गाँव में आऊट आफ स्टौक, शहर में ओवर स्टौक
गड़कोट की खामोश गलियों में लौटता रमेश सिर्फ अपना घर नहीं, बल्कि एक बदलता हुआ गाँव देखता है—बंद स्कूल, सूखे नौले और ताले लगे घरों के बीच बची हुई कुछ साँसें। शहरों की भीड़ और गाँव की खाली होती ज़िंदगी के बीच फँसी यह कहानी उन रिश्तों, यादों और सवालों को छूती है जिन्हें हम अक्सर पीछे छोड़ आते हैं। दादा-दादी की आवाज़ों, मिट्टी की गंध और बुझती रोशनियों के बीच एक सवाल बार-बार उभरता है, क्या सच में सब कुछ खत्म हो रहा है, या अभी भी कुछ बचा है? रमेश के भीतर चल रही यह जद्दोजहद सिर्फ उसकी नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है जो गाँव छोड़ चुके हैं, पर गाँव उन्हें अब भी नहीं छोड़ता। क्या एक व्यक्ति का लौटना कोई फर्क ला सकता है? लोग सपनों या बेहतर जीवन की तलाश में अपने गाँव छोड़ तो देते हैं, लेकिन क्या वे सच में कभी लौट पाते हैं?

कहानीकार- सचिन गड़कोटी
गड़कोट गाँव, जिला चंपावत,
उत्तराखंड
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रेखा, बस के पिछले हिस्से में बैठी रहीं, उसकी गोद में एक पुराना कपड़े का थैला था, और उसके भीतर एक मुड़ा-तुड़ा लिफाफा। वह पत्र तीन बार पढ़ चुकी थी….. चार बार….पाँच बार। शब्द उसे याद हो गए थे, फिर भी उसकी उँगलियाँ बार-बार उसे खोलती रहीं, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छूते रहो जानते हुए भी कि दर्द होगा।
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माँ,
मैं ठीक हूँ। काम मिल गया है, एक कारखाने में। सुबह छह बजे से रात आठ बजे तक। पैसे थोड़े कम हैं, पर रहने की जगह है। एक कमरा है, तीन और लोग हैं उसमें। सब अपने ही गाँव के आसपास के हैं।
माँ, यहाँ बहुत शोर है। रात को भी शोर होता है। नींद नहीं आती पहले–पहले। फिर आदत हो जाती है, लोग कहते हैं।
तुम खाना खाती हो न? बूबू की दवाई बंद मत करना। पैसे अगले हफ्ते भेजूँगा।
तुम्हारा, सुरेश
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रेखा ने लिफाफा बंद किया।
बस गड़कोट की तरफ से निकल रही थी। वो हल्द्वानी जा रही थी, सुरेश के पास। बूबू की दवाई खत्म हो गई थी, और वहाँ से मिलती नहीं थी। बस एक हफ्ते के लिए जाना था। या शायद ज़्यादा। उसे खुद नहीं पता था।
***
जैसे ही बस रुकी, रमेश की साँस भी रुक गई।
बाहर वही पहाड़ थे। वही बुरांश के पेड़। वही गोठ्या गाड़ की आवाज़ दूर से आती, जैसे कोई पुरानी दोस्त बुला रही हो। लेकिन रमेश के गांव, गड़कोट (उत्तराखंड में चंपावत जिले में 1,572 मीटर की उचाई पर स्थित) में कुछ था जो बदल गया था। वो नहीं जानता था क्या। बस महसूस हुआ।
सात साल! रमेश दिल्ली में सात साल रहा, एक छोटे से कमरे में, चार और लोगों के साथ, जहाँ रात को छत से पानी टपकता था और सुबह बस का शोर नींद तोड़ता था। लेकिन पैसे आते थे। इसीलिए रुका था।
आज माँ का फोन आया था।
“दादा जी को बुखार है। घर आ जा।”
बस इतना ही। माँ ने कभी ज़्यादा नहीं कहा।
रमेश ने बैग उठाया और चल पड़ा।

