खनोर से सीक: यादों का ताना-बाना
हिमालय की गोद में बसे शील गांव की एक ठंडी नवंबर सुबह, एक युवा कहानीकार अपनी माँ और नानी के साथ जंगल की ओर निकलती है खनोर की खोज में, एक कड़वा वन्य फल जिसे पीढ़ियों की मेहनत और धैर्य से एक पोषक व्यंजन सीक में बदला गया है। अपनी नानी के पीछे चलते हुए और उनके कुशल हाथों को काम करते हुए, वह केवल एक रेसिपी नहीं, बल्कि एक गहराई से जुड़ी परंपरा को समझती है। यह परंपरा संघर्ष, पूर्वजों की बुद्धिमत्ता और जंगल से गहरे रिश्ते में रची-बसी है। उसकी नजरों से हम एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं जहाँ सबसे कठिन फल भी पोषण का स्रोत बन जाते हैं और जहाँ एक नानी की निःशब्द दृढ़ता यह सवाल करती है: क्या अगली पीढ़ियाँ इन कहानियों को आगे ले जाएँगी?

कहानीकार : शालिनी कैथ
गाँव शील, ज़िला कुल्लू,
हिमाचल प्रदेश
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आज का दिन लंबा, थकान भरा लेकिन रोमांचक था। नवंबर की ठंडी सुबह की पहली किरण के साथ, मैं अपनी नानी, बिंदी देवी, और माँ, कौशल्या, के साथ जंगल की ओर निकल पड़ी। हमारे कदम पत्तों से ढके रास्तों पर पड़ रहे थे, और हल्की धुंध के बीच देवदार और चीड़ के ऊँचे-ऊँचे पेड़ कतार में खड़े नज़र आ रहे थे। जैसे-जैसे हम गहराई में बढ़ते गए, जंगल और घना होता गया, और मेरे भीतर उत्सुकता भी बढ़ती गई। मुझे इस सफर के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था। बस नानी और माँ के पीछे-पीछे चल रही थी, यह सोचते हुए कि आखिर हम किस खोज में निकले हैं।
हम खनोर की तलाश में थे! यह एक ऐसा पेड़ है जिसका फल काले, सिकुड़े हुए गोले जैसा दिखता है और जिसे अप्रैल–मई में खिलने वाले हल्के गुलाबी फूलों से दूर से ही पहचाना जा सकता है। अंग्रेज़ी में इसे इंडियन हॉर्स चेस्टनट कहा जाता है, हिंदी में जंगली कस्तान (वन्य चेस्टनट), और पहाड़ी भाषा में खनोर। खनोर ज़्यादातर ऊँचे हिमालयी इलाक़ों में पाया जाता है, ख़ासकर उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू–कश्मीर और अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में, समुद्र तल से लगभग 900 से 3,000 मीटर (करीब 2,953 से 9,843 फीट) की ऊँचाई पर। खनोर के फल के भीतर सफेद गूदा होता है और इसका कठोर छिलका अक्सर पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। खनोर का वैज्ञानिक नाम एस्क्यूलस इंडिकाहै। यह हिमालय का मूल निवासी पेड़ है, और यूरोपीय प्रजाति एस्क्यूलस हिप्पोकास्टेनमसे अलग है।
ख़नोर का फल बहुत कड़वा होता है, इसलिए इसे सीधे नहीं खाया जा सकता। कच्ची अवस्था में यह विषैला भी होता है, क्योंकि इसमें एसक्यूलिन और सैपोनिन जैसे तत्व पाए जाते हैं। इन्हें खाने से उल्टी, दस्त, चक्कर, पेट दर्द जैसी दिक़्क़तें हो सकती हैं और गंभीर हालात में लकवा या साँस लेने में तकलीफ़ तक हो सकती है। यह खून के थक्के जमने की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर सकता है और नसों को नुकसान पहुँचा सकता है। लेकिन अगर फल को ठीक से साफ़ करके पानी में भिगो दिया जाए, तो इसे सुरक्षित रूप से खाया जा सकता है। मेरी नानी बताती हैं कि ख़नोर औषधीय गुणों से भरपूर है। यह सूजन कम करने और हड्डियों को मज़बूत बनाने में बेहद उपयोगी माना जाता है।
माँ और नानी के पीछे-पीछे चलते हुए मेरी नज़रें जंगल के तरह-तरह के पेड़ों और पौधों को देख रही थीं। तभी नानी की तीखी आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा, “जल्दी आओ!”

