A village stepwell in Palampur symbolising memory, belonging, and the Gorkhali community’s roots in Himachal.
Citizenship & Rights,  Community,  Culture,  Himachal Pradesh,  Hindi,  Migration,  Rural Life

हम इस मिट्टी के हैं

हिमाचली गोर्खाली समुदाय की कहानी

अंगीठी की लौ से शुरू हुई यह कहानी नेपाल की पहाड़ियों से हिमाचल की घाटियों तक फैली उस अनकही यात्रा को खोलती है, जहाँ घर बसाए गए, खेत जोते गए, वर्दियाँ पहनी गईं—फिर भी “बाहरी” कहा गया। दादी की स्मृतियों, काग़ज़ों में अटके नामों, पंचायत के बंद दरवाज़ों और त्योहारों की ढोलक के बीच एक सवाल लगातार गूँजता है: अगर हड्डियाँ इस मिट्टी की हो चुकी हों, तो अपना होने का सबूत और कितना देना पड़ता है?

कहानीकर्ता : शांति देवी
गाँव बनोरू, ज़िला कांगड़ा,
हिमाचल प्रदेश

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सुबह की पहली रोशनी जब धौलाधार की चोटियों से फिसलती हुई कांगड़ा ज़िले में स्थित हमारे गाँव पालमपुर तक पहुँचती है, तो ऐसा लगता है जैसे पहाड़ों ने रात भर अपने आँचल में सूरज को सहेज कर रखा हो। हवा में चील के पेड़ों की गीली-सी सुगंध तैरती रहती है, हल्की, राल जैसी, जिसमें मिट्टी की नमी घुली हो। उसी हवा को साँस में भरते हुए मैं अपने घर की दहलीज़ पर खड़ी होती हूँ, जहाँ से सामने की सड़क और उसके पार फैला वह मैदान साफ दिखाई देता है।

सड़क के उस पार का मैदान साल के ज़्यादातर दिनों में शांत रहता है—घास पर ओस की बूँदें, किनारे-किनारे चरती गायें, और बच्चों के पैरों के निशान। लेकिन मेले के दिनों में यही जगह बदल जाती है। अचानक रंगीन तंबुओं की कतारें उग आती हैं, ऊँचे झूले आसमान को छूने लगते हैं, और गुब्बारों की डोरियाँ बच्चों की मुट्ठियों में थरथराती हैं। मैदान के ठीक पीछे, साफ मौसम में, धौलाधार की सफ़ेद चोटियाँ ऐसे झलकती हैं जैसे वे भी इस रौनक को दूर से निहार रही हों।

लेकिन मेरे गाँव की असली धड़कन उस मैदान में नहीं, बल्कि उससे थोड़ा हटकर, सफ़ेदा के ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की छाँव में छिपी है।

सफ़ेदा का पेड़ / फोटो: NIBSM

मेरे घर से पचास कदम की दूरी पर, सड़क के ठीक दाहिने ओर, पत्थर की सीढ़ियों से नीचे उतरती एक बाबड़ी (भूमिगत जल भंडार) है। ऊपर से देखने पर बस एक खुला-सा चौकोर मुंह दिखता है, लेकिन जैसे ही सीढ़ियाँ उतरते हैं, भीतर ठंडक का एक अलग संसार खुल जाता है। दीवारों पर जमी काई की हरियाली, पानी की सतह पर हल्की-सी लहर, और नीचे तक जाती सीढ़ियों पर पांवों की पुरानी रगड़, सब मिलकर इस जगह को समय से बाहर-सा बना देते हैं।

मेरे गाँव की सबसे बड़ी खासियत हैं क्योंकि आज के दौर में पानी के सारे स्त्रोत सुख गए हैं और यहाँ तो नल का पानी भी मुश्किल से ही आता है। ऐसे मे ये बाबड़ी  का पानी साल के बारह महीने भरा रहता है। एकदम ठंडा, साफ और मीठा! धूप ऊपर कितनी भी तेज़ क्यों न हो, नीचे उतरते ही हवा ठंडी हो जाती है।

सुबह-सुबह अलग-अलग गाँवों की औरतें यहाँ मिलती हैं, घड़ों की खनक, पायल की हल्की आवाज़ और आपसी बातों के बीच यह बाबड़ी एक मिलन-स्थल बन जाती है। दूसरे गाँव से आई सुमित्रा जी हर बार पानी चखकर मुस्कुरा देती हैं, “इसमें जो मिठास है, वो कहीं और नहीं।” और सच में, हथेलियों से पीया गया वह पानी सिर्फ प्यास नहीं बुझाता, वह जैसे इस ज़मीन की स्मृति भी भीतर उतार देता है।

