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विजया – शिवालिक भांग की कहानी

 यूँ तो जब भांग की बात आती है, तो या तो नशा दिमाग में आता है, या फिर भारत का भांग के साथ एक धार्मिक रिश्ता। लेकिन यह कहानी है शिवालिक की घाटियों में पायी जाने वाली भांग की प्रजाति की एक ऐसी कहानी जिसमें इस पौधे का एक निजी पहलू हमें देखने को मिलता है। क्या भांग सिर्फ एक नशा है? नर और मादा भांग क्या होते हैं? उनकी उत्पत्ति में सूर्य और मौसम की क्या भूमिकाएं होती हैं? अगर इंसान भांग के पौधे को एक भावनात्मक स्तर पर समझता; तो क्या निष्कर्ष निकलता?

कहानीकर्ता : हनीष कतनावर
गाँव समाल, ज़िला कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश

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सितम्बर का महीना चल रहा है। चौमास लगभग ख़तम हो चुका है और शिवालिक घाटी में समुद्र तल से लगभग 800 मीटर ऊंचाई पर बसे समाल नामक गांव में सड़क के किनारों पर भांग के पौधे ख़ुशी से लहलहा रहे हैं। चौमास में मिले वर्षा के ताज़ा पानी ने उनकी जवानी में रुमानियत ला दी है। हल्की-हल्की हवा चल रही है और भांग की खुशबु से पूरा वातावरण महक रहा है। मिलन का समय पास है और नर भांग के पौधे अब और इंतज़ार नहीं कर पा रहे हैं। 

जंगली भांग के पौधे । फोटो: हिमालयन वाइल्ड फ़ूड प्लांट्स

“अरे सुनो ओ हवाओं ! ज़रा मेरे पराग को उसके पास ले जाओ। आखिर कोई तो हमारी विजया (मादा भांग) को बताए कि हमसे और इंतज़ार न हो पाएगा,” अच्युत (नर भांग) ने हवा में गुनगुनाते हुए कहा। 

विजया ने इस पुकार को सुना और ज़ोर से कहा, “अभी मत भेजो। सही समय नहीं है।”

“तो कब आएगा सही समय?”

“बस थोड़ा सा समय…. दिन थोड़े छोटे और रातें थोड़ी लम्बी हो जाएँ।”

“लेकिन ऊँचे पहाड़ों से आने वाली हवा तो कह रही है कि वहां के नर और मादा पौधों का शुभ विवाह हो गया कब का?” दुखी होकर अच्युत ने कहा।

“शायद उसे तेरा पराग नहीं, मेरा पराग चाहिए।” पास उगे उसके बचपन के दोस्त सिद्धा ने कहा। 

“अबे चल। तू उड़ा ले अपना पराग फिर, बर्बाद कर ले खुद को? दिखता नहीं कि न तो उसके फूल खिले हैं और न ही बीज आये हैं।”

“लेकिन हमें तो लगता है, समय हो गया है। देखो न ऊँचे पहाड़ों के नर और मादा तो फूल खिला चुके हैं और बीज भी उगा चुके हैं। “

“तुम दोनों चुप रहो। मैं अंदर से तैयार नहीं हूँ।”

अच्युत और विजया । फोटो: रॉयल क्वीन सीड्स

आसमान की ओर देखती विजया सिर्फ अच्युत या सिद्धा से नहीं बल्कि पूरी तरह से नर पौधों से घिरी हुई थी जो अपना पराग मादा को भेजने के लिए तैयार बैठे थे। लेकिन उसकी ज़रूरत रोमांटिक नहीं, अस्तित्व से जुड़ी थी। उसको लगता है कि अगर उसने समय से पहले फूल खिला दिए और बीज निकल आए; तो फिर उसके बुढ़ापे के साथ जब वो बीज गिरेंगे, वो बर्फ के आने से काफी पहले ही उग जाएंगे और फिर जब बर्फ आएगी, वो उतने बड़े नहीं हुए होंगे कि फूल ऊगा पाएं और उसकी आने वाली पीढ़ियों का वहीँ अंत हो जाएगा। लेकिन उसे नहीं पता कि शिवालिक की घाटियों में तो बर्फ गिरती नहीं और उसी इंतज़ार में वो महसूस नहीं कर पाती कि उसकी उम्र के हिसाब से भी एक दिन अंत होगा और वो भी शायद बिना किसी बच्चे के, बिना किसी भविष्य में होने वाली पीढ़ियों के। 

