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दिव्या, एक शिवालिक भांग के बीज की आत्मकथा

शिवालिक की घाटी में एक छोटे से बीज की आँखें खुलती हैं और शुरू होती है एक ऐसी ज़िन्दगी जो न तो आसान है, न सीधी। दोस्ती, मुश्किलें, और एक ऐसा मोड़ जो दिव्या को हमेशा के लिए बदल देगा। क्या वो उस तूफ़ान से निकल पाएगी जो उसने खुद नहीं चुना? दिव्या की कहानी सिर्फ एक पौधे की नहीं, यह हर उस इंसान की कहानी है जिसने टूटकर खुद को फिर से पाया।

कहानीकर्ता : हनीष कतनावर
गाँव समाल, ज़िला कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश

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विजया (मादा भांग) अच्युत (नर भांग) के पराग का इस्तेमाल करने के बाद अपना बीज बनाकर और उसे धरती पर छोड़ कर जा चुकी थी (विजया की कहानी जानने के लिए इस सीरीज का पहला भाग पढ़ें।)

फरवरी का महीना आ चुका है। शिवालिक घाटी में बसंत ऋतु का आगमन हो चुका है। ज़मीन में हलकी सी नमी और गर्मी है और दिव्या पहली बार अपनी आँखें खोलती है। एक पांव पसारकर अपने खोल को फोड़ते हुए अपनी पहली जड़ बाहर निकालती है और दोनों बाजुओं को जब खोलती है; तो पहली दो पत्तियों का अंकुरण होता है।

अंकुरित होती हुई दिव्या। फोटो: रॉयल क्वीन सीड्स

अभी तक उसे न तो किसी ने बताया है कि वो नर है या मादा और न ही जैविक तौर पर यह निर्धारित हुआ है। 

“अरे ओ! क्या नाम है तुम लोगों का”? उसने पास उगे दूसरे पौधों से पूछा।

“मेरा नाम भंगी”

“मैं गांजा”

“मैं सिद्धिदा”

“मैं मनोन्मनी”

“मैं विमर्दिनी”

“और तुम?” सबने एक साथ पूछा।

“मैं दिव्या। मेरे आज ही दो पत्ते निकले हैं।” 

दिव्या के पहले पत्ते। फोटो: वीडमैप्स

“स्वागत है हमारे गैंग में। मैं इन सब पौधों का कप्तान हूँ क्यूंकि चार दिन पहले मेरे नए दो जोड़ी पत्ते निकले हैं,” गांजा ने चौड़ में रहते हुए कहा।

“धन्यवाद।” दिव्या बहुत खुश थी कि उसके जैसे और भी थे।

“देखना, अपनी जड़ को दाईं ओर मत ले जाना, उधर पत्थर है; तुम्हारी जड़ को रोक देगा,” मनोन्मनी ने अपनी जड़ से दिव्या की जड़ को छूते हुए चुपके से हँसते हुए कहा।

ऐसे ही हँसते खेलते दिन बीतने लगे और सभी पौधे बड़े होने लगे।

“देख-देख मेरे पत्तों में सात उँगलियाँ आयी हैं। तूने तो अभी तीन ही उगाई हैं,” विमर्दिनी ने मज़ाक उड़ाते हुए सिद्धिदा से कहा। 

“हाँ तू बढ़ ले जल्दी से। तभी फीका लग रहा है तेरा रंग। धूप नहीं पी क्या आज सुबह सुबह?” सिद्धिदा ने पलटकर जवाब देते हुए कहा। 

“सुना है शाम को डांस कम्पटीशन है?” दिव्या ने मनोन्मनी से धीरे से पूछा।

“हाँ। हवा रोज़ चल रही है। तो गांजा, विमर्दिनी, और भंगी हवा में झूल कर देखने वाले हैं कौन ज़्यादा फ्लेक्सिबल है।” मनोन्मनी ने जवाब दिया। 

तीनों पौधे शाम के डांस कम्पटीशन की तैयारी कर रहे थे। गांजा सबसे ज़्यादा बढ़ चुका था।

“अरे सुन ना?” भंगी ने सिद्धिदा से पूछा।

“क्या चाहिए?”