बाबड़ी से नीचे उतरने के लिए सीढ़िया। फोटो: शान्ति

पंद्रह साल पहले की बात है।

शाम हमारे लिए दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करती थी। जैसे ही सूरज ढलान की तरफ झुकने लगता, आसमान हल्के नारंगी से गुलाबी होने लगता और गाँव की पगडंडी पर हमारी परछाइयाँ लंबी-लंबी होकर साथ चलतीं। हाथों में खाली घड़े होते, पीतल और प्लास्टिक के, जो हर कदम पर हल्की-सी खनक देते।

बाबड़ी तक पहुँचते-पहुँचते हवा ठंडी हो जाती। सफ़ेदा के पेड़ों की पत्तियाँ ऊपर सरसरातीं और नीचे पत्थर की सीढ़ियाँ दिन भर की धूप छोड़कर अब ठंडी पड़ चुकी होतीं। जैसे ही हम नीचे उतरते, भीतर की नमी और सन्नाटा हमें घेर लेता।

मैं हमेशा सबसे आगे बढ़कर पानी छूने की कोशिश करती और हर बार उँगलियाँ सुन्न पड़ जातीं। मैं झट से हाथ पीछे खींच लेती और बनावटी नाराज़गी में कहती,

“नहीं, आज मैं पानी नहीं भरूँगी! बहुत ठंडा है!”

बस, इतना कहना होता कि छोटी-छोटी तकरारें शुरू।
 “तो फिर आई क्यों?”
 “हर बार यही करती है!”
 कोई अपना घड़ा ज़मीन पर धप्प से रख देती, कोई सीढ़ियों पर बैठकर पैर पानी में डुबो देती।

धीरे-धीरे पानी भरने की जल्दी खत्म हो जाती। हम वहीं टिक जाते… पत्थरों पर, सीढ़ियों पर, दीवार से टिककर। कोई किसी की चोटी खींच देता, कोई राज़ खोल देता, कोई दिन भर की किसी डाँट की कहानी सुनाने लगता। हमारी हँसी पत्थर की दीवारों से टकराकर गूंजती, फिर पानी की सतह पर हल्की लहर बनकर फैल जाती।

ऊपर आसमान गहरा होता जाता। बाबड़ी के भीतर अँधेरा थोड़ा-थोड़ा उतरने लगता, और आसपास की आवाज़ें कम हो जातीं, बस बाल्टी के पानी में डूबने की ‘छप’ सुनाई देती।

फिर अचानक, दूर से किसी माँ की आवाज़ आती—
 “कितनी देर लगा दी?”
 “अभी तक पानी नहीं भरा?”

उन आवाज़ों में चिंता घुली होती। हम एक-दूसरे की ओर देखते, घबराकर हँसते और फौरन हरकत में आ जाते। झटपट घड़े भरते और फिर सिर पर रखकर, संभालते-संभालते, घर की ओर दौड़ पड़ते। रास्ते में भी हँसी नहीं रुकती।

आज, जब शाम ढलती है और आसमान वही नारंगी रंग ओढ़ लेता है, तो लगता है जैसे बाबड़ी अब भी इंतज़ार कर रही हो, हमारी उन बेफिक्र आवाज़ों का, उन ठंडे पानी से सुन्न हुई उँगलियों का, और उन लंबी परछाइयों का जो कभी उसके पत्थरों पर ठहर जाया करती थीं।

आज भी शाम ढलते वक़्त, उस ठंडे पानी और उन शरारती हँसियों की याद अपने आप लौट आती है।

उस बाबड़ी ने कभी मुझसे मेरा नाम नहीं पूछा। न ही यह कि मैं किस जाति की हूँ, किस भाषा में सपने देखती हूँ, या मेरे पुरखे किस पहाड़ से आए थे। उसने कभी मेरे या मेरे समुदाय के गोरखाली होने पर सवाल नहीं उठाया। जब भी हम उसकी सीढ़ियाँ उतरते, वह हर बार उसी ठंडे, मीठे पानी से हमारा स्वागत करती। पानी की सतह पर झुकते हुए चेहरों में उसे फर्क दिखाई नहीं देता था। उसके लिए हम बस प्यासे लोग थे, और वह बस एक स्रोत। शायद इसी वजह से हमें उसके पास सुकून मिलता है। क्योंकि वह हमें वैसे ही स्वीकारती है, जैसे हम हैं, बिना शर्त।

हमने हिमाचल को हमेशा अपना घर माना है। इन पहाड़ियों की ढलानों पर हमने चलना सीखा, इन्हीं हवाओं में हमारी पहली साँसें घुलीं। स्कूल जाते हुए जिन रास्तों पर धूल उड़ती थी, वही रास्ते हमारे बचपन की दौड़ के गवाह हैं। बरसात की पहली बूँदें जब मिट्टी पर गिरती हैं, तो जो गंध उठती है, वह किसी और जगह की नहीं लगती, वह हमारी अपनी है।