गाँव की पगडंडी पर जब उसने पहला कदम रखा, तो पैरों के नीचे की मिट्टी ने जैसे कुछ कहा। वो मिट्टी जिसमें उसने कभी लोहे की सरियों से खिलौना गाड़ियाँ दौड़ाई थीं। वो मिट्टी जिसमें उसके घुटनों के निशान अब भी होंगे कहीं बचपन की किसी शरारत के।
लेकिन अब पगडंडी पर कोई नहीं था…. न बच्चे। न आवाज़ें। बस हवा थी। और उसमें घुली हुई एक अजीब-सी खामोशी। रमेश आगे बढ़ा। दाईं तरफ रामलाल चाचा का घर था। दरवाज़े पर ताला। दीवार पर काई। खिड़की से एक पुराना कैलेंडर झाँक रहा था…..2019 का।

पाँच साल से ताला नहीं खुला। बाईं तरफ सुरेश का घर था, उसका बचपन का दोस्त, जो हल्द्वानी चला गया था किराने की दुकान खोलने। उसके घर की छत आधी गिर चुकी थी। अंदर घास उग आई थी। रमेश रुक गया। उसने एक लंबी साँस ली और फिर चल पड़ा इससे पहले कि आँखें भर जाएँ।
घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी थी। उसने रमेश को देखा और कुछ नहीं बोली। बस उठी और अंदर चली गई। माँ ऐसे ही थी, भावनाएँ आँखों में रखती थी, शब्दों में नहीं। दादा जी आंगन मे खाट पर लेटे थे। अस्सी साल, लेकिन आँखें अभी भी वैसी ही तेज़, चमकदार, जैसे किसी पहाड़ी झरने का पानी।
“आ गया।” दादा जी ने देखते ही कहा। न सवाल, न शिकायत। रमेश उनके पास बैठ गया।

“बुखार कब से है?”
“तीन दिन से।” दादा जी ने हाथ हिलाया जैसे बुखार कोई बड़ी बात न हो। “अस्पताल बारह किलोमीटर दूर है। जाना पड़ेगा कल चम्पावत। आज तू आ गया, बस यही दवाई थी।” रमेश को हँसी आई। आँखें भी भर आईं। दोनों काम एक साथ हुए। रात को जब माँ खाना बना रही थी, रमेश दादा जी के पास बैठा था। बाहर ठंड थी। अंदर एक छोटी-सी लालटेन जल रही थी। बिजली उस रात नहीं थी।
“दादा जी,” रमेश ने कहा, “गाँव में इतना सन्नाटा क्यों है?”
दादा जी ने छत की तरफ देखा।
“सन्नाटा नहीं है बेटा। बस आवाज़ें बदल गई हैं।”
“मतलब?”
“पहले बच्चों की किलकारियाँ थीं। अब बस हवा की साँय-साँय है। पहले ढोल-दमाऊ था, अब बस नदी का बहना है। आवाज़ें हैं बस जिन्हें सुनना आता हो।”
रमेश चुप रहा।
“तू कितने साल बाद आया?” दादा जी ने पूछा।
“दो साल।”
“दो साल।” दादा जी ने दोहराया जैसे उस संख्या का वज़न तौल रहे हों। “उन दो सालों में यहाँ तीन घर और बंद हो गए। दीनानाथ की बहू बच्चे को लेकर पिथौरागढ़ चली गई। मोहन के बेटे ने देहरादून में नौकरी पकड़ ली। और बीती होली… पहली बार हम सिर्फ चार घरों में मिले। पहले पूरा गाँव आँगन में होता था।”