“मुझे थोड़ा जड़ के रस्ते से नाइट्रोजन उधार दे ना। अगली बारिश आते ही वापिस कर दूंगा। आज उस गांजा को कैसे भी हराना है मुझे।”

“तुझे क्या लगता है, हरामखोर! मैं कोई बेवकूफ मटर का पौधा हूँ जो नाइट्रोजन शेयर करूँगा। नहीं। मुझे खुद कमी है। मैं नहीं दे पाऊँगी।”

हवा में नाचते भांग के पौधे| फोटो: ब्लैक बॉक्स गाइल्ड

शाम को हल्की-हल्की हवा के साथ मुकाबला शुरू हुआ और तीनो पौधों ने ऐसा डांस किया कि सब देखते ही रह गए। गांजा ने फिर से अपना वर्चस्व जमाते हुए अपने पत्ते ऐसे लहराए कि भंगी और विमर्दिनी कुछ नहीं कर पाए। सब आखिर खेल कूद कर रात को सो गए।

अगले दिन का सुबह का सूरज धीरे-धीरे गर्मियों की ओर इशारा कर रहा था। 

“पीछे हट जा। मेरी धूप ब्लॉक मत कर,” विमर्दिनी ने चिढ़ते हुए सिद्धिदा से कहा।

“तू जितनी चाहे धूप पी ले, गांजा तुझसे हमेशा मज़बूत ही रहेगा विमर्दिनी।” सिद्धिदा ने हँसते हुए कहा।

कुछ सप्ताह और बीत चुके थे। मई का गरम सूखा महीना और गरम लू के थपेड़े सभी बिना जड़ वाले प्राणियों को परेशान कर रहे थे। 

“देख तो कल रात को मैं दो इंच और लम्बा हो गया,” सिद्धिदा ने विमर्दिनी से कहा।

“हाँ यार। तेरी गांठे तो बहुत मज़बूत लग रही हैं,”

“मुझे और मज़बूत बनना है। मेरे शरीर पे बढ़िया रेशे का कोट बन रहा है।”

“सही है। सर्दियों में ये तो तुझे अच्छी सुरक्षा देगा।”

“लेकिन तेरी तो 11 उँगलियाँ निकल रही हैं पत्तों में। तू भी कम सुन्दर नहीं लग रही।”

अपना लिंग पहचानते भांग के पौधे । फोटो: सेंसी सीड्स

विमर्दिनी ये सुनकर शर्मा सा गयी और अपने तने की गांठों पर निकले मुलायम और सफ़ेद बालों को देखने लगी। उसे भारी और घना महसूस होता था और कहीं ना कहीं उसे पता था कि वो सिद्धिदा की तरह लम्बा नहीं होना चाहती थी।

(नर पौधों की पराग की थैलियां निकलती हैं और मादा पौधों के गांठों पर बाल जैसे निकलते हैं जिन्हें पिस्टिल कहते हैं। यहाँ पर पौधों का लिंग निर्धारण हो रहा है।)

“तूने उस पत्थर के पीछे से पानी ले लिया था ना?” मनोन्मनी ने दिव्या से पूछा। 

“हाँ वहां पर मैंने एक कवक (फूंगी) से दोस्ती भी कर ली है,” दिव्या ने जवाब दिया। 

“अच्छा क्या दोस्ती कर ली?? भूल तो नहीं गयी ना कि हम प्यार खुद के लोगों के साथ ही कर सकते हैं,” छेड़ते हुए मनोन्मनी ने कहा। 

“अरे नहीं नहीं। हम सिर्फ बिज़नेस करते हैं। खनिज के बदले में मुझसे वो शुगर लेता है।”

“तभी मैं सोचूं इतनी अच्छी खुशबु भला क्यों आ रही है तुझसे?”