“पता नहीं आजकल की मादाओं को क्या हो गया है? मैंने तो सुना है पार्वती घाटी (ऊँचे पहाड़ों ) के नर पौधों  ने तो कब के अपने घर बसा लिए,” अपने पत्ते खुजाता हुआ सिद्धा बोला।

“वो सब तो बड़े लोग हैं। शान से खेतों में उगते हैं। हमारी तरह सड़क के किनारे गाड़ियों का धुआँ साफ़ नहीं कर रहे होते।” अच्युत ने कहा।    

 “मैंने तो ये भी सुना है कि कुछ-कुछ जगह पर सिर्फ मादाएं ही रहती हैं।”

“अच्छा! वहां पर तो मज़ा आ जाएगा। सोचो कोई दूसरा नर नहीं, बस मैं और मेरी अनगिनत मादाएं।”  

“लेकिन वो बिना नर के करती क्या हैं?”

“वही तो मैं भी सोचूं? लेकिन सुना है कि वो ज़्यादा लम्बा नहीं जी पातीं और ना ही बच्चा करती हैं।”

“बच्चा नहीं करती मतलब?”

“बीज ही नहीं निकालतीं। बस फूल निकालती हैं और नशे में झूमती हैं।”

“तुम लोगो अपनी बकवास करते रहोगे या मुझे सोने भी दोगे?” गुस्से में विजया ने दोनों को चिल्लाकर कहा। 

“तुम तो चुप ही रहो। तुम तो फूल भी नहीं निकालती।” सिद्धा ने कटाक्ष कस्ते हुए कहा।

“पहले कैसे निकाल दूँ। मुझे भी चाहिए कि मैं फूल निकालूँ।”

“तो फिर समस्या क्या है?” सिद्धा और अच्युत, दोनों ने साथ में कहा। 

“मैं जानती हूँ कि हम में से किसी के भी माँ-बाप ज़िंदा नहीं हैं और ना ही हमारी प्रजाति में से किसी ने आज तक अपने माँ-बाप को देखा है।  लेकिन कोई तो आवाज़ है जो मुझे अंदर से कहती है कि रातें लम्बी होने दे। ठण्ड बढ़ने दे और मैं चाहकर भी अपने फूल नहीं खिला पाती।”

“क्यों नहीं? उस आवाज़ को बोल चुप हो जा और निकाल दे फूल। क्या हो जाएगा ज़्यादा से ज़्यादा?” सिद्धा ने कहा।

“मुझे नहीं पता। शायद मैंने फूल समय से पहले खिला दिए, तुम्हारे पराग से बीज बन के गिर गया, और उसके बाद बर्फ पडी तो….? मेरा बच्चा तो इस दुनिया में आने से पहले ही ख़तम हो जाएगा ना?” दुखी होकर विजया ने कहा। 

“छोडो यार ये सब बातें। सो जाओ फिर देर हो जायेगी।” अच्युत ने जम्हाई लेते हुए कहा।

रात में विजया । फोटो: पीकड 

“मैं हूँ रात और ये तारे हैं मेरे बिखरे सपने,
सुबह होने तक चले ना जाएँ मेरे अपने,
न घर बसा सकूँ, ना सकूँ मैं मर,
गर्मियां गयीं और गयी बरसात, सर्दियाँ कहाँ चली गयीं हैं मटकने।” अपने आप में ही विजया सोचने लगी। 

६ महीने पहले ही मार्च में जब वो पहली जम्हाई लेकर ज़मीन से अंकुरित हुई थी, उसने अपने जैसे कइयों को पैदा होते देखा। पहले ६ हफ़्तों तक तो ये भी नहीं पता था कि वो नर है या मादा। न कोई माँ ना कोई बाप, ना चाचा ना मामा और ना ही कोई रिश्तेदार। बस अपने जैसे ही औरों को बड़े होते देखा। बस अंदर से यह पता थी कि जैसे ही रातें लम्बी हो जाएंगी, उसे फूल उगाके अपना घर बसा लेना है।   

उसी लम्बी रात का इंतज़ार करते करते अक्तूबर आ चुका है। अच्युत और सिद्धा को पता था कि अब वो और इंतज़ार नहीं कर सकते थे। ये कुदरत की विडम्बना थी कि वो दोनों तैयार थे और इंतज़ार नहीं कर सकते थे लेकिन विजया तैयार नहीं थी और इंतज़ार कर सकती थी।

