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यह मन की उलझन कहीं ऊन का धागा तो नहीं?

*ट्रिगर वार्निंग: आत्महत्या से मौत

यह कहानी हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से गाँव उस्तेहड़ में रहने वाली एक महिला तारो की आपबीती है। यह केवल एक महिला की निजी पीड़ा नहीं, बल्कि उस सामाजिक-आर्थिक सच्चाई की झलक है, जिसमें गरीबी, जाति, मानसिक स्वास्थ्य और पितृसत्ता एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। तारो की शादी 13 साल की उम्र में कर दी गई थी। गरीबी, अधूरे सपनों और घर बनाने की जद्दोजहद, मज़ाक, ताने और बेरोज़गारी के बोझ ने उसके पति रामलाल को भी भीतर से तोड़ दिया था। पति की मौत के बाद तारो को समाज और परिवार हर जगह से ताने मिले, लेकिन उसने हार नहीं मानी। यह कहानी बताती है कि गरीबी और चुप्पी केवल पेट की भूख ही नहीं, मन को भी मार देती है और जब तक हम मानसिक स्वास्थ्य को गरीबी और सामाजिक हिंसा के साथ जोड़कर नहीं देखेंगे, तब तक कोई बदलाव संभव नहीं होगा।

कहानीकार : सविता चौहान
गाँव उस्तेहड़, ज़िला कांगड़ा,
हिमाचल प्रदेश

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उफ्फ़ ये मेरे मन की उलझन, ऊन का धागा तो नहीं,  फिर भी उलझती चली जा रही है। गाँठ गहरी है और बहुत मजबूत भी, जिसे सुलझाना बहुत जरूरी है। मैंने देखा है बहुत से लोग इसे सुलझा नहीं पाए और हार गए, क्योंकि उन्हें कोई मदद नहीं मिली। लेकिन यकीन है मुझे मैं इसे सुलझा लूँगी, धीरे-धीरे ही सही पर एक दिन ज़रूर………!

अरे माफ कीजिए, मैं भी क्या बोलने बैठ गई। आप मेरे साथ हिमाचल प्रदेश चलिए। सुना है, यहां पहाड़ों में लोग मन की उलझन दूर करने आते हैं। इन्हीं पहाड़ों के बीच बसा है जिला कांगड़ा का एक छोटा सा गाँव उस्तेहड़ जो कि बैजनाथ से 2 किलोमीटर की दूरी पर धौलाधार पर्वत श्रृंखला पर बसा हुआ है। बैजनाथ एक ऐतिहासिक और धार्मिक जगह है, जो अपने प्राचीन शिव मंदिर के लिए मशहूर है। पहले इस जगह का नाम कीरग्राम था। कहा जाता है यहाँ बहुत ज़्यादा तोते (कीर) पाए जाते थे, इसलिए इसका नाम कीरग्राम रखा गया और आज इसे बैजनाथ के नाम से जाना जाता है। जी हाँ यहीं है मेरा छोटा सा घर जहां मैं अपने परिवार के साथ रहती हूँ।

पहाड़,बर्फ़, गाँव, तारो का घर और खेतों के बीच से रास्ता। फोटो: सविता

यहां मेरी सबसे पक्की सहेली तारो भी रहती है। वो भी मेरी तरह कथित दलित समुदाय से हैं, उनकी उम्र 46 साल है। उम्र में मुझसे बड़ी है, लेकिन दोस्ती में उम्र थोड़ी देखी जाती है। आज मैं बहुत दिनों के बाद तारो से मिली।  सुबह का समय था, उसने पीला सूट पहना हुआ था, जिसमें वो बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। उसके बिखरे हुए घुँघराले बाल और  उसकी भूरी आंखे उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थीं। मैंने उसे कहा.. अरे वाह क्या बात है, आज तो बहुत सुंदर लग रही हो। इतने में वो शर्मा गई और बोली तुम भी क्या बोलती रहती हो। उसके बाद हम दोनों गले मिले और हर बार की तरह एक-दूसरे का हालचाल पूछा।

