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चैहणी कोठी: हिमालयी वास्तुकला का चमत्कार

देवदारों के बीच खड़ी चैहणी कोठी पहली नज़र में ही एक सवाल बन जाती है, क्या यह किसी राजा का किला था, या एक ऐसा सुरक्षा टावर जहाँ पूरा गाँव खतरे के समय सिमट आता था? सदियों पुरानी यह बहुमंज़िला संरचना भूकंपों, समय और कहानियों के बीच आज भी अडिग खड़ी है। इसके पास ही श्रृंग ऋषि का मंदिर है, जहाँ आस्था और लोककथाएँ एक-दूसरे में घुलती हैं। गाँव के लोग अलग-अलग सच बताते हैं, पर कोई एक जवाब सामने नहीं आता। यह कहानी उसी खोज की है, जहाँ दीवारें बोलती हैं, और हर जवाब एक नया रहस्य खोल देता है।

कहानीकर्ता : बालेश्वरी वशिष्ठ
गाँव बंदल, ज़िला कुल्लू,
हिमाचल प्रदेश

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नीले आसमान की गहरी गोद में, जहाँ सूरज की किरणें देवदारों की ऊँचाईयों को चूमती हैं, वहीं कहीं उन सुकून भरे रास्तों पर हम बढ़ते गए। रास्ते के दोनों ओर हरे-भरे देवदार मानो किसी पुरानी कथा के साक्षी हों, और उनके बीच से गुजरती वह ठंडी सरसराती हवा, जैसे अपने साथ कोई रहस्य लेकर चल रही हो। हवा की उस खास सी गंध और आवाज़ ने हमें धीरे-धीरे एक अनजानी सी मंज़िल की ओर खींचा… और हम पहुँच गए चैहणी गाँव।

पहली ही नज़र में यह गाँव किसी लोककथा का हिस्सा लग रहा था, छोटे-छोटे घर, पहाड़ों की गोद में बसा हुआ शांत वातावरण, और बीचोंबीच खड़ी एक बेहद शानदार और अनोखी बहुमंज़िला इमारत, चैहणी कोठी। चैहणी कोठी, हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले की बंजार तहसील के चैहणी गाँव में स्थित है। यह कोई साधारण भवन नहीं, बल्कि एक प्राचीन किला-टावर है। काठ-खूनी शैली की वास्तुकला में बना, जो पत्थर और लकड़ी से रचा गया एक दुर्लभ नमूना है। यह संरचना वास्तुशिल्प की दृष्टि से अद्भुत है और इसकी मौजूदगी अपने आप में एक कहानी कहती है, सुरक्षा, भूकंप-प्रतिरोध और आध्यात्मिक विश्वास की।

चैहणी गांव। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ

करीब 45 मीटर (150 फीट) ऊँचाई के साथ, चैहणी कोठी को एक समय हिमाचल का सबसे ऊँचा टॉवर माना जाता था। इसकी बनावट जितनी ऊँचाई में विशिष्ट थी, उतनी ही अंदर से जटिल भी। कोठी के भीतर छोटे-छोटे रास्ते और गुप्त गलियाँ बनाई गई थीं, जो इसे एक मज़बूत किला और रहस्य से भरी हुई इमारत बनाती है।


चैहणी कोठी की पहली झलक। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ

समय के साथ यह जगह इतिहास से आगे बढ़कर एक जीवंत सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र बन चुकी है। आज भी यहाँ श्रद्धालु, इतिहास प्रेमी और पर्यटक बड़ी रुचि से आते हैं। कोई इसकी बनावट में खो जाता है, तो कोई इसकी कहानियों में।

स्थानीय लोग इस कोठी को पीढ़ियों से जानते और मानते आए हैं। किसी से पूछो तो कहेगा, “यह तो सात सौ साल पुरानी है!” कोई और जोड़ता है, “नहीं-नहीं, पंद्रह सौ साल से भी ज़्यादा होगी।” शायद सही आंकड़ा आज भी किसी को न पता हो, लेकिन उसकी उम्र उसकी दीवारों में दर्ज है, हर लकड़ी के जोड़ में कोई किस्सा दफ्न है।