“मैं तो सावन में भी ज़िंदा था लेकिन तेरे मौसम तक ठहर ना पाऊंगा,
मैं मरूंगा नहीं, बस सब कुछ देकर खाली होकर जाऊँगा,
मैं गिरूंगा नहीं, बस बिखर कर हवा हो जाऊँगा,

मैं जाना तो नहीं चाहता, लेकिन पतझड़ी मौसम में मैं गिर जाऊंगा।”, अच्युत ने इतना कहकर अपना पराग हवा में बहा दिया जो विजया के पत्तों से टकरा कर ज़मीन पर गिर गया। 

पीला पड़ा अच्युत । फोटो: ग्रो वीड ईज़ी    

सिद्धा ने अपनी जड़ों को हिलाकर एक आखिरी सलाम विजया को करते हुए अपना पराग हवा में बहा दिया। विजया यह सब देखकर और दुखी हो गयी।  सारे नर पौधे अपना पराग छोड़ चुके थे और अब अगर रात लम्बी हो भी जाती, तब भी उसके फूल में बीज नहीं बन पाते। 

नवम्बर आते-आते लगभग सब नर सूख कर लकड़ी बन चुके थे और मर चुके थे। विजया बूढ़ी हो चुकी थी और पीली पड़ने लगी थी।   

“रात ओ रात, क्यों ना लम्बी होती तू,

अब तो उतनी हरी भी ना रही मैं,

बिखर गए हैं सारे मेरे दोस्त,

बूढ़ी कली बन कर रह गयी, क्यों भरी नहीं मैं?”

आस पास में दूसरी बूढ़ी मादाओं से उसने सुना था कि ऊँचे पहाड़ों में तो सबने बीज बनाके अगली बसंत के लिए उनको ज़मीन में दबा दिया था और सब पौधे बर्फ के नीचे दबकर मर भी चुके थे। लेकिन इधर ना तो रात लम्बी  हो रही थी और ना ही बर्फ पड़ रही थी। ठंडी हवाएं नीचे की तरफ आकर एक कोहरे की चादर को पूरी शिवालिक घाटी में भर रही थी। 

कोहरे से ढकी विजया। फोटो: वैक्टीज़ी     

“क्या समय हो गया है? आज सुबह से चार घंटे हो गए हैं और सूर्य आया ही नहीं है,” विजया ने मन ही मन में सोचा। 

अगले दिन भी सूर्य नहीं आया और विजया मन ही मन फूली नहीं समा रही थी। 

“आ गया है मेरा मौसम। कहाँ हो अच्युत? कहाँ हो सिद्धा?”

अभी रोज़ धुंध पड़ रही थी। अगले ३-४ हफ्ते उसने पूरा ज़ोर लगाकर अपना फूल खिलाया लेकिन वो ज़्यादा बड़ा फूल नहीं खिला पायी क्यूंकि एक तो वो बूढ़ी हो चुकी थी और दिन में जो ज़रूरी धूप उसे चाहिए थे, वो मिल नहीं रही थी। धीरे-धीरे उसके संरक्षित पोषक तत्त्व भी ख़तम हो चुके थे। अब उसे पता चल गया था कि बहुत देर हो चुकी है। उसे चाहिए था कि वो अगले आने वाले बच्चों को बताये कि मौसम का इंतज़ार ना करें।  लेकिन अब उसमे ताकत नहीं बची थी। कोहरा रोज़ पड़ रहा था और सूर्य की रौशनी नहीं थी खाना बनाने कि लिए। विजया ने अपने पीले पड़ चुके पत्तों को देखा, उसमे से एक पत्ते पर अच्युत का थोड़ा सा पराग चिपका हुआ था।  

“अरे सुनो ओ हवाओं ! ज़रा मेरे पराग को उसके पास ले जाओ। आखिर कोई तो हमारी विजया को बताये की हमसे और इंतज़ार न हो पायेगा”, उसे अच्युत की कही बात याद आयी और उसके फूल से और राल निकली। उसने पूरी जान लगाकर अपना पत्ता ऊपर उठाया और अपना फूल नीचे किया। लेकिन कमज़ोरी की वजह से वो नाकामयाब रही। थोड़ी देर बाद और कोशिश की लेकिन नहीं कर पायी। चार दिन और बीत गए थे। उसे अंदर से महसूस हो गया था कि वो और नहीं टिक पाएगी। अब उसके अंदर पत्ते को उठाने की थोड़ी सी ताक़त भी नहीं बची थी। हवा का एक झोंका आया और अच्युत के पराग लगे पत्ते को तोड़ कर ऊपर ले गया।