कमरे में खामोशी आ गई।
बाहर हवा चल रही थी। कहीं दूर एक उल्लू बोला।
“और तुम?” रमेश ने धीरे पूछा। “तुम यहाँ क्यों रहे? क्यों नहीं गए कभी?”
दादा जी मुस्कुराए।
“क्योंकि जिस मिट्टी ने मुझे नाम दिया, उसे मैं कैसे छोड़ देता?”
अगले दिन सुबह रमेश ताऊजी के घर गया।
पैंसठ साल के ताऊजी, जो अभी भी रोज़ खेत जाते थे, अभी भी मवेशी पालते थे, अभी भी गाँव में थे।
ताऊजी ने रमेश को देखा और बिना कुछ कहे एक कप चाय थमा दी।
दोनों आँगन में बैठे। सामने पहाड़। नीचे घाटी। दूर नदी की चमक।
“ताऊजी, फसल कैसी है इस बार?”
ताऊजी ने एक लंबी साँस ली।
“फसल?” उन्होंने कहा, “बेटा, पिछले महीने रात को भालू आया। आलू के पूरे खेत उजाड़ दिए। उससे पहले बंदरों ने मक्का खाया। अब बचा है तो बस थोड़ी सब्जी, घर के लिए।”
“बेचने के लिए?”
“बेचने के लिए कुछ नहीं।” ताऊजी ने चाय की चुस्की ली। “और बेचें भी तो किसे? बाज़ार बीस किलोमीटर दूर है। ले जाने का किराया निकाले, तो मुनाफा कुछ नहीं बचता। ताउजी की बातें रमेश के दिमाग में बैठ गयी।
रमेश की नज़र स्कूल की पुरानी इमारत पर जाकर ठहर गई।
दरवाज़े पर ज़ंग लगा ताला था। अंदर से कोई आवाज़ नहीं, न बच्चों की हँसी, न मास्टर की डाँट, न चॉक की खरखराहट। बस एक भारी, थकी हुई खामोशी।
बचपन में यहाँ बीस-पच्चीस बच्चे पढ़ते थे। रमेश भी उन्हीं में से एक था।

काका ने एक दिन बताया था,”पहले एक मास्टरानी आई थी, पढ़ाती भी अच्छा था। फिर तबादला हो गया। बच्चे बचे एक, दो… फिर कोई नहीं।” और जब बच्चे नहीं, तो स्कूल किसके लिए?
रमेश को याद आया, शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने विधानसभा में बताया था कि उत्तराखंड में 826 सरकारी प्राथमिक स्कूल बंद हो चुके हैं। वजह वही गाँवों से पलायन, और शून्य नामांकन। और यह तो बस शुरुआत थी लगभग 3,600 और स्कूल बंद होने की कगार पर खड़े हैं।
यह स्कूल भी उन्हीं 826 में से एक था।

उसने ताले को एक बार और देखा।
सरकार एक अकेले वोटर के लिए पूरा मतदान केंद्र खोल सकती है, क्या एक बच्चे के लिए स्कूल नहीं चला सकती? शायद सवाल गलत नहीं था। बस जवाब देने वाला कोई नहीं था।
“इसीलिए लोग चले गए। इसीलिए जाते रहेंगे,” ताऊगी की आवाज़ रमेश के खयालो को तोड़ते हुए आई।
“तो आप क्यों रहे?”
ताऊजी ने रमेश की तरफ देखा। उनकी आँखों में कुछ था, थकान भी, और उससे परे कुछ और भी।
“क्योंकि अगर हम भी चले गए…” उन्होंने रुककर कहा, “ताऊजी ने खिड़की से बाहर देखा, खेत, जंगल, और वो पुरानी मुंडेर जो झुकी थी पर गिरी नहीं थी। फिर बोले, “अगर हम भी चले गए, तो होलिका कौन जलाएगा? मंदिर में दीप कौन धरेगा? जंगल को कौन बचाएगा, नहर का पानी कौन बाँटेगा, फसल का वक्त कौन पहचानेगा?” रमेश चुप रहा।
ताऊजी ने एक लंबी साँस ली और धीरे से कहा” बेटे, “गाँव बचता है तो लोगों से बचता है। और लोग तभी रहते हैं जब उन्हें लगे यहाँ रहने में कोई मतलब है।”