देवदार के पेड़ों से होते हुए हम खनोर के जंगल में पहुँचे। खनोर के पेड़ बेहद ऊँचे होते हैं, अकसर 25 से 30 मीटर तक, और कुछ पुराने पेड़ तो इससे भी अधिक ऊँचाई छू लेते हैं। उनकी फैली हुई डालियाँ चौड़ी छतरी-सी बना देती हैं, जो लगभग 12 मीटर तक फैल जाती है और गहरी, ठंडी छाया देती है। उस समय तेज़ हवा चल रही थी, जिससे पत्ते झड़कर ज़मीन पर बिखर गए थे, मानो किसी ने उसे हरे कंबल से ढक दिया हो। अक्टूबर में इन पेड़ों से फल गिरने लगते हैं और नवंबर आते-आते गाँववाले उन्हें बटोरने निकल पड़ते हैं।

मेरा गाँव शील हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले के बंजार क्षेत्र में स्थित है। गाँव के चारों तरफ बर्फ से ढके पहाड़ नजर आते हैं। इन पहाड़ों पर हर साल कम से कम 4-5 फुट बर्फ गिरती है, जो दिसंबर से अप्रैल तक बनी रहती है और गाँव की शोभा बढ़ाती है। यह सबसे पास के शहर से 22 किलोमीटर की दूरी पर है और यहा की स्वच्छ हवा और सुंदर नज़ारे मन को मोह लेते हैं।