लेकिन सच कहूँ तो, उस पल मुझे उसकी सही उम्र जानने की कोई जल्दी नहीं थी। मुझे ज़्यादा दिलचस्पी उन कहानियों में थी, जो उसकी दीवारों में अब भी साँस ले रही थीं। जैसे-जैसे सूरज की रोशनी उसकी ऊँचाइयों को छूती है, वह हर सुबह फिर से जीवित हो उठती है। और उस दिन, मुझे लगा, शायद वह अपनी कहानियाँ मुझे भी सुनाना चाहती है… अगर मैं ठहरकर सुन सकूँ।

चैहणी कोठी और उसकी काठ कूनी वास्तुकला। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ
जहाँ लकड़ी, पत्थर और मिट्टी ने रचा एक इतिहास

चैहणी कोठी की भव्यता उसकी ऊँचाई या बनावट में तो छुपी ही है, साथ में उसमें इस्तेमाल की गई सामग्री में भी एक प्रकृति से जुड़ी गहराई है। इस संरचना के निर्माण में मुख्य रूप से देवदार की लकड़ी का उपयोग किया गया है। यह कोई साधारण लकड़ी नहीं, बल्कि हिमालय की ठंडी और नम जलवायु में पली-बढ़ी ऐसी लकड़ी है, जो नमी और कीड़ों से बचाने में स्वाभाविक रूप से सक्षम होती है। देवदार की यह मजबूती ही है जो कोठी को सदियों तक टिकाऊ, सुरक्षित और जीवित बनाए रखती है। यही लकड़ी प्राकृतिक आपदाओं, विशेषकर भूकंप जैसी घटनाओं के समय एक लचीला कवच बन जाती है।

चैहणी कोठी का प्रवेशद्वार। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ

लकड़ी के साथ-साथ, कोठी की नींव और दीवारों में ग्रेनाइट और स्लेट जैसे मजबूत पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। ग्रेनाइट (एक गरमागरम दानेदार चट्टान) किसी योद्धा की तरह कठोर और भरोसेमंद है, जबकि स्लेट की परतें कोठी को संतुलन और स्थायित्व देती हैं। इन पत्थरों की उपस्थिति इसे एक अडिग और सुरक्षित किले का रूप देती है जो न सिर्फ समय की मार झेल सका है, बल्कि कई पीढ़ियों का गवाह भी बना रहा।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। इन मजबूत तत्वों को आपस में जोड़ने के लिए जिस चीज़ का सहारा लिया गया, वह है मिट्टी और चूने का प्लास्टर। यह पारंपरिक प्लास्टर दीवारों को मौसम की मार— वर्षा, ठंड, भूकंप, और अचानक बदलते मौसम के थपेड़ों से बचाता है। साथ ही, यह कोठी को ‘साँस लेने’ की क्षमता देता है, एक ऐसा गुण जो आधुनिक सीमेंट से बनी दीवारों में नहीं होता।

देवदार, पत्थर, मिट्टी और चूना, इन सभी सामग्रियों का मेल चैहणी कोठी को एक साधारण इमारत से कहीं अधिक बनाता है। यह एक ऐसी जीवंत संरचना है, जो खामोशी में भी अपने अतीत की कहानियाँ, अपने समय की चेतावनियाँ और अपनी मिट्टी की भीनी खुशबू सुना देती है।

काठ-कूनी वास्तुकला: लकड़ी और पत्थर से बुनी एक समझदारी की दीवार

ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों के बीच हिमालय के लोगों ने बहुत पहले एक खास निर्माण तरीका अपनाया, काठ-कूनी वास्तुकला। यह कोई साधारण तकनीक नहीं, एक ऐसा लोक-ज्ञान है जो प्रकृति से मेल बिठाते हुए उसे समझने का तरीका दिखाता है।


चैहणी कोठी की बाहरी दीवार की बनावट और चैहणी कोठी की ऊंचाई से प्राकृतिक दृश्य। फोटो:  बालेश्वरी वशिष्ठ