शाम को रमेश दादी के पास बैठा।
दादी बुन रही थीं, ऊन की एक पुरानी गेंद से, धीरे-धीरे। उनके हाथ झुर्रियों से भरे थे, लेकिन उनमें एक ताकत थी जो रमेश को हमेशा अचरज में डालती थी।
“दादी, गाँव पहले कैसा था?”
दादी रुकीं। उन्होंने ऊन नीचे रखी।
और फिर वो बोलीं कुमाऊँनी में, अपनी भाषा में जैसे उस भाषा में ही उनका दर्द था:

“जू खेती छी ऊ हमु हन हमरी रीढ़े हड्डी छी… आब त के शहारों ना रेगो।“
रमेश ने हर शब्द सुना।
खेती जो कभी रीढ़ थी अब वो सहारा नहीं रहा। फसल का दाम गिरा। पेट पालना मुश्किल हुआ। फिर एक-एक करके बच्चे गए, कोई दिल्ली, कोई देहरादून, कोई पिथौरागढ़, कोई टंकपुर।
“ढोल दमाऊ बाजछय गुन क आदमी एक दूसरा सामानेले काम चला लागचय आब त उन ले ना रे गए…”
ढोल-दमाऊ बजते थे, जागरण होते थे, पर ज़िंदगी सिर्फ मंदिर तक नहीं थी। ओल्टो-पाल्टो में आधा गाँव एक-दूसरे के खेत में उतर आता था, शादियों में बिन बुलाए लोग आते थे और काम बाँट लेते थे। अब वो लोग ही नहीं रहे और उनके साथ वो सब भी चला गया।
“आब यो कब बठे त पत लागछ की ऊ लगे निस गो…”
जब ये गाँव खाली होता दिखता है, तो लगता है वो सब लोग जैसे सपने थे।
रमेश ने दादी का हाथ थाम लिया।
दादी ने हाथ नहीं छुड़ाया।
दोनों चुप रहे। बाहर अँधेरा उतर रहा था। पहाड़ों पर बस दो बल्ब जल रहे थे।
दो।
रमेश को याद आया बचपन में इन्हीं पहाड़ों पर कितनी रोशनियाँ टिमटिमाती थीं।

तीसरी रात रमेश सो नहीं पाया। वो सोच रहा था उन दिनों हम बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी।
हम मिट्टी के घर बनाते, लोहे की सरियों से पहिए दौड़ाते, बिजली के तारों से खिलौना गाड़ियाँ बनाते। स्कूल पाँच किलोमीटर दूर था रास्ते में नदी आती, हम छलाँग लगाते, भीगे कपड़ों में घर लौटते और डाँट खाते। शाम को नदी किनारे आग जलाते, हाथ सेंकते, कहानियाँ सुनते। न मोबाइल था, न इंटरनेट, बस एक-दूसरे का साथ था, और वही काफी था।

वो छत पर चला गया। ठंड थी…. पहाड़ी ठंड, जो हड्डियों में उतरती है। आसमान में तारे थे, इतने सारे कि शहर में कभी नहीं दिखते।
उसने नीचे देखा।
पहाड़ की ढलान पर दो बल्ब।
सिर्फ दो।
उसे याद आई दादा जी की बात, “दो साल में तीन घर और बंद हो गए।“
उसे याद आई ताऊजी की बात, “अगर हम भी चले गए तो बचेगा क्या?”
उसे याद आई दादी की काँपती आवाज़।
और फिर उसे याद आया वो खबर जो उसने कुछ दिन पहले पढ़ी थी। उत्तराखंड के 16,919 गाँवों में से 734 पूरी तरह वीरान हो चुके हैं। 3 लाख 83 हज़ार लोग पहाड़ छोड़ चुके हैं।
हर गाँव में एक दादा जी रहे होंगे। हर गाँव में एक दादी की काँपती आवाज़ रही होगी। हर गाँव में किसी न किसी छत पर कोई रमेश बैठा रहा होगा और देखता रहा होगा, रोशनियाँ एक-एक करके बुझते हुए।
रमेश की मुट्ठी भिंच गई।

