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सेब और पंजों के बीच: जंगल का असली हक़दार कौन?

डाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान के किनारे, जहाँ सेब के बाग जंगल से मिलते हैं, एक युवा कहानीकार धरती की बातें सुनते और उसकी ख़ामोशियाँ समझते हुए बड़ा होता है। खेतों में बिताया गया एक सामान्य दिन जब सब कुछ बदल देता है, तब डर, जीवन बचाने और अपनेपन से जुड़े सवाल सामने आने लगते हैं। यह कहानी स्मृति, साहस और घर तथा जंगल के बीच की असहज रेखा के बारे में है।

कहानीकर्ता : अब्बास अली
गाँव न्यू थीड हरवान, श्रीनगर,
कश्मीर

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पंद्रह साल पहले, सितंबर के महीने में, जब कश्मीर घाटी में फल की फसलों की कटाई का उत्सव मनाया जा रहा था, मेरे दादाजी भी खुश थे। मोहम्मद रमज़ान गानी, जिन्हें हम प्यार से अब्बा जी कहते थे, किसान थे।

वे ताक़त और शांत गरिमा से भरे इंसान थे। मेरे लिए, मिट्टी में लगे अब्बा जी के हाथ ही बहादुरी की पहचान थे। उनकी मेहनत ने सिर्फ़ हमारा पेट नहीं भरा, बल्कि मुझे यह समझ भी दी कि असली ताक़त क्या होती है।

उस दिन, रोज़ की तरह, वे अपने खेतों में घास काटने निकले, जो हमारे घर से लगभग आधा किलोमीटर दूर थे। वे हमेशा की तरह शांत और स्थिर क़दमों से चले। उनके साथ मेरी बहन रिहाना भी थी, जो तब बहुत छोटी थी। वे घर से मुस्कुराते हुए निकले, हरवान गाँव में सबको सादगी और अपनापन के साथ सलाम करते हुए, एक ऐसे जीवन की सहज गरिमा के साथ, जो ज़मीन के बहुत क़रीब जिया गया था।

Apple orchards at the edge of Dachigam National Park, reflecting human–wildlife conflict and coexistence in Kashmir.
जंगल की ओर जाते हुए। फोटो: अब्बास अली

जब वे चराई के मैदानों में पहुँचे, तो उन्होंने दरांती निकाली और घर के मवेशियों के लिए घास काटने लगे। रिहाना पास ही खड़ी उन्हें देख रही थी, जिस तरह वे हाथों में दरांती को झुलाते थे, हर वार साफ़ और पक्का होता। वे घास काटते जाते और उसे फुर्ती से गट्ठरों में बाँधते जाते। यह सब उनके अभ्यास और अनुभव की सहज लय में हो रहा था।

तभी अब्बा जी को कुछ अजीब सा महसूस हुआ, हल्की आह जैसी आवाज़ें, भारी साँसों की आवाज़, दूर से आती एक धीमी दहाड़, और खेतों में धीमी हरकत। दरांती हवा में ही थम गई। सिर उठाकर उन्होंने उस दिशा की ओर देखा, जहाँ से आवाज़ आ रही थी।

पहले उन्हें दूर एक बड़ा, भेड़िये जैसा आकार दिखाई दिया, जिसकी पहचान साफ़ नहीं थी। उन्होंने आँखें मिचमिचाकर ध्यान से देखा। तभी उन्हें समझ आया कि वह एक काला भालू था, जो धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ रहा था।

Apple orchards at the edge of Dachigam National Park, reflecting human–wildlife conflict and coexistence in Kashmir.
एशियाई काला भालू। फोटो: अब्बास अली

भालू डाचीगाम की जंगल वाली दिशा से आ रहा था। मेरी बहन डर के मारे जम गई, समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। अब्बा जी ने उसका डर देख लिया और फुसफुसाकर उसे वहाँ से जाने को कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, सूखे पत्तों की सरसराहट में लगभग दब गई। लेकिन… “चर्र!”—घबराहट में उससे एक आवाज़ निकल गई, पैर के नीचे टहनी के टूटने की हल्की सी आवाज़। भालू झटके से मुड़ा और उनकी ओर बढ़ने लगा।