“हाँ मैं भी सोचकर परेशान हो गयी हूँ। सिद्धिदा और भंगी भी मुझे बहुत देखते हैं,” शर्माते हुए दिव्या ने कहा।

“देखता तो मैं भी हूँ और देख दो महीनो के बाद मानसून आने वाला है, तब तक मैं रेशे की चाल चढ़कर और मज़बूत बन जाऊँगा।”

“अच्छा चलो देखते हैं। मैं अभी भी समझने की कोशिश कर रही हूँ कि ये हो क्या रहा है?” सोचते हुए दिव्या ने कहा। 

“ये गांजा और भंगी का मुझे समझ नहीं आता,”

“क्यों क्या हुआ?”

“जब से गांजा कप्तान पद से निवृत हुई है और भंगी कप्तान बना है, दोनों में एक दूरी सी आ गयी है।”

“पता नहीं। मैंने ध्यान नहीं दिया।”

रात को चमकते नर और मादा भांग के पौधे । फोटो: हुम्बोल्ड्ट सीड कंपनी

(लिंग निर्धारण के बाद मादा पौधे मुख्य रूप से प्रजनन और वंश वृद्धि के उद्देश्य से सुगंध निकालते हैं। यह क्रिया किसी “फेरोमोन” की तरह काम करती है, जो कीटों को आकर्षित करने के लिए वाष्पशील कार्बनिक यौगिक छोड़ती है।)

भंगी खाना खा रहा था। अपने तने को उसने बाकियों के मुकाबले काफी खोखला बनाया था। उस वजह से वह खनिज और पोषक तत्वों को जल्दी पूरे शरीर तक पहुंचा पाता था।

“अरे देख तो तुझे तो झुमके लगने शुरू हो गए हैं?” गांजा ने भंगी को छेड़ते हुए कहा।

“हाँ तो तुझे भी तो सफ़ेद बाल आ रहे हैं। भूल जा अभी कभी तेरी पहले जितनी ऊंचाई नही होगी।” भंगी ने जवाब दिया।

गांजा के निकलते हुए सफ़ेद बाल (स्टिग्मास)। फोटो: सेंसी सीड्स

“अरे देख-देख, वो टिड्डा आ रहा है।”

“जल्दी से अपने पत्तों को और कड़वा और गरम कर लो,” गांजा ने हिदायत देते हुए भंगी को कहा।

“मेरे अंदर तेरे जैसा ज़हर नहीं है कि मैं उनको कड़वा कर लूँ। वैसे भी वो मेरे पत्ते खा लेगा; तो मेरा पोषण पूरा मेरे तने और रेशे को मिलेगा जो कि मुझे मानसून में काम आएगा।”

“मैंने महसूस किया है कि हम दोनों एक जैसे होते हुए भी कितने अलग हैं।”

“क्या मतलब?”

“तू ऊँचा है। तेरा कोट इतना मोटा है। मैं ऊँची नहीं हूँ। लेकिन फैली हुई हूँ और मेरे पत्ते तुझसे बड़े और गहरे हरे रंग के हैं। मुझसे एक मीठी और तीखी सी खुशबु निकलती है। कुछ मेरे अंदर वैसा भी है जो मुझे इन टिड्डों से बचाता है। बाकी जानवर आके तुम्हारे पत्ते मेरे पत्तों से ज़्यादा खाते हैं।”

“तुम कहना क्या चाहती हो, गांजा।”

“मुझे ऐसे लगता है जैसे मुझे कुछ चाहिए लेकिन पाता नहीं है क्या?”

“तुम्हारे मन का वहम होगा। मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लग रहा और अभी मेरे शरीर की मज़बूती में मेरा ध्यान है।”

(मादा भांग के पौधे के पत्ते नर पौधों की तुलना में अधिक कड़वे इसलिए होते हैं क्योंकि उनमें ट्राइकोम नामक राल ग्रंथियां बहुत अधिक मात्रा में पाई जाती हैं। ये ट्राइकोम ही मुख्य रूप से भांग के पौधे की कड़वाहट और उसमें मौजूद नशीले तत्वों (THC) का कारण होते हैं।)

दिव्या को खाती हुई बकरी। फोटो: मवेबनतु (फेसबुक पेज)

“अरे देखो-देखो। बकरियों का झुण्ड आ रहा है।”

सभी पौधों में जैसे हड़कंप मच गया। बाकी सब पौधे बच गए लेकिन एक बकरी ने आकर दिव्या के सारे पत्ते और ऊपर से उसको आधा खा लिया।   