पर अजीब बात है।

जिस मिट्टी पर मैंने अपने पहले कदम रखे, उसी ज़मीन के सामने आज भी मुझे अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है। कागज़ों में, सवालों में, नज़रों में….बार-बार! कभी नाम सुनकर, कभी चेहरे की बनावट देखकर, कभी बस इसलिए कि हम “यहाँ के” नहीं लगते।

तब मन में एक ही बात उठती है। अगर यह बाबड़ी हमें अपना मानती है, तो फिर लोग क्यों नहीं?

बाबड़ी से निकलता हुआ पानी / फोटो: शान्ति

हमारे बारे में लोग अक्सर एक ही तरह की बातें कहते हैं,
“गोरखाली लोग मेहनती होते हैं।”
“सच्चे होते हैं।”
“भरोसेमंद होते हैं।”

यह वाक्य सुनने में तारीफ़ जैसे लगते हैं….

गाँव में अगर किसी को रात की चौकीदारी करनी हो, खेतों में कटाई करानी हो, या खड़ी चढ़ाई से सीमेंट की बोरियाँ ढोनी हों, तो सबसे पहले हमारा ही नाम लिया जाता है। “किसी गोरखा को बुला लो, काम ईमानदारी से करेगा,” लोग कहते हैं।

लेकिन कभी-कभी मैं सोचती हूँ, क्या हम सिर्फ भरोसे के लिए ही बने हैं? क्या मेहनत ही हमारी पूरी पहचान है?

हालाकि यह पहचान कभी अधिकार में नहीं बदल पाई। हम खेत जोतते रहे, पर खेत हमारे नहीं हुए। हमने घर बनाए, पर उन घरों की दीवारों पर हमारा नाम नहीं लिखा गया। हमने रास्ते साफ़ किए, पर रास्ते हमें कहीं अपना नहीं ले गए।

दादी अक्सर आह भरकर कहती हैं,“हमने इस ज़मीन को अपने पसीने से सींचा है… पर ज़मीन आज भी हमारे नाम नहीं है।”

आग, किस्से और अधूरी ज़मीन

दादी अंगीठी के पास बैठा करती थीं, ठीक वहीं, जहाँ दीवार का कोना धुएँ से काला पड़ गया था। चिमटे से जब वे जलती लकड़ियों को कुरेदतीं, तो राख के साथ छोटी-छोटी चिंगारियाँ हवा में उछलतीं और एक पल को उनके चेहरे पर लाल रोशनी तैर जाती। उनकी कलाई हल्की-सी काँपती थी। उनके सफ़ेद बाल आग की लौ में चमकते थे। आँखों के नीचे की गहरी लकीरें आग की परछाइयों में और गहरी दिखतीं। जब वे किसी बात पर ठहर जातीं, तो लगता जैसे कमरे की हवा भी थम गई हो।

सर्दियों की एक लंबी शाम थी। बाहर धुंध खिड़की के शीशों से चिपकी थी और भीतर अंगीठी की आग लाल होकर धधक रही थी। मैं, मेरी बहन और भाई आग के पास घुटनों को सीने से लगाकर बैठे थे। लकड़ी की एक नई फाँक अंगीठी में डाली तो चिंगारियाँ उछलीं और कमरे की दीवारों पर थरथराती रोशनी फैल गई। उसी रोशनी में दादी ने नेपाल का ज़िक्र शुरू किया।

उन्होंने चिमटा धीरे से किनारे रखा और कहा, “जब मैं बारह साल की थी… तब हम यहाँ आए थे।”

उनकी आवाज़ में एक पुराना रास्ता खुलता चला गया।

उन्होंने बताया कि नेपाल में ज़मीन बहुत थी। लेकिन उन खेतों में उगती फसल पेट से आगे नहीं बढ़ पाती थी। मिट्टी उपजाऊ थी, पर रोज़ की कमाई का भरोसा नहीं था। सुबह से शाम तक मेहनत होती, फिर भी घर की ज़रूरतें अधूरी रह जातीं।

उन्होंने बताया कि उनके पिता ने एक दिन चुपचाप फैसला लिया, पहाड़ पार करने का, घर छोड़ने का, एक नई जगह पर किस्मत आज़माने का। बारह साल की एक लड़की, कुछ गठरियाँ, और एक लंबा रास्ता। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा या नहीं, यह उन्होंने कभी साफ़ नहीं कहा। बस इतना कहती, “हम फिर लौटे नहीं।”