जब मैंने उससे पूछा कि तुम कैसी हो? तो उसने कहा, ‘शरीर से तो चंगी-भली दिखती हूँ, लेकिन मन का तो मुझे भी नहीं पता। हमारे शरीर के साथ-साथ मन का ठीक होना भी बहुत जरूरी है क्योंकि जब मन भारी होता है, तो कुछ भी ठीक नहीं लगता है।’

जब भी तारो को कुछ साझा करना होता है, तो वो मेरे साथ बातें करती है। उस दिन हम बैठ कर बातें कर रहे थे, तो मज़ाक में उसने मुझे पूछा कि तुम शादी कब कर रही हो? हर बार की तरह मेरा एक ही जवाब था। मुझे भी नहीं पता… या फिर शायद मैं नहीं करूंगी। ये जवाब सुनकर तारो ने कहा, “तुम्हारा सही है। अपनी मर्ज़ी तो चला सकती हो।”

मुझे हमेशा से कहानियां सुनने और समझने का शौक रहा है। शायद इसलिए जब भी कोई अपने मन की बातें साझा करता है, तो मैं बस सुनती रहती हूँ। इस बार भी ऐसा ही हुआ। मेरी सहेली तारो ने अपने जीवन की वो परतें मेरे सामने खोल दीं, जिन्हें उसने सालों तक किसी से नहीं कहा था। उसने कहा, जब वो छोटी थी तो उससे किसी ने पूछा तक नहीं था कि उसे शादी करनी भी है या नहीं। जब वो 13 साल की थी, तब उसकी शादी हो गई थी। उसके पहले पीरियड भी शादी के बाद शुरू हुए। न तो वो अपना बचपन जी पाई और न ही ससुराल में रह पाई। कई सालों से वह अपने दो बच्चों के साथ यहां अपने मायके में रहती है।

गाँव के लोग अक्सर कहते हैं कि तारो की हँसी पहले जैसी नहीं रही। पर हर सुबह जब वह आँगन में झाड़ू लगाती है, तो हल्की-हल्की धूप का उसके चेहरे पर पड़ना और उसका धीरे-धीरे पहाड़ी गानों के बोल गुनगुनाना, ऐसा लगता है मानो घर का आँगन उसकी साँसों से ज़िंदा हो उठा हो। हर सुबह काम ख़त्म करने के बाद वह एक बड़ी-सी खिड़की के पास घंटों बैठकर दूर पहाड़ों की ओर देखती रहती है। जैसे भीतर कहीं उसे कोई अनकहा दर्द खा रहा हो। यह दर्द जुड़ा है उसके पति रामलाल की यादों से। जी हां रामलाल की यादों से!….

खिड़की और तारो। फोटो: सविता

वह कहती है, “मैं हमेशा याद करती हूँ, वो दिन जब हमारा पूरा परिवार एक साथ मिलकर रहा करता था। उस वक्त हमारे पास घर नहीं था। मैं और रामलाल दोनों बच्चों के साथ एक झोंपड़ी में रहा करते थे। एक बांस की झोंपड़ी थी जिसकी दीवारें पूरी तरह सड़ चुकी थीं और छत पर लगी टीन भी जंग से सारी गल चुकी थी। हर जगह छेद ही छेद थे जिनसे आसमान बिल्कुल साफ दिखाई देता था। मानो कोई इंसान घर के अंदर नहीं बाहर रह रहा हो। उन दिनों हमारे पास इतने पैसे भी नहीं हुआ करते थे, कि हम नई टीन तो छोड़ो एक तिरपाल भी खरीद पाते।

