• स्पिति के लोग आज भी पत्थर खाते हैं

    लेखक: छेरिंग नोंरबु Read this story in English मेरा नाम छेरिंग नोंरबु है।  मैं ग्राम डैमुल, ज़िला – लाहौल स्पिति, हिमाचल प्रदेश का निवासी हूँ। मैं एक अमची (अमची का मतलब है “सभी जीवों की माँ”) हूँ। मेरा परिवार सैकड़ों वर्षों से वंशानुगत सोवा रिग्पा (उपचारात्मक प्राचीन विज्ञान) पद्धति से उपचार व प्रचार करते आ रहा है ओर इसे संरक्षित कर रहा है। इस पद्धति के पूरे कोर्स अगर आप किसी संस्थान में करते है तो ५ वर्ष लगते हैं। परन्तु मैं बचपन से ही अपने दादा जी एवं पिता जी से भोटी भाषा लिपि के पश्चात सोवा रिग्पा के ज्ञुत झी- चार बुनियादी चिकित्सा ग्रन्थ (Secret Oral Tradition Of The Eight Branches Of The…