उस वाक्य के बाद अक्सर उनकी आवाज़ धीमी पड़ जाती थी। अंगीठी की लकड़ी चटकती, और कमरे में एक लंबी खामोशी फैल जाती।

“हम गीत गाते थे…” उन्होंने एक बार बहुत धीरे से कहा था, और उनके होंठों पर वही अधूरी-सी मुस्कान आ गई थी।

उनकी आँखों में उस समय आग की परछाई के साथ कुछ और भी चमकता, शायद धूप से भरे वे दिन, शायद छोड़े हुए आँगन। उनके चेहरे की झुर्रियाँ जैसे उन रास्तों का नक्शा बन जाती थीं, जिनसे वे कभी गुज़री थीं।

मैं उन्हें देखती रहती और सोचती, नेपाल उनके लिए सिर्फ़ एक जगह नहीं था। वह उनके भीतर बसा हुआ एक घर था, जिसे वे अपने साथ यहाँ तक ले आई थीं।

पिता का फैसला मजबूरी था। ज़िम्मेदारी का बोझ और बेहतर जीवन की उम्मीद।

उनके पिता जी ने पालमपुर में एक छोटी-सी चाय की दुकान खोली और साथ ही खेतों में काम किया। उन्होंने यहाँ की बंजर भूमि और जंगली काँटेदार झाड़ियों को काटकर कड़ी मेहनत से उसे रहने लायक बनाया।

दादी हमेशा कहती थीं, “मिट्टी एक बार पैरों से लग जाए तो वह अपनी हो जाती है, चाहे कोई कहीं से भी आए।”

और सचमुच, उनके पैरों से लगी वह मिट्टी अब हमारी अपनी हो गई थी।

काग़ज़ और चेहरा

दादी के पिता की कहानी समय के पार चली जाती और आज में आकर ठहर जाती, कृशन बहादुर पर।

कृशन बहादुर, गोर्खा समुदाय से, बरसों तक भारतीय सेना की वर्दी में पहाड़ों, सीमाओं और बर्फ़ीली चौकियों पर डटे रहे थे। अट्ठाईस साल तक उनका नाम हाज़िरी में देश के साथ जुड़ा रहा। सेवामुक्त होने के बाद उन्होंने सोचा, अब बंदूक की जगह हल थामेंगे, और अपने परिवार के साथ शांति से बसेंगे। वे कुल्लू की घाटी में, दोभी नाम के छोटे-से गाँव में आकर बस गए। उन्हें लगा, जिस देश के लिए आधी उम्र खड़ी-खड़ी गुज़ार दी, वहाँ ज़मीन का एक टुकड़ा माँगना सवाल नहीं, अधिकार होगा।

लेकिन वर्दी उतरते ही जैसे अपनापन भी उतर गई।

एक दिन वे साफ़-इस्त्री किए कागज़ात लेकर दफ़्तर पहुँचे थे। फ़ाइल में सेवा प्रमाण पत्र करीने से लगे थे, मुहरें, हस्ताक्षर, तारीखें। बाबू ने सरसरी नज़र डाली, फिर फ़ाइल मेज़ पर सरका दी। “आप तो नेपाली हो… यहाँ क्यों ज़मीन खरीद रहे हो?”

कृशन बहादुर ने बिना आवाज़ ऊँची किए अपने दस्तावेज़ आगे बढ़ाए, “अट्ठाईस साल की सेवा है मेरी।” लेकिन कमरे में कागज़ों की सरसराहट से ज़्यादा वज़न उनके चेहरे पर टिकी नज़र का था। जैसे वर्दी से पहले और बाद के बीच कोई गहरी रेखा खींच दी गई हो। फ़ाइल किनारे सरक गई। बात वहीं ठहर गई।

आज तक वे उस गाँव में ज़मीन नहीं ले पाए।

हमारे गाँव में लोग हमें “गोर्खा” कहते हैं। कभी यह शब्द कंधे पर हाथ रखकर बोला जाता है, कभी थोड़ा पीछे हटकर। प्यार से कहा जाए तो उसमें भरोसा झलकता है कि हम साथ खड़े रहेंगे, चाहे जैसा भी वक़्त हो। और दूरी से कहा जाए तो उसमें एक अदृश्य रेखा महसूस होती है, जैसे अब भी हमें पूरी तरह “अपना” मानने में हिचक हो।

कभी-कभी सोचती हूँ, क्या पहचान सिर्फ़ कागज़ों से तय होती है? या उन हाथों से, जिन्होंने इस मिट्टी को काट-छाँटकर घर बनाया है?