बरसात का मौसम हमारे लिए सबसे मुश्किल समय हुआ करता था क्योंकि जब भी बारिश होती, छत से बहुत ज्यादा पानी टपकता था। मैं और मेरे बच्चे हड़बड़ा कर बर्तन ढूँढने में लग जाते थे ताकि जहाँ-जहाँ से पानी टपक रहा है, वहाँ बर्तन रखकर सामान को भीगने से बचाया जा सके। लेकिन उसका कभी कोई फायदा नहीं होता था, मैं एक जगह बर्तन रखती उसी समय दूसरी तरफ से भी पानी टपकना शुरू हो जाता। यहां तक कि पूरा चूल्हा भी पानी से भर जाता था। उस दिन खाना भी नसीब नहीं होता हमें, क्योंकि हमारे पास गैस भी नहीं थी जिसमें हम खाना बना पाते। सब लोग ऐसे ही बिना खाना खाए भूखे पेट सो जाते थे। शायद रामलाल को सबसे ज़्यादा चिंता इसी बात की होती थी। बच्चों को कहाँ रखूँगा? क्या उन्हें भी इसी झोंपड़ी में बड़ा करना होगा? वो सोचता रहता लेकिन यह चिंता वह किसी को बता नहीं पाता, मुझे भी नहीं। शायद सोचता होगा ये भी टेंशन लेने लगेगी। ऐसे ही दिन बीतते चले गए वह नशे में चूर रहने लगा। वह बात करते वक्त एक पल के लिए रुकी और मेरी ओर ऐसे देखने लगी जैसे शब्दों को तौल रही हो….                                                                                          

झोंपड़ी। फोटो: अमृत विचार

एक दिन गाँव की पंचायत प्रधान ने कहा, ‘घर बनाने के लिए सरकार पैसे देती है। आप लोग भी फॉर्म भर दो।’ मैंने और रामलाल ने वो फॉर्म भर दिए। यह साल 2012 की बात है जब एक दिन ख़बर आई कि सरकार की तरफ से घर बनाने के लिए 50,000 रुपये मंज़ूर हुए हैं। यह सुनकर हमें बहुत खुशी हुई, लेकिन उससे कई ज्यादा चिंता भी होने लगी कि हम इतने कम पैसों में घर कैसे बना पाएंगे.. !  यह तो सोचने वाली बात है, गरीब लोगों को घर बनाने के सपने तो दिखा देते हैं, लेकिन योजनाएं और वादे दीवारें खड़ी होने से पहले ही ढह जाते हैं।”

“रामलाल पहले से ज्यादा मेहनत करने लगा। हमने एक-एक पैसा जोड़कर घर के लिए सामान खरीदना शरू कर दिया और धीरे-धीरे सामान भी जुटा लिया। अब बस एक मिस्त्री चाहिए था ताकि घर बनाने का काम शुरू हो पाता। रामलाल गाँव के मिस्त्री को बुलाने में जुट गया। वो गाँव के हर एक मिस्त्री के पास गया। लेकिन कोई मिस्त्री काम करने नहीं आया। शायद वो भी सोचते होंगे कि जिन लोगों के पास घर का राशन भरने तक के पैसे नहीं हैं, वो हमें क्या खाक पैसे दे पाएंगे !..

मिस्त्री हर बार टाल देता- ‘कल आऊँगा… परसों आऊँगा।’ रामलाल उम्मीद लिए बार-बार बुलाने जाता रहा। दिन हफ़्तों में बदल गए। घर का सपना अधूरा ही रह गया। गाँव वाले जब भी उसे देखते, हँसी-मज़ाक में पूछ बैठते, ‘क्यों भई, कब शुरू हो रहा है तुम्हारे मकान का काम? इतना लेट करोगे तो तुम्हारे घर के पैसे वापस ले लेगी सरकार!’ वह हल्की सी मुस्कान बनाकर जवाब देता, हम जल्दी ही काम शुरू करेंगे बस मिस्त्री आ जाएगा दो-चार दिन में। पर उसकी आँखों में छुपी बेबसी कोई नहीं पढ़ पाया। धीरे-धीरे यह बेबसी उसके सीने पर बोझ बन गई। उसने शराब का सहारा लेना शुरू कर दिया। कई बार नशे में वो मुझे और बच्चों को मारता और झोंपड़ी से बाहर निकाल देता था।