गर्मियों के साथ मानसून भी ख़तम हो गया था और फिलहाल पौधे अपने सबसे व्यस्त, तनावपूर्ण, और जटिल समय में पहुँच रहे थे। 

नर पौधों में भंगी सबसे ऊँचा पौधा बनकर निकला था अपने ज़्यादा खोखले तने और बिखरी जड़ों की वजह से। वो जितना ऊँचा होता; उसका पराग उतनी ही दूर तक जाता और मादाओं तक पहुँचता। सिद्धिदा और मनोन्मनी ने भी अपने आपको विमर्दिनी और दिव्या की मदद से अच्छा नाइट्रोजन लेकर काफी आगे तक पहुँचाया था। उनके रेशे के कोट ने उनकी ऊंचाई के अनुरूप को उनको काफी फ्लेक्सिबल रखा था जिससे कि वो ऊँचे होते हुए भी तेज़ हवाओं में टूटते नहीं थे। 

गांजा और विमर्दिनी ने अपने रेशों को कठोर और तनों को थोड़ा मज़बूत बनाया था क्यूंकि उनके फूलों का भार लेने के लिए उनके शरीर का मज़बूत होना ज़रूरी था। उनकी जड़ें नर पौधों की तरह सतही तौर पर ज़्यादा फैली नहीं थी लेकिन गहरी थीं ताकि पानी के स्त्रोतों को ढूंढ सकें जो उनको लम्बे समय तक ज़िंदा रखते।

जवान गांजा का फला-फूला पौधा। फोटो: सेंसी सीड्स

“अरे वाह! तुम्हारे बालों का तो ताज सा बन गया है।” भंगी ने गांजा की तारीफ करते हुए कहा। 

“हाँ आखिर पराग भी तो मुझे अच्छे से चाहिए। मेरी अगली पीढ़ी की शान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।” गांजा ने अपनी मस्ती में कहा।

“अरे तूने विमर्दिनी की खुशबू सूंघी। आम जैसी खुशबू आ रही है उसमें से,” सिद्धिदा ने मनोन्मनी से कहा।

“हाँ यार! लेकिन मुझे तो गांजा की नीम्बू जैसी खुशबू ज़्यादा पसंद है,”

“धीरे बोल! नहीं तो भंगी तुझे छोड़ेगा नहीं।”

“तो तुझे क्या लग रहा है, हम दोनों का पराग विमर्दिनी लेगी?”

“तू साले निकल यहाँ से। तू जा अपने दिव्या के पास। बाकियों पे क्यों नज़र दाल रहा है?”

मनोन्मनी ने दिव्या के रेशे के ऊपर बनी गाँठ को देखा जो उसने बकरी वाली घटना के बाद धीरे-धीरे ठीक किया था। खुद को बचाने के लिए उसने अपने अंदर थोड़े से पराग की थैलियां बना ली थीं।

(जब बकरी पौधे के ऊपरी हिस्सों या पत्तियों को खाती है या कोई सूखा पड़ता है या आसपास नर पौधे नहीं होते, तो पौधा गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो जाता है। भांग के लिए, यह एक ‘जीवन-मरण’ की स्थिति बन जाती है। पौधा इसे एक खतरे के रूप में भांपता है और उसे लगता है कि उसकी मृत्यु जल्द ही हो सकती है। इस परिस्थिति में, वह अपनी प्रजाति को आगे बढ़ाने के लिए तत्काल प्रजनन करना चाहता है। और नर पौधे के पराग की ग्रंथियां एवं मादा पौधे के पिस्टील्स एक ही पौधे में बना लेता है जिससे वह पौधा उभयलिंगी कहलाता है।)

उभयलिंगी दिव्या। फोटो: एडवांस्ड नुट्रिएंट्स

“तुम ऐसा क्यों कर रही हो, दिव्या?” दो महीने पहले मनोन्मनी ने उसे पूछा था।

“मैं कुछ नहीं कर सकती। खुद को और अपनी आगे वाली पीढ़ियों को बचाने के लिए मुझे उभयलिंगी बनना ही पड़ेगा।”

“तो फिर मेरा क्या होगा? मैं किसे अपना पराग दूंगा?”