दादी कहती हैं, जब सरकार बनाने की बारी आती है तो हम अचानक सबको अपने लगने लगते हैं। लेकिन हमें पता है कि यहाँ लोग हमें अक्सर एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं।

हम वोट डालते हैं, पंचायत की बैठकों में जाते हैं, सरकारी योजनाओं में नाम दर्ज करवाने की कोशिश करते हैं। पर जब असली पहचान के कागज़ों की बात आती है, राशन कार्ड, भूमि रिकॉर्ड, जाति प्रमाणपत्र, तभी अचानक हमें “यहाँ का नहीं” कह दिया जाता है।

दफ़्तर की मेज़ के उस पार

पिछले साल, 2024 का एक लंबा और थका देने वाला दिन था। राधा, मेरी पड़ोस की बहन, अपने पति के साथ राशन कार्ड बनवाने सरकारी दफ़्तर गई थी।

जैसे ही वे दफ़्तर में दाखिल हुए, कमरे की हल्की मद्धम रोशनी आँखों पर पड़ी। कंप्यूटर की लगातार खटखटाहट और प्रिंटर की भिनभिनाहट सन्नाटे को चीर रही थीं। कोई कुर्सी खिसकाता, कोई फ़ाइल पलटता, छोटी-छोटी आवाज़ें उस थके हुए दफ़्तर की दिनचर्या बता रही थीं।

राधा ने अफ़सर के सामने दस्तावेज़ रखे। उसका हाथ हल्का काँप रहा था, पर आवाज़ संयत थी। “सर, हमें राशन कार्ड बनवाना है।”

अफ़सर ने बिना ठीक से ऊपर देखे फ़ाइल पर नज़र डाली और कहा, “तुम लोग तो बाहरी हो, तुम्हारे कागज़ पूरे नहीं हैं।” राधा को भीतर हल्का-सा झटका लगा, फिर भी उसने हिम्मत जुटाई। “साहब, मेरे दादा यहीं पैदा हुए थे। हमारे पास वोटर कार्ड भी है।”

अफ़सर हँसा। उसकी हँसी कमरे में ठहर गई। “वोट डालना आसान है, पर असली हिमाचली बनना नहीं।”

राधा को लगा जैसे पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। प्रिंटर की भिनभिनाहट, कंप्यूटर की खटखटाहट, फ़ाइलों की सरसराहट, हर आवाज़ उस अपमान को और गहरा कर रही थी।

बाहर निकलते हुए उसने धीमे से कहा, “दिन में भरोसा करने वाले ही रात को हमें बाहरी कह देते हैं।”

उसकी आवाज़ काँप रही थी, गुस्से और दर्द से। दफ़्तर, अफ़सर की हँसी और कागज़ों की दुनिया, सबने मिलकर उसके भीतर चोट और दृढ़ता, दोनों को एक साथ जगा दिया।

गोर्खाली समुदाय के लोग खुदाई का काम करते हुए | फोटो: शान्ति

ईमानदारी, मेहनत ये हमारी ताक़त हैं, पर कभी-कभी यही शब्द हमें बाँध देते हैं। क्योंकि जब पहचान “अच्छे” या “भरोसेमंद” होने पर टिके, तो बराबरी नहीं रह जाती, सिर्फ़ एक शर्त वाला अपनापन रह जाता है। मुझे आज भी याद है, स्कूल में मैं अक्सर यह सुनती थी,“तू तो नेपाली है ना?”तुम्हारी आंखे इतनी छोटी क्यूँ है? तुम हिन्दू हो या मुस्लिम? कभी मज़ाक में, कभी ताने में। शुरू-शुरू में मुझे फर्क नहीं पड़ा, पर धीरे-धीरे समझ आया कि यह सिर्फ़ शब्द नहीं, एक दूरी है। मैं हमेशा सोचती थी कि हम अलग क्यों हैं? क्या हिमाचल का होना सिर्फ़ समुदाय, जाति और कागज़ से तय होता है?

खेत का काम करते हुए गोर्खाली महिलाएं | फोटो: Swissinfo.ch

घर की मिट्टी, बंद दरवाज़े

एक बार मैंने दादी से पूछा, “दादी, क्या आप कभी नेपाल वापस जाना चाहती हैं?”

वे आँगन की मिट्टी पर उँगलियों से अनजाने में लकीर खींच रही थीं। थोड़ी देर चुप रहीं, फिर बोलीं,
“अब कौन सा नेपाल? हमारी हड्डियाँ इस मिट्टी की हो चुकी हैं। अगर हमें यहीं से हटा देंगे, तो हम कहाँ जाएँगे?”