अब्बा जी सीधे खड़े हो गए, उनकी साँसें स्थिर थीं। “भागो,” उन्होंने रिहाना से फुसफुसाकर कहा। वे समझ गए थे कि अब लड़ने का समय है। हवा में मिट्टी की गंध घुली हुई थी।

रिहाना आज भी उनके शब्दों को याद करती है, मज़बूत और आख़िरी, जैसे दिमाग़ में किसी ज़ख़्म की तरह दर्ज हो गए हों: “तुम भागो, मैं भालू का सामना करूँगा। अगर हम दोनों भागेंगे, तो वह हम पर हमला करेगा। अगर तुम अकेली जाओगी, तो तुम सुरक्षित रहोगी।”

मेरी बहन रोने लगी और उन्हें छोड़कर जाने से मना करने लगी, लेकिन मेरे दादाजी अड़े रहे। उन्होंने अपनी ज़िंदगी से पहले उसकी ज़िंदगी चुनी। आख़िरकार वह भाग गई, और वे भालू के सामने डटे रहे।

इधर अब्बा जी ने अपनी बाँहें उठा लीं, ज़ोर से चिल्लाए, खुद को बड़ा दिखाने की कोशिश की। वह आवाज़ उनके सीने से फटकर निकल रही थी।

जब तक रिहाना गाँव वालों के साथ फिर से खेतों तक पहुँची—चिल्लाते हुए, मदद के लिए बेहाल—तब तक अब्बा जी भालू का सामना कर चुके थे। उन कुछ मिनटों में असल में क्या हुआ, किसी ने नहीं देखा। लोगों ने बस उन्हें पाया, उन्हीं खेतों में पड़े हुए, जहाँ उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी काम किया था। उनका सिर और चेहरा ख़ून से लथपथ था, आसपास की मिट्टी उखड़ी और रौंदी हुई थी। जंगल एकदम शांत हो चुका था। भालू जा चुका था। बस टूटे हुए डंठल और एक भारी सन्नाटा रह गया था, जैसे ज़मीन किसी ऐसे राज़ की रखवाली कर रही हो, जिसे वह कभी ज़ुबान पर नहीं लाएगी।

जब उन्हें आख़िरकार अस्पताल पहुँचाया गया, तब तक बहुत ज़्यादा ख़ून बह चुका था। डॉक्टर धीमी लेकिन घबराई हुई आवाज़ में बात कर रहे थे, तेज़ी से उनके चारों ओर घूमते हुए, जहाँ हो सका, टाँके लगाए जा रहे थे, ख़ून रोकने की कोशिश में हाथ दबाए जा रहे थे। सिर की चोटें बहुत गंभीर थीं, बहुत गहरी, बहुत ज़्यादा। बाहर दुआएँ फुसफुसाहटों और सिसकियों में उठ रही थीं, जुड़े हुए हाथ उम्मीद से काँप रहे थे। लेकिन उम्मीद देर से पहुँची। जैसे किस्मत ने पहले ही अंत लिख दिया हो, अब्बा जी बच नहीं पाए। उस दिन, बिना किसी शोर-शराबे के, शांति से, वे अल्लाह से जा मिले।

अब्बा जी की इस घटना ने हम सबके भीतर गहरे ज़ख़्म छोड़ दिए, ऐसे ज़ख़्म जिन्हें वक़्त भी नरम नहीं कर सका। मैं अपने दादाजी से बहुत प्यार करता था, और ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब वे मेरे ख़यालों में वापस न आते हों, कभी चुपचाप, कभी अचानक उठते दर्द के साथ। वे ऐसे इंसान थे, जिनकी ज़िंदगी से सीख मिलती थी; उनकी मौजूदगी हमारे दिनों को आकार देती थी, बिना कभी आवाज़ ऊँची किए। उनके साथ जो हुआ, वह सिर्फ़ हमारे परिवार की एक बदक़िस्मत कहानी नहीं है; यह इंसानों और जंगल में रहने वाले जानवरों की ज़िंदगियों के आमने-सामने आने की बड़ी कहानी है, दो दुनियाओं की नाज़ुक और अक्सर हिंसक टकराहट।