इस शैली की सबसे खास बात यह है कि इसमें लकड़ी और पत्थर को परत-दर-परत जोड़ा जाता है, बिना किसी सीमेंट या लोहे के। न कोई मशीन, न भारी तकनीक,  बस मेहनती हाथ और पहाड़ की दी हुई सामग्री। लकड़ी और पत्थर इस तरह जुड़ते हैं कि जैसे एक-दूसरे में समा जाएं, और यही जुड़ाव एक इंटरलॉकिंग सिस्टम की ताकत बनता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा चमत्कार तब देखने को मिलता है, जब धरती काँपती है। भूकंप के झटकों को लकड़ी की परतें अपने भीतर सोख लेती हैं, और इमारत डगमगाने के बावजूद खड़ी रह जाती है। यही कारण है कि काठ-कूनी शैली में बनी इमारतें, चाहे कितनी भी पुरानी क्यों न हों, आज भी समय के थपेड़ों को झेल रही हैं।

लेकिन यह शैली केवल मज़बूती की बात नहीं करती। यह आराम और संवेदनशीलता की भी कहानी कहती है। लकड़ी और पत्थर का यह संयोग गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में ऊष्मा देता है। यानी मौसम चाहे जैसा हो, घर के भीतर एक संतुलित तापमान बना रहता है। यह कोई संयोग नहीं, प्रकृति को समझकर और उसके साथ तालमेल बिठाकर बनाए गए घरों की पहचान है। काठ-कूनी वास्तुकला हिमालय की मिट्टी में जन्मा एक जीवनदर्शन है।

पत्थरों से बनी बाहरी दीवार। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ
राजा का किला या सुरक्षा टावर? एक सवाल जो आज भी ज़िंदा है

चैहणी गाँव के दिल में खड़ी चैहणी कोठी को कोठी कहना शायद उसके कद के साथ अन्याय होगा। वह तो एक पहरेदार की तरह है, जो सदियों से पहाड़ों की निगरानी कर रहा है। यही कारण है कि इसे एक टावर-स्टाइल किला कहा जाता है, एक ऐसी इमारत जो महलों की तरह ज़मीन पर नहीं फैलती, बल्कि सीधे आसमान से बातें करती है।

आज जब आप इसकी ओर देखते हैं, तो यह पाँच मंज़िल ऊँचा नज़र आता है। लेकिन कभी यह सात मंज़िल का हुआ करता था। फिर 4 अप्रैल, 1905 का दिन आया जब कांगड़ा की धरती काँपी, और उसके साथ ही कोठी की दो मंज़िलें भी ज़मीन से जा मिलीं। भूकंप की तीव्रता थी 7.8 रिक्टर स्केल। इतनी ताक़तवर कि पत्थर भी हिल गए, पर इस कोठी की आत्मा नहीं टूटी। वो अब भी डटी रही, पाँच मंज़िलों में अपने इतिहास को सँभाले।

गांव के बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि यह किला राजा धाधु का था। लेकिन जब मैंने मंदिर के पुजारी से पूछा, तो उन्होंने कुछ और ही बताया। उनकी झुर्रियों भरी आंखों में कई कहानियाँ छिपी थीं। उन्होंने कहा, “यह कभी कोई राजमहल नहीं था। यह तो एक सुरक्षा टावर था, जहाँ सैनिक दुश्मनों पर नजर रखते थे। जब भी कोई हमला होता, गांववाले यहीं आकर पनाह लेते। राजा धाधु की कहानी शायद एक लोककथा मात्र है।”

मैंने उन ऊँची दीवारों की ओर देखा। उनका मौन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा रहा था। न तो वे राजा की कहानी की पुष्टि कर रहे थे, न पुजारी की बात को नकार रहे थे। हवा की सरसराहट में जैसे कोई पुरानी आवाज़ ठहर गई थी, सच क्या है, शायद सिर्फ़ ये दीवारें जानती हैं।

मुख्य प्रवेशद्वार। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ

कुछ बुज़ुर्ग बताते हैं कि कोठी की बनावट किसी आम रिहायशी इमारत जैसी नहीं थी, यह एक रणनीति थी, एक सुरक्षा तंत्र। तो कई लोग मानते हैं कि यह कोठी सुरक्षा के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक कामों के लिए भी बनाई गई थी।