उनकी आवाज़ में डर नहीं, एक ठहरी हुई सच्चाई थीं। मैं उन्हें देखती रही। मुझे लगा, यह सवाल सिर्फ़ उनका नहीं था। मैं खुद भी हिमाचल छोड़कर कहीं और रहने की कल्पना नहीं कर पाती, चाहे वह नेपाल ही क्यों न हो।

दादी कभी-कभी बताती थीं कि उनके पिता ने यहाँ पहला घर कैसे बनाया। “छोटा-सा मिट्टी का घर था, छत स्लेट की। बरसात में छत पर बूंदें इतनी तेज़ बजती थीं कि हमें अपनी आवाज़ ऊँची करनी पड़ती थी।” वे हल्का मुस्कुरा देतीं। “जब हम छोटे थे, उसी घर में रहते थे।”

मैं अक्सर सोचती हूँ, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी किसी जगह को घर बनाने में लगा दी, क्या वह फिर भी ‘बाहरी’ रह सकता है?

अब हमारे समुदाय की महिलाएँ पहले जैसी चुप नहीं रहीं। पंचायत की बैठकों में मेरी माँ और उनकी सहेलियाँ पीछे बैठकर सिर झुकाए नहीं रहतीं; वे काग़ज़ साथ लाती हैं, सवाल भी।

उस दिन की बैठक कुछ ज़्यादा ही लंबी थी। कमरा छोटा था, पर आवाज़ें भारी। सामने की कुर्सियों पर पुरुष बैठे थे; महिलाएँ पीछे दीवार से सटी खड़ी थीं, हाथों में फ़ाइलें।

जब हमारे समुदाय के एक परिवार का नाम सूची में जोड़ने की बात आई, तो प्रधान ने बिना ऊपर देखे कहा,
“इसकी ज़रूरत नहीं है।”

आवाज़ सपाट थी, जैसे फ़ैसला पहले ही लिखा जा चुका हो।

कमरे में एक पल को सन्नाटा ठहर गया। महिलाओं ने एक-दूसरे की ओर देखा; किसी ने होंठ भींच लिए, किसी ने फ़ाइल की पकड़ कस ली।

एक महिला ने साफ़ स्वर में पूछा,
“बिना नाम के बच्चे स्कूल में कैसे आगे बढ़ेंगे?”

प्रधान कुर्सी से टिक गया।
“नियम ऐसे ही हैं।”

काग़ज़ मेज़ पर ही रह गए। बैठक वहीं समाप्त कर दी गई, पर सवाल कमरे की दीवारों में अटका रह गया।

अगली सुबह वे महिलाएँ तहसील जाने के लिए निकलीं। पहाड़ी रास्ते पर धुंध पसरी थी, जूतों के नीचे गीली मिट्टी चिपक रही थी। बस स्टॉप पर खड़ी वे चुप थीं, कोई दूर पहाड़ों की तरफ़ देख रही थी, कोई धीमे स्वर में बच्चों की पढ़ाई की बात दोहरा रही थी, “अब बारहवीं के बाद क्या होगा?”

उनके हाथों में कुछ मुड़े हुए काग़ज़, कुछ आवेदन पत्र, और उनके बीच धैर्य।

तहसील दफ़्तर के भीतर हल्की ठंडक थी। ऊपर पंखा घूम रहा था, और काग़ज़ पलटने की आवाज़ बार-बार कमरे की खामोशी को चीर रही थी। महिलाएँ कुर्सियों पर सीधी बैठीं, पीठ तनकर, जैसे हौसला ढीला न पड़ने देना हो।

उन्होंने अधिकारी के सामने पूरी बात रखी, पंचायत में नाम न चढ़ाने की, परिवार सूची के बिना बच्चों के योजनाओं से बाहर रह जाने की, अधूरी पढ़ाई की चिंता की।

अधिकारी ने फ़ाइल बंद की। कुछ क्षण सोचा। फिर कहा,
 “नाम दर्ज होगा।”

उस एक वाक्य में जैसे जमी हुई साँसें पिघल गईं। कुछ ही दिनों में गाँव की पंचायत सूची में उनका नाम जुड़ गया। काग़ज़ पर स्याही की एक पंक्ति, पर उनके लिए एक ठोस जगह।

 उनका नाम तो किसी तरह दर्ज हो गया, लेकिन यह रास्ता हर गोर्खा परिवार के लिए इतना सीधा नहीं होता। आज भी हमारे समुदाय के कई लोग अपने अधिकारों से वंचित हैं।

सच तो यह है कि—

“हमारे बच्चों को स्कूल में बराबरी चाहिए,”

“हमें पहचान पत्र चाहिए,”

“हम भी यहीं के हैं।”

ये बातें कहते समय आवाज़ में हिचक नहीं, गर्व होना चाहिए।

मैदान में उभरती आवाज़ें

शाम को मैदान के एक कोने में हम सब दोस्त गोल घेरा बनाकर बैठे थे। घास अभी भी हल्की नमी से भीगी थी। माया के हाथ में मोबाइल था; स्क्रीन पर मैरी कॉम की तस्वीर चमक रही थी।