अब्बा जी का साहस मुझे याद दिलाता है कि यह मुद्दा क्यों ज़रूरी है, ये कहानियाँ चुप्पी में क्यों नहीं दबी रहनी चाहिए, और हमें इंसान–वन्यजीव टकराव की ऐसी त्रासदियों को कम करने के रास्ते क्यों खोजने होंगे। मेरी बहन के लिए यह याद आज भी उसके शरीर में ज़िंदा है। इस घटना का ज़िक्र होते ही वह आज भी डर से काँप उठती है।

“जब मैं याद करती हूँ कि उस जानवर ने अब्बा जी को कैसे घसीटा था, तो मेरे पूरे शरीर में झटके से दौड़ जाते हैं,” वह कहती है। “मैं इस सदमे से कभी बाहर नहीं आ पाऊँगी। मैं चाहती थी कि अब्बा जी हमारे साथ रहें।” उसके शब्द हर बार अधूरे रह जाते हैं, उन सब बातों के बोझ के साथ, जो उससे छिन गईं और जो कभी वापस नहीं आएँगी।

Apple orchards at the edge of Dachigam National Park, reflecting human–wildlife conflict and coexistence in Kashmir.
एशियाई काला भालू। फोटो: अब्बास अली

यह कहानी मेरे गाँव हरवान से शुरू होती है, जो कश्मीर घाटी के श्रीनगर ज़िले में डाचीगाम से लगभग आधा किलोमीटर दूर है। यहाँ इंसानी ज़िंदगी की सीमा जंगल से धीरे-धीरे, लेकिन लगातार, सटी रहती है। डाचीगाम, डाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान की विशाल पहाड़ियों से लगा हुआ है और यह श्रीनगर शहर से लगभग 22 किलोमीटर दूर है। यह ऐसा इलाक़ा है जहाँ घने जंगल चुपचाप सेब के बाग़ों में बदल जाते हैं, और खेती की ज़मीन धीरे-धीरे जंगल में खो जाती है।

डाचीगाम नाम ‘डाची-गाम’ से आया है, जिसका मतलब है “दस गाँव।” यह उन बस्तियों की याद दिलाता है जिन्हें 1910 से 1934 के बीच हटाया गया, ताकि आज का यह संरक्षित राष्ट्रीय उद्यान बनाया जा सके। लगभग 141 वर्ग किलोमीटर में फैला यह पार्क ज़बरवान पर्वत श्रृंखला तक फैला हुआ है और समुद्र तल से लगभग 1,700 मीटर से लेकर 4,200 मीटर से भी ज़्यादा ऊँचाई तक जाता है। यह ऊँचाई और फैलाव तरह-तरह के पेड़-पौधों और जीव-जंतुओं को शरण देता है। लेकिन डाचीगाम सबसे ज़्यादा जाना जाता है हंगुल, लुप्तप्राय कश्मीरी हिरण, के आख़िरी ठिकाने के रूप में, और निश्चित ही एशियाई काले भालू के लिए, जिसकी परछाईं अक्सर जंगल को असहज रूप से इंसानी ज़िंदगियों के बहुत क़रीब ले आती है।

Apple orchards at the edge of Dachigam National Park, reflecting human–wildlife conflict and coexistence in Kashmir.
श्रीनगर के दाचीगाम में स्थित दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान। फोटो: अब्बास अली

मुझे याद है, जब मैं चौदह साल का था और अपने दादाजी के साथ चेरी के बाग़ों से होकर चला करता था। हवा में पकते फलों की मिठास भरी होती थी, पेड़ फल के बोझ से झुके रहते थे। चलते हुए वे बहुत धीमे बोलते थे, जैसे ज़मीन खुद हमारी बातें सुन रही हो।

“गाँव और जंगल की सरहद पर रहने वाले लोग,” उन्होंने मुझसे कहा, “डाचीगाम के आसपास रहने वाले लोग पीढ़ियों से प्रकृति के साथ जीते आए हैं। हम सेब और चेरी के पेड़ लगाते हैं, अपने मवेशी चराते हैं, और जंगल से जलावन इकट्ठा करते हैं।” वे थोड़ी देर रुके, और हाथ से एक डाल को छूते हुए बोले, “लेकिन शांत पतझड़ की रातों में, जब बाग़ पके फलों के बोझ से झुक जाते हैं, तो एक अजीब सी ख़ामोशी छा जाती है। फिर अँधेरे में टहनियों के टूटने की आवाज़ आती है।”