एक दिन की बात है बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। छत जगह-जगह से टपक रही थी। चूल्हा पानी में डूब चुका था। उस दिन रामलाल ने दिन में ही खूब शराब पी ली थी। उस दिन उसने मुझ पर हाथ भी उठा दिया, गुस्से में आकर वह चिल्लाया, कहने लगा निकलो बाहर! सब निकल जाओ…! मैं अपने दोनों बच्चों के साथ पड़ोसियों के घर सोने चली गई। झोपड़ी के अंदर वो अकेला रह गया। मुझे लगा सो जाएगा हर बार की तरह, लेकिन उसके मन में न जाने क्या चल रहा था।

रस्सी। फोटो: अमृत विचार

उस रात वो सोया नहीं, उसने मेरे ही एक दुपट्टे को छत की एक लकड़ी में फंदा बांध कर आत्महत्या कर ली। उस रात इतनी बारिश थी, कि हम में से किसी को उसकी चीख तक नहीं सुनाई दी। सुबह उठकर मैं अपनी झोंपड़ी में गई इस उम्मीद के साथ कि अब वह शांत हो गया होगा। हमारा दरवाज़ा कुंडी वाला नहीं था इसलिए अंदर या बाहर दोनों तरफ से खुल जाता था। जैसे ही मैंने बाहर से दरवाज़ा खोला, मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह छत से लटका हुआ था। उसका शरीर बिल्कुल ठंडा हो चुका था। आँखें खुली और चेहरे पर मुस्कान बिल्कुल वैसी ही थी जैसे हमेशा हुआ करती थी। मुझे यकीन ही नहीं हुआ, कुछ समय के लिए मैं बिल्कुल सुन्न हो गई।

मैंने खुद को संभाला और रोते-रोते नंगे पांव बारिश और कीचड़ में अपने भाई के घर गई, उन्हें बुलाने कि एक बार कोई उसे देख ले। मेरे भाई ने दूर से देखकर ही बता दिया कि अब वो इस दुनिया में नहीं रहा। वो मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दिन था। एक तरफ मैंने अपने पति को खोया था और दूसरी तरफ लोगों ने ताने दिए कि उसने मेरी वजह से आत्महत्या कर ली। कहने को तो यह आत्महत्या से मौत हुई थी, लेकिन असल में उसकी मौत की वजह गरीबी और चिंता थी, जिसे वह किसी से कह न पाया। लोगों के मज़ाक के कारण उसके मन में इतनी उलझन हो गई कि उसने अपने जीवन को खत्म करने का फैसला ले लिया।

इसके लिए लोगों ने बार-बार मुझे जिम्मेदार ठहराया। यहां तक कि पुलिस ने भी हमें ही टॉर्चर किया। जो पुलिस हमारी सहायता के लिए होती है, उसने हमारी एक नहीं सुनी और बार-बार मुझे और मेरे बेटे को (जो उस समय नौवीं कक्षा में पढ़ता था) पुलिस स्टेशन बुलाते रहे। उन दिनों मेरे पास 10 रुपये तक नहीं थे। लेकिन जो अपराध मैंने नहीं किया था, पुलिस वालों ने उसके भी पैसे हमसे मांगे।

कैसा न्याय है यह, जहाँ ग़रीबों की रक्षा करने वाले ही उन्हें और निचोड़ने लगते हैं, जबकि उसकी मौत के असली कारण गरीबी, भूख और अवसाद को कोई सज़ा नहीं मिलती?”

