चे बैठे हैं, और एक कोने में आशा बैठी है। उसके हाथ में ‘चल मेरे मटके टम्मक टूं’ नाम की पुस्तक है। उसे पढ़ते-पढ़ते उसकी नज़र बच्चों पर पड़ती है, जहाँ वे अपनी-अपनी बातों से कहानी को आगे बढ़ा रहे होते हैं। आशा मुस्कुराकर उन्हें सुनती है और उनकी बातों में शामिल हो जाती है।

आज आशा रंग कारवां नाम की एक गैर-सरकारी संस्था के साथ जुड़ी है। यह वही जगह है जहाँ बच्चे रोज पुस्तकालय आते है और आशा पाठक के तौर पर लाइब्रेरी आकर उसकी अपनी पढ़ने की चाह फिर से जगा रही है। बाल साहित्य की किताबें, बच्चों की जिज्ञासु बातें, इन सबके बीच आशा अपने उस हिस्से से दोबारा मिल रही है, जिसे वह कहीं पीछे छोड़ आई थी।
उसने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ खोया, बहुत कुछ सहा, पर एक चीज़ कभी नहीं छोड़ी- सीखने की चाह। उसकी आंखों में अब भी वही चमक है, जो बचपन में थी। फर्क बस इतना है कि पहले वह चमक उसके सपनों के लिए थी, और अब वह चमक उसके बच्चों के लिए है।
आशा ने कड़वाहट नहीं चुनी। उसने शिकायत नहीं चुनी। उसने चुना, फिर से शुरू करना। इसीलिए 45 साल की उम्र में भी, इतनी गहरी उदासी को दिल में लिए, वह आज भी हँसती है, मज़ाक करती है और लगन से काम करती है।
आज जब गाँव वाले आशा को देखते हैं, जो हर मुश्किल को हँसी में उड़ाती है और लगन से काम करती है, तो उन्हें पता नहीं होता कि यह मुस्कान कितने टूटे हुए सपनों के बाद भी वही है। उसके भीतर, आज भी, सरकारी नौकरी की उम्र निकल जाने का दर्द ज़िंदा है। लेकिन फिर भी वो एक सकारात्मक ऊर्जा और हिम्मत के साथ मुझसे बोलती है, “जिसकी सीखने की चाह होती है, वो कुछ भी सीख लेता है और जिसे पढ़ने की चाह होती है, वो कैसे भी पढ़ लेता है।”
वह कहती है, “मैं कभी भी बिना किसी रोजगार के अपनी बेटी की शादी नहीं करूंगी, जिस तरह मै अपनी परिस्थितियों से जूझी वो परिस्थितीया मैं अपनी बेटी की जिंदगी में कभी नहीं आने दूंगी।
मज़बूती या व्यवस्था का बोझ?
अब वह एक ऐसी माँ या गृहिणी नहीं है जो सिर्फ लगनशील, धैर्य स्वभाव और मज़ाकिया बातें करे, बल्कि अब वह सपने देखने वाली और जिंदादिल भी है। उसके लिए सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और शायद यही समझ उसे उस चक्र को तोड़ने की ओर ले जाती है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। उसने शुरू से ही ठान लिया था कि अगर उसकी बेटियाँ होंगी, तो वह इस सिलसिले को अपने साथ खत्म करेगी।
हम अक्सर पहाड़ की महिलाओं को देखते हैं और उनकी मानसिक और शारीरिक मज़बूती की बात करते हैं, और वे सच में मज़बूत होती भी हैं। लेकिन कई बार हम इस मज़बूती की सराहना करते हुए उस व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाते, जो उन्हें इतना बोझ उठाने पर मज़बूर करती है, घर का काम, खेत का काम, गाय का काम और हर वह ज़िम्मेदारी जो अक्सर सिर्फ महिलाओं के हिस्से में आती है।
इसे कई बार ‘प्यार का श्रम’ कहा जाता है, और कुछ हद तक यह सच भी है। लेकिन ये शब्द उन भूमिकाओं को चुनौती नहीं देते, जो एक लड़की को जन्म के साथ ही दे दी जाती हैं।
आशा की कहानी के साथ बैठते हुए, शायद यह समझ भी धीरे-धीरे बदलती है, कि मज़बूती को सिर्फ देखना नहीं, उसके पीछे की वजहों को समझना भी ज़रूरी है।