उन्होंने जंगल की ओर देखा। “जब चाँदनी के सायों में हलचल होती है, तो हम समझ जाते हैं इसका मतलब क्या है। काले भालू आ गए हैं।” मीठे फलों की खुशबू से खिंचकर वे पेड़ों और खेतों में घुस आते हैं, और पीछे छोड़ जाते हैं टूटी हुई डालियाँ, बिखरी हुई फसल, और किसानों के दिलों में बैठा डर।

अक्सर गाँव वाले दूरी बनाए रखते हैं, या तो भालुओं के चले जाने का इंतज़ार करते हैं, या अपने बाग़ों को बचाने के उपाय करते हैं। लेकिन कभी-कभी, जैसे मेरे दादाजी के साथ हुआ, ये मुलाक़ातें ज़िंदगी और मौत के बीच की लड़ाई बन जाती हैं, जहाँ साहस, फ़ुर्ती और इंसान तथा जंगल के बीच का नाज़ुक, अनकहा रिश्ता परखा जाता है।

ये एशियाई काले भालू, जिन्हें मून बेयर भी कहा जाता है, कश्मीर के हिमालयी इलाक़ों में घूमते हैं। मज़बूत और ताक़तवर, उनकी छाती पर सफ़ेद रंग का अर्धचंद्र जैसा निशान होता है, घाटी की जंगली विरासत की पहचान, और इस बात की याद कि हमारी ज़िंदगियाँ जंगल से कितनी क़रीब से जुड़ी हुई हैं।

Apple orchards at the edge of Dachigam National Park, reflecting human–wildlife conflict and coexistence in Kashmir.
चिड़ियाघर में एक एशियाई काला भालू। फोटो: अब्बास अली

लेकिन उनकी आमद कभी ख़ामोश नहीं होती। पिछले दो दशकों में कश्मीर घाटी में भालुओं के 2,300 से ज़्यादा हमले दर्ज किए गए हैं। कुछ मामलों का अंत त्रासदी में हुआ। गाँव वालों के लिए ये आँकड़े सिर्फ़ गिनती नहीं हैं; ये उन रातों में बदल जाते हैं जिनमें नींद नहीं आती, उजड़े हुए बाग़ों में, और उस डर में जो भालुओं के जंगल लौट जाने के बाद भी मन में बना रहता है।

यहाँ सेब और चेरी सिर्फ़ फल नहीं हैं, वे ज़िंदगी का सहारा हैं। परिवार महीनों तक अपने खेतों की देखभाल करते हैं, पेड़ों की छँटाई करते हैं, फूलों को पाले से बचाते हैं, और फिर किसी सुबह उठकर देखते हैं कि ज़मीन पर आधे खाए हुए फल बिखरे पड़े हैं। एक किसान नुकसान देखते हुए सिर हिलाकर कहता है, “हम पूरे साल खेतों में मेहनत करते हैं, और बस एक ही रात में भालू सब कुछ बर्बाद कर देता है।”

ऐसे पलों में इंसान और वन्यजीव के बीच का तनाव लगभग महसूस किया जा सकता है। बाग़ में हर सरसराहट, चाँदनी में टहनी के टूटने की हर आवाज़, किसी चलते हुए भालू का संकेत हो सकती है। यह याद दिलाने के लिए कि इस नाज़ुक, साझा ज़मीन में जीना रोज़ का समझौता है। जो भालू के लिए भोजन है, वह इंसान के लिए जीवन का नुकसान बन सकता है। और अक्सर यह टकराव सिर्फ़ खराब फसलों पर ख़त्म नहीं होता। अचानक हुई मुलाक़ातें अपने पीछे लंबे दर्द और नुकसान की कहानियाँ छोड़ जाती हैं, जैसे वह कहानी, जो मेरे दादाजी ने झेली।