पहाड़ और तारो। फोटो: सविता

एक तरफ पति की मौत का गम और दूसरी तरफ इतना ज्यादा टॉर्चर, मैं बहुत परेशान हो गई थी। मैं मर भी नहीं सकती थी क्योंकि मेरे दो बच्चों की जिम्मेदारी अब मुझ पर थी। मैं बिल्कुल हार चुकी थी ज़िंदगी से, मेरे लिए बच्चों को दो वक्त की रोटी तक खिलाना मुश्किल हो गया था। कोई काम भी नहीं देता था मुझे, उस वक्त सबकी नफरत भरी निगाहों के बीच मैंने और मेरे बच्चों ने कैसे ज़िंदगी गुजारी है वो मैं ही जानती हूं। बात करते-करते अचानक उसका चेहरा उदास हो गया और मुस्कान जैसे मिट गई। आँखों में आँसू थे और दबा हुआ स्वर दिल को झकझोर देने वाला था। कुछ देर बाद उसने फिर से अपनी कहानी बताना शुरू किया। लोगों के घर में काम करती, वो भी घर का सारा काम करवाने के बाद 30 रुपये और पिछले दिन का बचा हुआ बासी खाना देते थे। मुझे बहुत दुख होता था कि मैं इतनी बेसिक जरूरत भी पूरी नहीं कर पा रही थी बच्चों की। मेरे बच्चों ने छोटी सी उम्र में ही वो सब देख लिया जो उम्र भर के लिए एक घाव की तरह उनके दिल में बैठ गया है।

Society & Inequality, Women & Identity, Mental Health
स्कूल और गांव में बुलिङ्ग। फोटो: https://drsinternational.com/

जब बच्चे स्कूल जाते तो सब उनसे पूछते, ‘कैसे मरा तुम्हारा बाप?’, ‘तुम लोगों ने मारा है न उसे?’ इन सवालों से वो बहुत परेशान होते थे। दोनों ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया, खेलना बंद कर दिया, उसके बाद वो कभी खेलने नहीं गए। लोगों के सवालों ने उनका बचपन भी छीन लिया। मैं भी बहुत बीमार रहने लगी थी, रात को नींद आना बंद हो गई। अगर गाँव की भाषा में कहूँ तो, मींजो बड़ा भारी उल्लण पौंदा था (पैनिक अटैक) यानी बहुत घबराहट होती थी, पूरे हाथ-पैर कांप जाते थे और एकदम पसीना पड़ने लगता। पर यह थोड़ी देर के लिए ही होता था। लेकिन दिन में कितनी बार ऐसे होगा बिल्कुल पता नहीं लगता था।

अगर कभी किसी को बताने की कोशिश भी करती, कि मैं ठीक नहीं हूं, तो सबको ये लगता था कि मैं कोई ड्रामा कर रही हूं। कोई सुनने को तैयार ही नहीं था।”

तारो की बातें सुनकर मैं सोचने लगी,क्यों एक महिला को पागल कह देना आसान है, पर यह पूछना मुश्किल है कि उसकी आत्मा को किसने तोड़ा? क्यों हर बार महिला को ही दोषी ठहराया जाता है, और क्यों असली ज़िम्मेदारी उस व्यवस्था से हट जाती है जिसने उसे और उसके परिवार को अकेला कर दिया?

एक बार मैंने डॉक्टर को दिखाया तो उसने मुझे बोला,

‘बहनजी आप ज्यादा सोचते हैं क्या किसी चीज के बारे में?’

‘नहीं! मैं क्या सोचूँगी’

‘ये डिप्रेशन है, यानी मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। शरीर का तो सब ध्यान रखते हैं लेकिन अपने मन के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भूल जाते हैं। इसे ठीक करने के लिए आपको कुछ दिनों तक दवाई लेनी होगी। जब आप ठीक महसूस करने लगेंगी तब धीरे-धीरे इसे छोड़ सकती हैं, और हां एक और बात आप अकेले मत रहिए। जितना हो सके लोगों के साथ बैठिए और घूमने निकल जाया कीजिए। आपको इससे जल्दी आराम मिलेगा।’

मैंने वैसे ही किया और मैं धीरे-धीरे थोड़ा ठीक महसूस करने लगी। मुझे गाँव के एक स्कूल में साफ-सफाई का काम भी मिल गया। उस वक्त मुझे  2000 रुपये हर महीने मिला करते थे। पैसे कम थे लेकिन एक सहारा हो गया कि खाने के लिए किसी के सामने हाथ नहीं फैलाने पड़ेंगे। मैंने  हिम्मत करके अब घर का काम फिर से शुरू करने के बारे में सोचा।