“लेकिन उससे पहले ही अगर कोई बकरी आ गयी और उसने तुझे या मुझे किसी को भी खा लिया; तो फिर? तू बचा पायेगा मुझे उस बकरी से? कोई इंसान आकर अगर मुझे रगड़ कर चला गया चरस फूकने के लिए या फिर तुझे ले गया कोई तेरे रेशे से कपडा बनाने के लिए; तो क्या करेगा?”

मनोन्मनी कुछ नहीं बोल पाया और चुपचाप अपने आप के साथ ही रहने लगा। दिव्या को इस प्रक्रिया मेँ उसे फूंगी और बैक्टीरिया काफी मदद कर रहे थे।    

“मेरे घाव भर रहे हैं, पर मेरा दिल टूट रहा है। मैंने मनोन्मनी को दूर कर दिया क्योंकि अब मैं खुद ही अपना संसार बन गई हूँ। क्या मैं अब भी वही हूँ जो मैं थी?”

“धैर्य रखो! मैं तुम्हारे घावों में ग्लूकोज भर रहा हूँ। तुमने अपनी पहचान बदली ताकि तुम जिंदा रह सको। प्रकृति में ‘सर्वाइवल’ ही सबसे बड़ी कला है। तुम अकेली नहीं हो, हम सब तुम्हारे नेटवर्क का हिस्सा हैं।” फूंगी ने उसके घावों को भरते हुए कहा। 

दिव्या के घाव भर्ती फुंगी। फोटो: कैना कनेक्शन

“हम तुम्हारी जड़ों के पास नाइट्रोजन का घेरा बना रहे हैं। तुम्हें अब मनोन्मनी के सहारे की जरूरत नहीं, तुम्हारी अपनी ताकत ही अब तुम्हारा बीज बनेगी,” साथी बैक्टीरिया ने उसकी मदद करते हुए कहा।

सितम्बर की उस रात मे तारों को देखते हुए दिव्या सो गयी थी और उसकी माँ विजया उसके पास आयी। उसके पुराने घाव वाली गांठ को छूते हुए उसने कहा, “यह अभी तुम्हारा सबसे मज़बूत हिस्सा बन गया है। यह निशान कमज़ोरी नहीं मज़बूती की पहचान है।”

“लेकिन माँ। बाकी सब पौधे मुझे अजीब नज़रों से देखते है।”

“हाँ वो देखेंगे और शायद समझेंगे भी नहीं। लेकिन तुम्हे किसी की ज़रूरत नहीं। तुम्हारे पास पराग और फूल दोनों हैं। तुम हर तरह से संपूर्ण हो।”

ये कहते हुए माँ की छवि धुंधली होने लगी।

“माँ रुको! मत जाओ,” कहते हुए दिव्या की आँखें खुल गयी।

उसकी माँ तो वहां नहीं थीं लेकिन उसको एक अंदरूनी राहत मिल गयी थीं जो शायद एक माँ ही अपने बच्चे को दे सकती है।

मृत भांग के पौधे। फोटो: शटरस्टॉक

अक्टूबर आते-आते सब जगह भांग के पौधे पूरी तरह से बड़े हो चुके हैं। भंगी, सिद्धिदा, और मनोन्मनी अपने पराग बहाकर अपना गुणकारी रेशा और हल्का तना छोडकर मर चुके हैं। नवम्बर तक गांजा, विमर्दिनी, और दिव्या भी अपना बीज बनाकर ज़मीन मे छोड़ कर मर चुके हैं। मिट्टी मे फूंगी उनकी जड़ों को खाकर बीज के लिए अच्छी ज़मीन तैयार कर रहे हैं। उनके पास मे ही एक लड़का और लड़की बैठकर चाय पी रहे थे।

“अरे वाह! ये तो बहुत अच्छे रेशे वाले पौधे लग रहे हैं।” लड़के ने लड़की से कहा। 

“हाँ!” लड़की ने सिद्धिदा और भंगी के तनों को उखाड़ते हुए कहा। 

“चलो इन्हे पानी मेँ रख देते हैं। फिर रेशा निकालना आसान रहेगा।”