फिर भी काला भालू दुश्मन नहीं है। वह एक भूखा जानवर है, जो तेज़ी से बदलते माहौल में रास्ता खोज रहा है। डाचीगाम के आसपास के जंगल अतिक्रमण, अवैध कटाई, और पार्क की सीमाओं पर बढ़ती बस्तियों की वजह से सिमटते जा रहे हैं। जंगलों की कटाई ने भालू के प्राकृतिक भोजन, मेवे, बेरियाँ और जंगली फल, का बड़ा हिस्सा छीन लिया है, जिससे वह खाने की तलाश में गाँवों और बाग़ों की ओर उतरने को मजबूर हो रहा है। ये दौरे किसी दुश्मनी से नहीं, बल्कि ज़रूरत से पैदा होते हैं।

हाल के अध्ययनों ने इस बढ़ते संकट को साफ़ दिखाया है। आवास के टुकड़ों में बँटने, शहरी विस्तार और तेज़ चराई की वजह से डाचीगाम के आसपास वन क्षेत्र में अनुमानित 7% की कमी आई है, और प्राकृतिक आवास भी काफ़ी घटे हैं। इन बदलावों ने इंसान–वन्यजीव टकराव को और गहरा किया है, जिससे बाग़ों की साधारण रातें भी अनिश्चितता, डर और लौट न सकने वाले नतीजों के पल बन गई हैं।

मेरे समुदाय में कुछ आवाज़ें हैं, जो भालुओं को इस इलाक़े से बाहर देखने की इच्छा रखती हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने नुकसान झेला है, जिनके बाग़ उजड़ गए, जिनकी मेहनत एक ही रात में बर्बाद हो गई, और जिनकी नींद डर और चिंता में टूटती रही है। उनके लिए भालू कोई विचार या प्रतीक नहीं, बल्कि रोज़ का ख़तरा है। वे जंगल से दूरी चाहते हैं, शांति चाहते हैं, और उस सुरक्षा की तलाश में हैं जिससे वे अपने बच्चों और अपनी आजीविका को बचा सकें। यह ग़ुस्से या नफ़रत की नहीं, बल्कि थकान और डर से निकली हुई आवाज़ है।

लेकिन इन्हीं आवाज़ों के बीच, आज भी कुछ लोग हैं जो करुणा और सह-अस्तित्व की बात करते हैं। मेरे दादाजी उनमें से एक थे। वे कहा करते थे, “हम इस जगह को साझा करते हैं। हम इस ज़मीन को साझा करते हैं। तभी जीवन संभव हो सकता है।” जो कुछ भी हुआ, उसके बाद भी मैं उन शब्दों को थामे हुए हूँ। मुझे ऐसा लगता है जैसे उन्होंने हमारे लिए छोड़ दिए हों, साथ लेकर चलने के लिए।

मुझे याद है, एक बार एक युवा संरक्षणकर्मी ने मुझसे कहा था, “भालू हमारा दुश्मन नहीं है। वह सिर्फ़ ज़िंदा रहने की कोशिश कर रहा है।” उसकी बातें मेरे दादाजी की सोच से मिलती थीं। मेरे दादाजी अक्सर कहते थे कि अगर हम अपनी फसलों को बचाना सीख लें और साथ ही वन्यजीवों का सम्मान करें, तो हम साथ-साथ जी सकते हैं। उनका मानना था कि सह-अस्तित्व कोई सिद्धांत नहीं, बल्कि हमारी ज़िम्मेदारी है।

अब कुछ गाँव वाले भी ऐसा मानने लगे हैं। मैंने बाग़ों के चारों ओर बाड़ लगते देखी हैं, रात भर जलती सोलर ऊर्जा की लाइटें देखी हैं, और सामुदायिक निगरानी समूह बनते देखे हैं, जहाँ पड़ोसी बारी-बारी से खेतों की रखवाली करते हैं। ये छोटे-छोटे कदम हैं, लेकिन इनका महत्व है। पास के कुछ गाँवों में इन उपायों से भालुओं से होने वाली मुठभेड़ों में कमी आई है। फिर भी मैं जानता हूँ कि असली बदलाव इससे कहीं गहरा होना चाहिए, जंगलों को फिर से सँवारने में, समुदायों को साथ जोड़ने में, और ऐसे वैकल्पिक आजीविका के रास्ते खोजने में, जहाँ ज़िंदा रहना हर समय डर की क़ीमत पर न हो।