इस बार, मैं अपने भाई की मदद से दूसरे गाँव के मिस्त्री को बुलाने गई। उनको मैंने पहले ही यह बता दिया कि, मैं उनको दिहाड़ी तब ही दे पाउंगी, जब मुझे घर की किश्त के पैसे मिलेंगे। वो मान गया और मेरे घर का काम शुरू हो गया। लेकिन यह इतना आसान कहाँ था! इसमें भी बहुत मुश्किलें आईं। काम के बीच में ही ईंटें कम पड़ गईं, मेरे पास पैसे नहीं थे इसलिए मैंने खुद कच्ची इंटे बनाने के बारे में सोचा। लकड़ी का एक टयाऊ  ईंटें बनाने वाला साँचा बनवाया और फिर मैंने और मेरे बच्चों ने मिलकर ईंटें बनाना शुरू कर दिया। ईंटें बनने के बाद फिर से घर का काम शुरू किया। इस बार घर की पूरी दीवारें तो तैयार हो गईं।

खेतों के बीच छोटा सा घर। फोटो: सविता

छत का काम रुक गया क्योंकि मेरे लिए अब बांस की लकड़ी खरीद पाना मुश्किल हो गया। मैंने लोगों से मदद ली और छत ले लिए, लकड़ी इकट्ठा कर ली और कुछ दिनों बाद छत का काम भी पूरा हो गया। यह काम करवाने में हमें लगभग 2 साल लग गए। मगर खुशी इस बात की थी कि अब हमारे पास अपना एक कमरा था, जहां हम सुकून से रह पा रहे थे। फिर भी रामलाल के जाने का दुख हमेशा के लिए हमारे दिलों में रह गया।  वो बात करते-करते थोड़ी देर शांत हो गई, और अपनी आँखें  बंद करके कुछ सोचने लगी, मानों उसके अंदर कोई अनकहा द्वंद चल रहा हो।   

आज रामलाल को गुजरे हुए तेरह साल हो गए हैं, लेकिन हम एक दिन भी उसे नहीं भूल पाएं हैं। अब बच्चे भी बड़े हो गए हैं, थोड़ा बहुत कमाने लगे हैं। मेरी बेटी पास ही एक गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) में काम किया करती थी। वहाँ से उसने सीखा की मानसिक स्वास्थ्य समस्या के बारे में बात करना कितना जरूरी है। उसने वहाँ के लोगों की मदद से काउंसलिंग ली और हमें भी बताया कि, अगर आप अपने दिल की बात किसी से साझा नहीं कर पा रहे हैं और आपको उसकी वजह से तकलीफ हो रही है, तो आप उसके लिए थेरेपी सेशन भी ले सकते हैं।

हिमाचल में बहुत सी ऐसी संस्थाएं हैं जो फ्री में थेरेपी सेशन और काउंसलिंग करवाती हैं। अब तक मैंने कोई सेशन नहीं लिया है। लेकिन अब मैं जागरूक हो गई हूं। मुझे पता है कि मन की उलझन को ठीक करने का हल मरना नहीं है। जीने के लिए किसी की मदद लेना है। अब मेरी मानसिक स्थिति पहले से बेहतर हो गई है। यहां तक कि अब मैं गाँव की महिलाओं के साथ बैठकर उनके साथ बातचीत कर लेती हूँ और वो भी मेरे साथ अपनी बातें साझा कर लेती हैं। मुझे अच्छा लगता है कि मैं किसी को सुन पा रही हूँ जब किसी इंसान को ज़रूरत है।”