दोनों ने आसपास से लगभग 400 नर पौधों को लेकर पानी मेँ डाल दिया। और मादा पौधों के बीज, पत्तों, फूलों और तनों को अलग करके उनके तनों को भी अलग से पानी मेँ डाल दिया।

भांग के पौधों को पानी में डालते लोग। फोटो: हनीष कतनावर

“चलो इन पौधों के रेशों से सेनेटरी पैड बनाते हैं,” लड़की ने लड़के से कहा। 

“हाँ बहुत अच्छा सुझाव है।”

“लेकिन बाकी चीज़ों का क्या करेंगे?”

“अंदरूनी तनों को छोटे टुकड़ों मेँ तोड़ कर उसको चूने मे मिलाकर उसकी ईंटें बनाएंगे।”

“और बीजों से तेल और प्रोटीन बनाएंगे जोकि हमें शारीरिक स्वास्थ्य मेँ मदद करेंगे।”

“इसके पत्तों से हम आयुर्वेदिक दवाई बनाकर लोगों की बीमारियां ठीक करेंगे,”

“और फूल?”

“फूल तो अवैध हैं। फिलहाल हम वैध तरीके से उनसे कुछ बना नहीं सकते।”

“लेकिन सबसे ज़्यादा औषधीय लाभ तो फूल के ही हैं।”

“हाँ लेकिन हमें कानून भी तो देखना है।”

“कोई बात नहीं पहले सेनेटरी पैड से शुरू करते हैं और फिर आगे देखते हैं। “

भांग के पौधे से सेनेटरी पैड की शुरुआत करते हुए एक लड़का और लड़की। फोटो: टॉम मो

विजया और दिव्या की कहानी सिर्फ दो साल मे ख़तम नहीं होती। अगले भाग मे हम जानेंगे कैसे विजया, दिव्या और अन्य भांग के पौधों को वो दोनों लड़का और लड़की आगे लेकर जाते हैं। भांग के पौधे की मुश्किल भरी ज़िन्दगी को तो हमने समझा लेकिन हम इंसानी तौर पर उनसे क्या सीख सकते हैं और कैसे उस पौधे के साथ एक रिश्ता बना सकते हैं, ये हमें अगले भाग मेँ जानने के लिए मिलेगा……                   

Meet the storyteller

Haneesh Katnawer
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Haneesh Katnawer aka Katna is a social entrepreneur, inventor, and ghost writer. He is the co-founder of Himalayan Hemp Industries Pvt. Ltd. and Himalayan Hemp Research Foundation, a social entreprise working in preserving the indigenous variety of cannabis and hemp in the Himalayan Range. He is one of the inventors of world’s 1st reusable cannabis hemp sanitary pads. He has a knack to dwell in topics often less spoken and roads less travelled. With an experimental, experiential, and purposeless mindset, he believes in living life with an objective of trying something new every day. 

हनीष कतनावर उर्फ़ कटना एक सामाजिक उद्यमी, आविष्कारक और घोस्ट राइटर हैं। वे हिमालयन हेम्प इंडस्ट्रीज़ प्राइवेट लिमिटेड और हिमालयन हेम्प रिसर्च फ़ाउंडेशन के सह-संस्थापक हैं  एक सामाजिक उद्यम जो हिमालयी क्षेत्र में भांग और हेम्प की देशी किस्मों के संरक्षण पर कार्य करता है। वे दुनिया के पहले पुनःप्रयोग योग्य भांग आधारित सेनेटरी पैड्स के आविष्कारकों में से एक हैं। उन्हें उन विषयों में गहराई से उतरने का शौक है जिन पर आमतौर पर कम बात की जाती है और उन राहों पर चलने का जुनून है जो कम चली गई हैं। एक प्रयोगात्मक, अनुभवात्मक और निःस्वार्थ मानसिकता के साथ वे मानते हैं कि जीवन का उद्देश्य हर दिन कुछ नया आज़माना होना चाहिए

Voices of Rural India

Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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