मेरे लिए डाचीगाम के काले भालू की कहानी सिर्फ़ टकराव की कहानी नहीं है। यह संतुलन की कहानी है, नाज़ुक और आसानी से टूट जाने वाली। यह इस बात की सीख है कि जंगल को जीतने की कोशिश किए बिना उसके साथ कैसे रहा जाए। मैं एक ऐसे भविष्य की कल्पना करता हूँ, जहाँ बाग़ सुरक्षित रहें और भालू फिर से ऊँची ढलानों पर, जंगली फलों पर निर्भर होकर रहें, हमारे घरों से दूर। यह भविष्य संभव होगा या नहीं, यह सिर्फ़ जंगलों पर नहीं, बल्कि हम जैसे लोगों के फ़ैसलों पर निर्भर करता है, जो इस ज़मीन को साझा करते हैं।

अगर यह टकराव यूँ ही चलता रहा, तो हम सब हारेंगे। लेकिन अगर समझ बढ़ी, तो कुछ और भी संभव हो सकता है। मैं चाहता हूँ कि बच्चे यह जानते हुए बड़े हों कि भालू कोई राक्षस नहीं है। वह जंगल का हिस्सा है, जैसे हम धरती का हिस्सा हैं। मैं चाहता हूँ कि उन्हें डर नहीं, बल्कि समझ मिले, और नुकसान की नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व की कहानियाँ विरासत में मिलें।

आज भी भालू हमें चौंका देते हैं। लेकिन मुझे एक बदलाव का एहसास होता है। लोग कोशिश कर रहे हैं। देख रहे हैं। सीख रहे हैं। उम्मीद कर रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि समाधान को और आगे जाना होगा, और मैं उनसे सहमत हूँ। हमें इंसानी ज़िंदगियों और वन्यजीवों, दोनों के लिए जगह बनानी होगी, इससे पहले कि और परिवार मेरे जैसे दुख का बोझ उठाएँ।

यही डाचीगाम ने मुझे सिखाया है। सेब और चेरी से लदे बाग़ों को सुरक्षा चाहिए, और रात में ख़ामोशी से घूमते भालुओं को भोजन। अगर किसी एक की हार होती है, तो दोनों हारते हैं।

मेरे दादाजी ने अपने परिवार की रक्षा के लिए भालू का सामना करते समय साहस दिखाया। लेकिन मेरे लिए असली साहस सह-अस्तित्व चुनने में है, ताकि किसी और को दादा, पिता या किसी ज़िंदगी को न खोना पड़े। यही वह कहानी है, जो मैं कहना चाहता हूँ। यही वह भविष्य है, जिसे मैं चुनते देखना चाहता हूँ।

Meet the storyteller

Abbas Ali
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Abbas Ali is a Horticulture Technician from Harwan, Srinagar, whose love for nature and storytelling was shaped by the stunning Himalayan landscape of the Dachigam National Park in Kashmir, right next to which he grew up. As a Himal Prakriti Fellow, he aims to share stories of local communities, wildlife, and traditions from his region with a wider audience. Committed to conservation and supporting sustainable livelihoods, Abbas hopes to highlight the deep connections between people, culture, and the natural world.

अब्बास अली श्रीनगर के हरवान से एक हॉर्टिकल्चर टेक्नीशियन हैं, जिनका प्रकृति और कहानी कहने का प्रेम कश्मीर के दाचीगाम नेशनल पार्क के मनमोहक हिमालयी परिदृश्य के बीच पला-बढ़ा, जिसके ठीक पास वे बड़े हुए। एक हिमल प्रकृति फ़ेलो के रूप में, उनका उद्देश्य अपने क्षेत्र की स्थानीय समुदायों, वन्यजीवों और परंपराओं की कहानियाँ व्यापक दर्शकों तक पहुँचाना है। संरक्षण और सतत आजीविकाओं के समर्थन के प्रति समर्पित अब्बास आशा करते हैं कि लोग, संस्कृति और प्राकृतिक दुनिया के बीच गहरे संबंधों को उजागर कर सकें।

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ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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