“देखो,” माया ने स्क्रीन हमारी ओर घुमाई, “कितनी मुश्किलों के बाद यहाँ तक पहुँची हैं।” वह रुकी, फिर बोली, “और गोर्खा होकर पूरे भारत का नाम रोशन किया।”

किसी ने धीमे से कहा, “इसलिए हमें अपनी पहचान छुपानी नहीं चाहिए।” लता ने सिर हिलाया, “अगर वो कर सकती हैं, तो हम भी अपने हक़ की बात कर सकते हैं।”

कुछ पल चुप्पी रही। हवा में ठंडक घुल रही थी। फिर किसी ने मुस्कुराकर कहा, “मैरी कॉम सिर्फ़ खिलाड़ी नहीं हैं, वो हिम्मत हैं।”

अब हमारे समुदाय के युवा सजग हो रहे हैं। वे सोशल मीडिया पर अपनी भाषा, संस्कृति और सवालों के बारे में खुलकर लिखते हैं। पढ़ाई के साथ वे अपने अधिकार समझ रहे हैं, छोटे-छोटे समूहों में मिलकर काम कर रहे हैं। इसी सोच से कुछ लोगों ने ‘गोर्खाली मंच’ बनाया, एक जगह, जहाँ समस्याएँ दबती नहीं, रखी जाती हैं। उसी मंच पर लोकगीत भी गाए जाते हैं, पुरानी धुनें फिर से उठती हैं क्योंकि संस्कृति साँस की तरह ज़िंदा रहती है।

गोर्खाली सेल रोटी | फोटो: sel-roti-nepal
फोटो: www.himalini.com

धूप, टीका और ढोल की थाप

दशैं की सुबह थी। आँगन में धूप उतर आई थी और हवा में हल्की ठंडक थी। दादी ने पीतल की थाली में चावल और टीका सजाया। एक-एक कर सबके माथे पर टीका लगाती गईं। उँगलियों से चावल चिपकाते हुए उनका स्पर्श ठहरा हुआ था। रसोई से गरम तेल की खुशबू आ रही थी। बड़ी बहन कड़ाही के सामने खड़ी सेल रोटी बना रही थी। वह आटे का घोल गोल घुमाकर तेल में डालती, और कुछ ही क्षण में रोटी फूलकर सुनहरी हो उठती। उसकी महक पूरे घर में फैल जाती।

आस-पास के पड़ोसी भी बुलाए गए थे। बहन गरम-गरम सेल रोटी पत्तल में रखती, साथ में आलू–तिल की चटनी परोसती। लोग स्वाद लेकर खाते, कोई चटनी की तारीफ़ करता, कोई कहता, “आज तो मज़ा आ गया।”

इतने में पड़ोस की चाची ने ढोल उठा लिया। ढोल की थाप आँगन की दीवारों से टकराकर गूँजने लगी। हँसी और ताल के बीच लोग उठ खड़े हुए। कोई गोल घेरा बनाकर नाचा, कोई गीत की पंक्तियाँ आगे बढ़ाता गया।

दादी पास ही बैठी थीं। कभी बहन के हाथों को देखतीं, कभी नाचते लोगों को। फिर धीरे से बोलीं, “नेपाल में भी दशैं ऐसे ही होता था।” धूप, टीका, सेल रोटी और ढोल की थाप के बीच जैसे दोनों पहाड़, नेपाल और हिमाचल, एक ही आँगन में आ मिले हों।

तीन भाषाओं का घर

हमारे घर में आज भी नेपाली, हिंदी और पहाड़ी बोली जाती हैं। दादा-दादी से बात करते ही ज़ुबान अपने आप गोर्खाली हो जाती है; चाचा-चाची के साथ पहाड़ी में शब्द बहने लगते हैं; और जैसे ही घर की दहलीज़ पार करते हैं, बातचीत सहज ही हिंदी में बदल जाती है। कभी-कभी सचमुच लगता है, हमारा घर तीन धाराओं का छोटा-सा संगम है, जहाँ हर भाषा अपनी अलग गर्माहट लेकर बहती है।

कई बार ऐसा होता है कि तीनों पीढ़ियाँ एक साथ अलग-अलग भाषा में बोलने लगती हैं। कुछ पल के लिए सब उलझ जाता है, फिर हम खुद ही हँस पड़ते हैं कि आखिर बातचीत चल किस भाषा में रही है। दादी के कुछ गोर्खाली शब्द इतने मुलायम लगते थे कि हम उन्हें स्कूल तक ले जाते थे, तिमीलाई माया गर्छु। दोस्त चौंककर पूछते, “ये कौन-सी भाषा है?” और हमें भीतर से एक अनकहा गर्व महसूस होता।