सुबह दादा जी उठ बैठे थे। बुखार उतर गया था। रमेश उनके पास गया।
“दादा जी, मुझे एक बात पूछनी थी।”
“पूछ।”
“अगर… अगर मैं वापस आ जाऊँ। यहाँ रहूँ। कुछ करूँ, बच्चों को पढ़ाऊँ, खेती में कुछ नया सोचूँ, गाँव की आवाज़ बाहर पहुँचाऊँ… तो क्या फर्क पड़ेगा?”
दादा जी ने उसे देखा। लंबे समय तक देखते रहे।
फिर बोले धीरे, लेकिन बिल्कुल साफ, “तू जानता है, पाँच साल पहले ऊपर वाले टोले का नौला बंद हो गया था। पानी आना बंद। औरतें दो किलोमीटर दूर से लाती थीं।”

रमेश ने सिर उठाया।
“किसी ने कहा नहीं, कोई बैठक नहीं हुई। बस एक सुबह हरिया काका अपनी कुदाल लेकर निकल पड़े। फिर देखते-देखते चार आए, फिर आठ। तीन दिन लगे नौला साफ हुआ, पानी फिर बहने लगा।”
दादा जी रुके।
“न सरकार आई, न कोई फंड आया। बस लोग आए।”
रमेश के मन में कुछ हिला। वो गाँव जो उसे खाली लगा था, वो पूरी तरह खाली नहीं था। बस किसी एक की ज़रूरत थी जो पहले कुदाल उठाए।
दादा जी ने उसे देखा। फिर बोले धीरे, लेकिन बिल्कुल साफ, “एक दीपक जलाओ अँधेरे में। फर्क तो पड़ता है। चाहे कोई देखे या न देखे।”

बस के आने में एक घंटा था।
रमेश आँगन में खड़ा था। उसका बैग तैयार था।
माँ अंदर थी।
दादा जी खाट पर बैठे धूप सेंक रहे थे।
रमेश ने एक बार पूरे गाँव को देखा….खाली घर, टूटे आँगन, सूनी गलियाँ। और उन सबके बीच चार घरों में उठता धुआँ। चार घरों में जलती आग। चार घरों में ज़िंदगी।

उसने बैग उठाया।
और फिर रख दिया।
“दादा जी।”
“हाँ।”
“मैं… मैं एक महीने और रुकूँगा।”
दादा जी ने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराए।
वो मुस्कान…. उसमें पूरा गाँव था। गड़कोट अभी भी है। 1,572 मीटर की ऊँचाई पर। चार परिवारों के साथ। गोठ्या गाड़ की आवाज़ के साथ। बुरांश की खुशबू के साथ। पहाड़ों पर अभी भी दो बल्ब जलते हैं। लेकिन शायद कल तीन होंगे।

पर कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती…….
और यही सवाल है जो हवा में गूँजता रहता है,
क्या हम सिर्फ त्योहारों पर लौटेंगे, या एक दिन सच में लौटेंगे?
क्या हम अपने गाँव को गूगल मैपस पर ढूँढेंगे, या उसकी मिट्टी पर पाँव रखेंगे?
और सबसे बड़ा सवाल
जो दीपक बुझने वाले हैं, उन्हें जलाए रखने की ज़िम्मेदारी किसकी है?
गड़कोट की कहानी सिर्फ एक गाँव की कहानी नहीं है। यह उत्तराखंड के उन 734 वीरान गाँवों की कहानी है। यह हर उस इंसान की कहानी है जिसने अपनी जड़ें छोड़ीं, चाहे मजबूरी में, या सपनों के लिए।
लेकिन जड़ें कभी झूठ नहीं बोलतीं। वो हमेशा खींचती हैं…… वापस!