अच्युत का पराग लगा विजया का पत्ता  । फोटो: सेन्सी सीड्स 

“शायद यही मेरा अंत है बिना प्रेम, बिना साथी और बिना बच्चे की एक दुखद ज़िन्दगी,” इतना कहकर उसने अपनी जड़ों से पानी ऊपर भेजना बंद कर दिया।

विजया की कहानी का अंत होने ही वाला था कि हवा से उड़ा वो पत्ता धीरे-धीरे नीचे आया और ठीक उसके फूल के ऊपर आकर बैठ गया। विजया को एक आखिरी मौका मिल गया और उसने तुरंत बीज बनाना शुरू कर दिया। कोहरा और गहरा हो रहा था लेकिन विजया को अपना उद्देश्य पूरा करने का पहला और आखिरी मौका मिला था। उसने तीन हफ्ते में ही बीज बना दिया और उसके बाद एकदम से पीली पड़ गयी। उसका मरना ज़रूरी था ताकि बीज ज़मीन में गिरकर मिटटी में चला जाए और फिर मार्च में अंकुरित हो। उसने उसके लिए अगले तीन महीने का खाना बीज के अंदर सब डाल दिया था।  दिसंबर के पहले दो हफ्ते ख़तम हो चुके थे और विजया का इस दुनिया को अलविदा कहने का समय आ चुका था। 

मरती हुई विजया। फोटो: सेन्सी सीड्स 

कहने को तो उसका जीवन पूरा इंतज़ार में बीता था। उसका जीवन लम्बा था और संघर्ष से भरा था। ऊँचे पहाड़ों के पौधों की तरह छोटा एवं विख्यात नहीं था लेकिन शायद उसका सब्र और बहादुरी आने वाले बीजों को मज़बूत बनाता था। उसका बीज तैयार था और धीरे-धीरे उसने अपने जड़ों से पानी ऊपर भेजना छोड़ दिया। वो धीरे-धीरे मर रही थी लेकिन बिना मरे वो बीज को ज़मीन में नहीं पहुंचा सकती थी। फिर जब वो पीली से भूरी बन गयी, उसका बीज गिर कर ज़मीन में चला गया और उस साल की शिवालिक की आखिरी भांग का पौधा भी मर चुका था। पूरी पीढ़ी ख़तम हो चुकी थी लेकिन विजया और उसके जैसी दूसरे मादा पौधों ने अपना भविष्य सुनिश्चित कर लिया था। 

 लेकिन कहानी तो अभी सिर्फ शुरू हुई है..आगे जुड़े रहे क्योकि इस कहानी का अगला भाग भी जल्द ही आएगा जिसमे हम वीजया एवं  अच्युत के बारे में और जानेंगे और साथ में ये भी जानेंगे कि इंसानो के साथ भांग का रिश्ता कैसे आगे बढ़ा ।  


*एक व्यक्तिगत नोट:

भांग के पौधे को हम अक्सर बहुत अलग-अलग चश्मों से देखते हैं।  कुछ इसे नशा, कुछ शिवजी का प्रसाद, कुछ दवा, और कुछ एक नकदी फसल की तरह देखते हैं।  लेकिन सबसे ज़रूरी है एक पौधे को सबसे पहले एक पौधे की तरह समझना।  आखिर क्यों हम सुनते हैं की ऊँचे पहाड़ों में पीने के लिए अच्छी चरस मिलती है? हमारे हिमालय की घाटियों में सड़क के किनारे पर भांग क्यों मिलती है? भांग के पौधे में जो नशीला तत्त्व पाया जाता है, वो आखिर क्यों है? हमारी कहानी में विजया को अच्युत या सिद्धा के पराग की ज़रूरत क्यों थी? ऊँचे पहाड़ों के पौधों में मादा पौधों का क्या महत्व है?