सबसे गहरे पल तब आते हैं जब दादी अपनी पुरानी कहानियाँ गोर्खाली में सुनाती हैं। उनके शब्दों में बीते समय की मिट्टी चिपकी रहती है, यात्राएँ, घर, पहाड़। और जब माँ पहाड़ी में डाँटती हैं, तो उस डाँट में भी एक अलग अपनापन होता है, जैसे भाषा ही गोद बन गई हो।

इसलिए कभी-कभी मेरी पहचान एक जगह में नहीं ठहरती, मैं गोर्खाली भी हूँ, पहाड़ी भी, और हिंदुस्तान से जुड़ी हुई भी। लोग पूछते हैं, “तुम असल में हो कहाँ की?” तब महसूस होता है कि मेरी पहचान किसी एक दायरे में बंधी नहीं है। वह तीन भाषाओं, तीन संस्कृतियों और तीन भावनात्मक दुनिया से मिलकर बनी है। लेकिन घर की दहलीज़ पर कदम रखते ही यह सवाल मिट जाता है क्योंकि यहाँ तीनों भाषाएँ मिलकर मुझे बताती हैं कि मैं यहीं की हूँ और हमारी असली पहचान इसी मिश्रण में है, दो देशों के बीच, लेकिन दोनों से अपना रिश्ता बनाए रखते हुए। आज मैं सिर्फ़ अपनी कहानी नहीं कह रही, अपने पूरे समुदाय की कहानी कह रही हूँ।

हम गोर्खाली लोग इस मिट्टी का हिस्सा हैं, खेतों, स्कूलों, सड़कों, मंदिरों और उन घरों का हिस्सा जहाँ हमारी मेहनत की गंध बसती है। हम अपनापन नहीं माँग रहे, हम तो सिर्फ़ अपना हक़ माँग रहे हैं। बराबरी, सम्मान और पहचान, यही हमारे संघर्ष का सार है और हाँ, उम्मीद भी है क्योंकि आज की पीढ़ी अब खामोश नहीं है। हम अपने अधिकारों के लिए बोलते हैं, लिखते हैं, और एक-दूसरे की कहानियाँ समझते है।

मैं, शानू, एक गोर्खाली बेटी,
इस कहानी के ज़रिए यह कहना चाहती हूँ —
हमारी पहचान हमारी मेहनत से नहीं,
हमारे अस्तित्व से है।
हम विदेशी नहीं, इस मिट्टी के वंशज हैं।
और एक दिन, जब कोई बच्चा स्कूल में पूछेगा “गोर्खाली कौन होते हैं?”,
तो जवाब होगा
“वो लोग, जिन्होंने इस पहाड़ को अपना घर और दिल दिया।”

Meet the storyteller

Shanti Devi
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Shanti lives with her parents in the small village of Banoru, near Palampur in Himachal Pradesh. She completed her undergraduate studies in 2015 and subsequently pursued a one-year PGDCA (Post Graduate Diploma in Computer Applications). In 2018, she began her professional career as a Data Operator at a private bank. In 2020, she worked as a Data Operator at Medipol Pharmaceutical Company in Baddi. In 2021, she spent a year teaching at a school. In 2023, she became associated with Himachal Queer Foundation, where she actively worked with gender and queer communities. At present, she volunteers with Parvatiya Mahila Vikas Trust, contributing to work in the field of mental health. Shanti is deeply fond of traveling in the mountains; nature and the hills are a source of energy and peace for her.

शांति हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास स्थित छोटे-से गाँव बनोरू में अपने माता-पिता के साथ रहती हैं। उन्होंने वर्ष 2015 में स्नातक की शिक्षा पूरी की और इसके बाद एक वर्ष का पीजीडीसीए (PGDCA) किया। वर्ष 2018 में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक निजी बैंक में डेटा ऑपरेटर के रूप में की। 2020 में उन्होंने बद्दी स्थित मेडिपॉल फार्मास्यूटिकल कंपनी में डेटा ऑपरेटर के पद पर कार्य किया। 2021 में उन्होंने एक वर्ष तक स्कूल में अध्यापन किया। वर्ष 2023 में वह हिमाचल क्वियर फाउंडेशन से जुड़ीं, जहाँ उन्होंने जेंडर और क्वियर समुदाय के साथ सक्रिय रूप से काम किया। वर्तमान में वह पर्वतीय महिला विकास ट्रस्ट के साथ वालंटियर के रूप में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। शांति को पहाड़ों में घूमना बेहद पसंद है; प्रकृति और पहाड़ उनके लिए ऊर्जा और सुकून का स्रोत हैं।

Voices of Rural India
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Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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