मेरे गाँव में जनवरी के महीने में, जिसे यहाँ की पहाड़ी बोली में माघ या मकर संक्रांति कहा जाता है, खनोर से सीक बनाई जाती है। सीक खनोर के फल के भीतरी सफ़ेद हिस्से से तैयार किया जाने वाला एक तरह का सफ़ेद आटा होता है। इसी आटे से पूड़ी और बब्रू बनाई जाती है। बब्रू हिमाचल की पारंपरिक डिश है, जो दिखने में तो पूड़ी जैसी लगती है, लेकिन स्वाद और बनावट में थोड़ी अलग होती है। इसे गेहूँ या जौ के आटे से बनाया जाता है और इसमें गुड़, तिल या फिर खनोर मिलाकर इसे मीठा या नमकीन, जैसा मन चाहे, बनाया जा सकता है। सीक आटे की खासियत यह है कि इसे किसी भी आटे, चाहे गेहूँ हो या जौ, के साथ मिलाया जा सकता है। यह स्वाद में हल्की मिठास घोल देता है। सबसे ज़्यादा इसका इस्तेमाल हलवा बनाने में होता है, जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ बेहद पौष्टिक भी होता है। आज भी गाँव के बहुत से लोग जंगलों में जाकर खनोर बड़ी मात्रा में इकट्ठा करते हैं।
हिमाचल में खनोर का फल कड़वाहट से भरा होता है, लेकिन पहाड़ों और ऊँचाई वाले इलाक़ों के लोग इसी से सीक का आटा तैयार करते हैं। मेरी नानी अक्सर कहती हैं कि इसकी वजह इन पहाड़ी बस्तियों के इतिहास में छिपी है। वह बताती हैं कि पुराने समय में, जब लोग दूरदराज़ और जंगलों पर निर्भर इलाक़ों में रहते थे, तब उनके पास वही साधन थे जो प्रकृति उन्हें देती थी। ऐसे में उन्होंने कठिन से कठिन चीज़ों को अपनाना और उनका उपयोग करना सीखा, भले ही वे फल कितने ही कड़वे और बेस्वाद क्यों न हों।
यह सोचकर सचमुच हैरानी होती है कि किस तरह हमारी पुरानी परंपराएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती आई हैं। इन पहाड़ों में पले-बढ़े बचपन से मैंने देखा है कि खनोर का यह कड़वा और कठिन फल, जो पहले अजीब सा लगता था, धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी का हिस्सा बन गया। नानी हमेशा कहती हैं कि पहले के समय में लोगों के पास आज की तरह बाज़ार नहीं थे। उन्हें जंगल से जो भी मिलता था, उसी पर निर्भर रहना पड़ता था। और इसी से उन्होंने सीखा कि सबसे कठिन और कड़वी चीज़ों को भी कैसे खाने लायक और स्वादिष्ट बनाया जा सकता है। मैं अक्सर सोचती हूँ कि हमारे पूर्वजों ने आखिर कैसे यह तरीका खोज निकाला होगा कि खनोर जैसे कड़वे फल को भी मीठा और खाने लायक बनाया जा सके।
खनोर की कहानी सिर्फ़ खाने या परंपराओं की नहीं है, यह उस जीवनशैली की झलक है जो धरती से गहराई से जुड़ी हुई है। कभी-कभी जब मैं जंगलों से होकर चलता हूँ या अपने बुज़ुर्गों को खनोर इकट्ठा करते देखती हूँ, तो महसूस करती हूँ कि इस ज़मीन ने हमें कितनी गहराई से गढ़ा है और हम इस पर कितने निर्भर हैं। इन पहाड़ों ने हमें सब कुछ दिया है, आश्रय, भोजन, ज्ञान और शक्ति। और इसके बदले हम इन परंपराओं को ज़िंदा रखने की कोशिश करते हैं, सिर्फ़ खाने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए भी कि हमें हमेशा याद रहे कि हमारा रिश्ता इस मिट्टी से कितना गहरा और अटूट है।
मेरी माँ ने खनोर तोड़ने के लिए ख़ास तौर पर एक मुंगर (हथौड़ा) बनवाया था। यह मुंगर देवदार या चीड़ की लकड़ी से तैयार किया जाता है और आम हथौड़े से कहीं बड़ा होता है, जिससे खनोर को फोड़ना आसान हो जाता है। इसका हत्था लंबी लकड़ी का होता है, ताकि पकड़ने में सहज लगे। जैसे ही सुबह होती, नानी और माँ मिलकर मुंगर से खनोर तोड़ना शुरू कर देतीं। टक–टक–टक की आवाज़ पूरे घर में गूंज उठती। जब सारे खनोर फोड़ लिए जाते, तो उन्हें सुखाने के लिए धूप में फैला दिया जाता।

खनोर के भीतर का सफ़ेद गुदेदार हिस्सा जीम कहलाता है। फल को कूटने के बाद यही हिस्सा बाहर आता है। शुरुआत में जब जीम को कूटा और सुखाने के लिए फैलाया जाता है, तो उसका रंग हल्का पीला होता है, लेकिन पूरी तरह सूखने पर यह एकदम सफ़ेद हो जाता है। इसका स्वाद बेहद कड़वा होता है और इसे खाने योग्य बनाने में काफ़ी समय और मेहनत लगती है। जीम निकालने के बाद उसे एक बड़े बोरे में भरकर बहती नदी में डाल दिया जाता है, ताकि पानी उसकी कड़वाहट को धीरे-धीरे धो ले जाए। मेरे घर के पास ही एक छोटी धारा बहती है, जहाँ हम अपना बोरा रखने गए। वह कई दिनों तक पानी में डूबा रहा। जब हमें लगा कि कड़वाहट कुछ कम हो गई है, तब हम जीम को बाहर निकालकर आँगन में धूप में सुखाने के लिए फैला देते थे।