तारो की कहानी को सुनकर, मैं सोचने लगी की हम कब तक पुरुषों से यही कहते रहेंगे कि शराब मत पियो, और महिलाओं से कि रोना मत… पर कभी यह नहीं पूछेंगे कि गरीबी और चुप्पी कब तक हमें मारती रहेगी? जब तक हम यह नहीं पूछेंगे, या इस मुद्दे को लेकर एकजुट नहीं होंगे, तब तक शायद कुछ नहीं बदल पाएगा। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या सिर्फ़ व्यक्तिगत हिम्मत या परिवार का साथ ही काफी है? तारो जैसी हज़ारों महिलाएं आज भी मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच से बाहर हैं। क्योंकि पहाड़ों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो हैं, पर वहां काउंसलर, मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक सेवाएं लगभग न के बराबर हैं। गाँवों में तो लोग ‘डिप्रेशन’ या ‘मानसिक स्वास्थ्य समस्या’ जैसे शब्दों से परिचित भी नहीं हैं। जब कोई व्यक्ति बोलता है कि उसका मन भारी है या नींद नहीं आती, तो लोग उसे ‘कमज़ोर’ या ‘नाटक करने वाला’ कह देते हैं।

सरकारें जब गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण या ग्रामीण स्वास्थ्य की बात करती हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य अक्सर अनदेखा ही रह जाता है। जबकि यह हर नीति में शामिल होना चाहिए। रोज़गार के साधन न होने के कारण यहां गरीबी इस दर्द को और बढ़ा देती है, क्योंकि इलाज या काउंसलिंग तक पहुँच ही नहीं होती। अगर पंचायत स्तर पर सामुदायिक काउंसलिंग केंद्र, महिला स्वयं सहायता समूहों के साथ मानसिक स्वास्थ्य कार्यशालाएँ, और जागरूकता अभियान शुरू किया जाएँ, तो शायद कई ‘रामलाल’ और ‘तारो’ अपनी कहानी का अंत बदल पाएंगे। क्योंकि मन की उलझन को सुलझाना सिर्फ़ एक व्यक्ति की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज और शासन की साझी ज़िम्मेदारी है।

हिमाचल में अब कुछ संस्थाएँ, गाँवों में मानसिक स्वास्थ्य पर काम करने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन इसके लिए अभी एक लंबा रास्ता तय करना बाकी है। तारो की कहानी इस बात का उदाहरण है कि किस तरह गरीबी, चुप्पी और सामाजिक ताने एक इंसान के मन को धीरे-धीरे तोड़ देते हैं और कैसे संवाद, साथ, रोज़गार के साधन और सहानुभूति उसे दोबारा जोड़ सकते हैं।

Meet the storyteller

Savita Chauhan
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Savita, an aspiring storyteller and writer, brings a strong foundation in gender studies and rural journalism. She completed a one-year Gender Fellowship with the 'Himachal Queer Foundation' and gained hands-on experience in grassroots reporting through the 'Bobo Diyaan Gallaan' initiative. With a deep interest in writing and poetry, Savita also explores visual storytelling through photography. She interned with Feminism in India (FII), where she honed her article-writing skills and deepened her understanding of social issues. She works part-time as an Assistant Hindi Editor at FII.

सविता, एक उभरती हुई कहानीकार और लेखिका हैं, उन्होंने हिमाचल क्वीयर फाउंडेशन के साथ एक साल जेंडर फ़ेलोशिप पूरी की है और इन्हें   ‘बोबो दियां गलां’ पहल के तहत ग्राउन्ड  रिपोर्टिंग का अनुभव भी है। लेखन और कविता में गहरी रुचि रखने वाली सविता दृश्यात्मक कहानी कहने यानी फोटोग्राफ़ी के माध्यम से भी अपनी अभिव्यक्ति तलाशती हैं। उन्होंने फेमिनिज़्म इन इंडिया (FII) में इंटर्नशिप की, जहाँ उन्होंने लेखन कौशल को निखारा और सामाजिक मुद्दों की गहरी समझ विकसित की। वर्तमान में वे FII में पार्ट-टाइम असिस्टेंट हिंदी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं।

Voices of Rural India
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Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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