इसे समझने के लिए हमें परागण को समझना पड़ेगा। एक बहुत अच्छा उदहारण हम गेंहू के पौधे का ले सकते हैं। उसमे परागण की ज़रूरत नहीं पड़ती है क्यूंकि वह उभयलिंगी पौधा है। उभयलिंगी पौधा वह पौधा है जिसके एक ही फूल में नर (पुंकेसर) और मादा (जायांग) दोनों जनन अंग मौजूद होते हैं। इन्हें ‘पूर्ण फूल’ या ‘द्विलिंगी फूल’ भी कहा जाता है, जो मुख्य रूप से स्व-परागण करते हैं। लेकिन भांग का पौधा एकलिंगी होता है जिसमें नर (पुंकेसर) और मादा (स्त्रीकेसर) प्रजनन भाग अलग-अलग फूलों या अलग-अलग पौधों पर पाए जाते हैं। इसलिए उसमे नर अलग तथा मादा अलग होते हैं। 

तो हमारी कहानी में विजया बीज बना ही नहीं सकती है जब तक की उसे नर पौधे का पराग न मिले।  इसके अलावा भांग एक हिमालयी पौधा है तो उसकी सरंचना हिमालयी पर्यावरण के हिसाब से हुई है। बीज के बनने के लिए मादा पौधे का फूल बनाना ज़रूरी है और वो फूल तभी बनाएगी जब उसे लगेगा कि बर्फ पड़ने वाली है। फूल बनने के बाद अगली प्रक्रिया बीज बनने की है जो कि फूलों में बनते हैं और उनके बनने के लिए नर पौधे का पराग ज़रूरी होता है। पर-परागण की प्रक्रिया और हवा से बहुत सारे पौधे ऊँचे पहाड़ों से घाटियों में  पहुँच गए और अभी भी यहाँ मादा पौधा बर्फ का इंतज़ार करती है और उसी वेदना के ऊपर आधारित है विजया की ये कहानी।

सिद्धा और अच्युत जहाँ किसी ऊँचे पहाड़ों के किसी खेत में सिर्फ मादा पौधों की बात कर रहे हैं, वहां किसान दो किस्म की कृषि करते हैं। एक चरस के लिए और एक अगले सीजन के बीजों के लिए। चरस भांग के मादा पौधे के फूल से निकली राल होती है जिसको किसान रगड़ कर अपने पास रख लेते हैं । यह राल नर पराग को पकड़ने के लिए ज़रूरी है क्यूंकि वो उड़ता हुआ इससे चिपक जाता है और बीज पैदा हो जाता है । लेकिन अगर मादा पौधे को अलग कर दिया जाए; तो वो राल निकलती रहेगी नर पराग के इंतज़ार में और अच्छा एवं बढ़िया चरस निकलेगी।

तो इस किस्म का पारिस्थितिकी तंत्र भांग के पौधे का बना है जिसके पीछे बहुत सारे सामाजिक, कानूनी, एवं, क्षेत्रीय कारण हैं।     

Meet the storyteller

Haneesh Katnawer
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Haneesh Katnawer aka Katna is a social entrepreneur, inventor, and ghost writer. He is the co-founder of Himalayan Hemp Industries Pvt. Ltd. and Himalayan Hemp Research Foundation, a social entreprise working in preserving the indigenous variety of cannabis and hemp in the Himalayan Range. He is one of the inventors of world’s 1st reusable cannabis hemp sanitary pads. He has a knack to dwell in topics often less spoken and roads less travelled. With an experimental, experiential, and purposeless mindset, he believes in living life with an objective of trying something new every day. 

हनीष कतनावर उर्फ़ कटना एक सामाजिक उद्यमी, आविष्कारक और घोस्ट राइटर हैं। वे हिमालयन हेम्प इंडस्ट्रीज़ प्राइवेट लिमिटेड और हिमालयन हेम्प रिसर्च फ़ाउंडेशन के सह-संस्थापक हैं  एक सामाजिक उद्यम जो हिमालयी क्षेत्र में भांग और हेम्प की देशी किस्मों के संरक्षण पर कार्य करता है। वे दुनिया के पहले पुनःप्रयोग योग्य भांग आधारित सेनेटरी पैड्स के आविष्कारकों में से एक हैं। उन्हें उन विषयों में गहराई से उतरने का शौक है जिन पर आमतौर पर कम बात की जाती है और उन राहों पर चलने का जुनून है जो कम चली गई हैं। एक प्रयोगात्मक, अनुभवात्मक और निःस्वार्थ मानसिकता के साथ वे मानते हैं कि जीवन का उद्देश्य हर दिन कुछ नया आज़माना होना चाहिए

Voices of Rural India

Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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