जब जीम पूरी तरह सूख जाता है, तो उसे पानी से भरे बड़े बर्तन में डाल दिया जाता है। वहाँ इसे धीरे-धीरे कूटकर या पीसकर पानी में उसका पूरा रंग और स्वाद छोड़ा जाता है। जब इसका सारा रस और गुदा पानी में पूरी तरह घुल जाता है, तो इसे छानकर पानी को दूसरे बर्तन में डाल दिया जाता है और ढककर एक दिन के लिए छोड़ दिया जाता है। अगले दिन, बर्तन के तले सफ़ेद परत जम जाती है। यही सफ़ेद तलछट सीक कहलाती है—खनोर का पौष्टिक अर्क। सीक को पानी से सावधानी से अलग किया जाता है और सुखाने के लिए फैलाया जाता है। इसे पूरी तरह सूखने में लगभग एक हफ़्ता लगता है। सूखने के बाद यह आटे जैसी दिखती है, हालांकि इसका स्वाद अभी भी बहुत कड़वा होता है। मैंने नानी से पूछा कि यह कड़वाहट कैसे कम होती है। मुस्कुराते हुए उन्होंने समझाया कि सीक को साफ़ पानी से कई बार धोकर और निचोड़कर उसका स्वाद धीरे-धीरे हल्का किया जाता है—बिलकुल पुराने ज़माने की तरह, जब सबसे कठिन चीज़ों को भी धैर्य और ध्यान से आसान बनाया जाता था।

फोटो :शालिनी कैथ
नानी कहती हैं कि सीक कई बीमारियों से लड़ने में मदद करता है। खासकर महिलाओं और लड़कियों के लिए यह माहवारी के दौरान बहुत लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा,यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में भी सहायक होता है।

खनोर फल का कठोर और मनुष्यों के लिए खाने अयोग्य बाहरी हिस्सा फलौदी कहलाता है। इसे गाँव में आमतौर पर पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। अधिकांश लोग इसे अपनी गायों, बैलों और बकरियों को खिलाते हैं। उनका मानना है कि फलौदी पौष्टिक होती है और पशुओं को स्वस्थ और रोगमुक्त बनाए रखती है। हमारे गाँव में लगभग 30–32 घरों में गाय, बैल और भेड़ पाली जाती हैं, और ये लोग नियमित रूप से अपने पशुओं को फलौदी खिलाते हैं।
माघ (मकर संक्रांति) के मौके पर घरों में पारंपरिक व्यंजन जैसे चुल्लू बनाए जाते हैं। नानी चुल्लू बनाने में माहिर हैं और उन्होंने यह कला मेरी माँ को भी सिखाई है। हमारे घर में चुल्लू बहुत समय से नहीं बने थे, और इस बार जो बने, वह बिल्कुल लज़ीज़ थे। चुल्लू को गरम तेल में पूरी की तरह तला जाता है, लेकिन नानी इसे पूरी से थोड़ा छोटा बनाती हैं। तले जाने के बाद ये दिखने में खूबसूरत और खाने में अद्भुत लगते हैं। चुल्लू और बब्रू बनाना हर घर की परंपरा है, इनके बिना माघ अधूरा सा लगता है। ये व्यंजन सिर्फ स्वादिष्ट ही नहीं, बल्कि पोषण से भी भरपूर होते हैं। नानी बचा हुआ सीक का आटा बड़े डब्बे में संभाल कर रखती हैं, जिससे यह महीनों तक खराब नहीं होता और समय बीत जाने के बाद भी इसका स्वाद उतना ही ताज़ा रहता है।

मेरी माँ, कौशल्या देवी, ने सीक बनाना अपनी नानी से सीखा। हमारे समाज में कई व्यंजन पीढ़ियों से महिलाओं के माध्यम से ही संजोए और सिखाए जाते हैं। रसोई को एक अहम जगह माना जाता है और पारंपरिक रूप से इसे महिलाओं की ज़िम्मेदारी माना गया है। लेकिन इस बात पर कम ही ध्यान दिया जाता है कि यह ज़िम्मेदारी हमेशा सिर्फ महिलाओं तक क्यों सीमित रही।

मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि हम यह समझें कि खाना बनाना और खाद्य परंपराओं को संरक्षित करना एक ऐसी कला है जिसे हर किसी को, लिंग से परे, सीखना चाहिए। यह विचार कि ये परंपराएँ केवल महिलाओं तक सीमित रहें, एक सांस्कृतिक निर्माण है जिसे बदलने की जरूरत है। आखिरकार, खाद्य परंपराएँ सीखने की जिम्मेदारी सिर्फ युवा महिलाओं पर क्यों डाली जाती है और पुरुषों पर नहीं?
नानी अक्सर कहती हैं कि पुरानी खाने-पीने की परंपराएँ धीरे-धीरे खत्म हो रही हैं। क्या यह इसलिए है कि आज के लोग मेहनत करने के लिए तैयार नहीं हैं? फिर भी, नानी हर काम पूरे जोश और समर्पण के साथ करती रहती हैं। जब मैं उनसे पूछती हूँ, “इतना सारा काम आप कैसे संभाल लेती हैं?” तो वे बस मुस्कुरा देती हैं और चुप रह जाती हैं। लेकिन उसी चुप्पी में एक गहरी ठान होती है, परंपरा को जीवित रखने की।
हमारे गाँव में ज़्यादातर लोग खनोर सिर्फ बेचने के लिए ही इकट्ठा करते हैं, और केवल कुछ ही लोग पारंपरिक तरीके से सीक और जीम बनाने की मेहनत करने को तैयार रहते हैं। मेरी नानी उन्हीं कुछ लोगों में से हैं, जो खनोर से सीक निकालने की प्रथा को आज भी जारी रखती हैं। उसी जोश और मेहनत के साथ, वह आज भी सीक से स्वादिष्ट व्यंजन तैयार करती हैं। सीक की कीमत धीरे-धीरे बढ़ रही है, 200 ग्राम अब ₹400 में मिलते हैं। जैसे-जैसे यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती जाएगी, इसका मूल्य और मांग दोनों बढ़ते रहेंगे।
जब मैंने गाँव की अन्य महिलाओं से पूछा कि उन्होंने सीक बनाना कैसे सीखा, तो अधिकतर का जवाब यही था: ‘हमने यह अपने बुज़ुर्गों से सीखा है।’ लेकिन आज की युवा पीढ़ी इन परंपराओं से धीरे-धीरे दूर होती जा रही है, शायद इसलिए कि वे पहले जैसी मेहनत नहीं करना चाहते, या शायद इसलिए कि अब सब कुछ बाजार में आसानी से उपलब्ध हो गया है। आखिर, जब चीज़ें आसानी से मिल सकती हैं, तो इतनी मेहनत क्यों की जाए? फिर भी, मेरी नानी और माता जी हमें बार-बार प्रेरित करती हैं और कहती हैं, ‘सीख लो, ताकि यह परंपरा कभी खत्म न हो।’ वे चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ समझें कि हमारा खानपान कितना गहरा और मूल्यवान है।
फिर भी मन में एक सवाल रह ही जाता है, ‘क्या ये परंपरा यूँ ही पीढ़ियों तक चलती रहेगी, या कहीं खो जाएगी?’यह सोचकर मन थोड़ा भारी हो जाता है… शायद यही हमारी सबसे बड़ी चिंता है।
अकसर मैं दुविधा में पड़ जाती हूँ, हाँ, ये पारंपरिक व्यंजन ज़रूरी हैं, क्योंकि ये हमें हमारी ज़मीन और हमारी पहचान से जोड़ते हैं। ‘लेकिन कभी-कभी लगता है कि इन्हें मनाते-मनाते कहीं हम उस बोझ को बढ़ा-चढ़ाकर तो नहीं दिखा रहे, जो परंपरा संभालने के नाम पर हमेशा महिलाओं के ही कंधों पर डाल दिया जाता है।’
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