माना जाता है की सबसे ऊपर की मंज़िलें उस दौर की निगरानी चौकियाँ थीं। वहाँ से चारों दिशाओं में नजर जाती थी, किसी भी खतरे को समय रहते भाँपने के लिए। और जब दुश्मन दिखे, तो तलवारें नीचे से ऊपर नहीं निकलती थीं, बल्कि पहले से तनी होती थीं। निचली मंज़िलों में छुपे थे गांव के खज़ाने, अनाज के भंडार, हथियारों के गोदाम, और शायद कुछ वो रहस्य भी जिन्हें सिर्फ दीवारें जानती हैं। ऊपरी मंज़िलें जीवन और आस्था का केंद्र थीं, जहाँ लोग रहते थे, पूजा करते थे, और इस पत्थर-लकड़ी के ढाँचे को एक घर बनाते थे। हर मंज़िल का एक चरित्र था, हर दीवार का एक उद्देश्य। चैहणी कोठी एक जीती-जागती रणनीति थी, एक समय की योजना, जो उस दौर के लोगों की बुद्धिमानी और विश्वास दोनों को दर्शाती है।

कुछ लोग कहते है की कोठी में गुप्त सुरंगें थीं, जिनका इस्तेमाल संकट के समय बाहर निकलने के लिए किया जाता था। इसका मुख्य द्वार छोटा और संकरा था, ताकि यदि कोई दुश्मन अंदर घुसे, तो उसे आसानी से रोका जा सके। इसकी दीवारें इतनी मजबूत थीं कि आज भी यह संरचना अडिग खड़ी है, जबकि आसपास की कई पुरानी इमारतें समय के साथ मिट गईं।

शायद इस स्थायित्व और संरक्षण की भावना ने ही पास स्थित श्रृंग ऋषि मंदिर को और गहराई दी। जब एक किला सुरक्षा का प्रतीक बना, तो वहीं मंदिर लोगों की आस्था का सहारा बन गया। एक ओर पत्थरों की दीवारें शरीर को बचा रही थीं, तो दूसरी ओर मंदिर की घंटियाँ आत्मा को संभाल रही थीं।

श्रृंग ऋषि: आस्था, कहानी या सच?

“तुमने कभी श्रृंग ऋषि का नाम सुना है?”

मैंने पीछे मुड़कर देखा। मंदिर के बाहर बैठे पुजारी मेरी ओर देख रहे थे। उनकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी गहराई थी।

मैंने सिर हिलाया, “बस थोड़ा-बहुत…”

वे हल्का-सा मुस्कुराए, जैसे उन्हें पहले से ही यह जवाब पता हो।

“यह जो कोठी तुम देख रही हो न,” उन्होंने कोठी की ओर इशारा किया, “यह सिर्फ पत्थर और लकड़ी नहीं है। इसमें तप है… और आशीर्वाद भी।”

श्रृंगा ऋषि जी महाराज । फोटो: श्रृंगा ऋषि अधिकारी

मैंने कोठी की ओर देखा। धूप उसकी ऊपरी मंज़िलों को छू रही थी, और नीचे उसकी परछाईं ज़मीन पर लंबी खिंच गई थी।

“कहते हैं,” पुजारी ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया, “श्रृंग ऋषि, जो ऋष्यश्रृंग के नाम से भी प्रसिद्ध थे, यहाँ आए थे—विभांडक ऋषि के पुत्र।  कहा जाता है कि महर्षि विभांडक के पुत्र श्रृंग ऋषि को संसार के प्रलोभनों से दूर, घने जंगलों में पाला गया था। लोककथाएँ बताती हैं कि जब ऋषि श्रृंग इस क्षेत्र में आए, तो उनकी आध्यात्मिक शक्ति इतनी प्रबल थी कि देवताओं ने इस स्थान को पवित्र बना दिया। कुल्लू और मणिकर्ण की धरती पर उनकी तपस्या का प्रभाव इतना गहरा था कि लोग आज भी उनके नाम से पूजा करते हैं।”

पास खड़ी एक बुज़ुर्ग महिला भी अब हमारी बातों में शामिल हो गईं।
 “कोई बड़ा काम हो, कोई फैसला लेना हो, लोग पहले यहाँ आते हैं,” उन्होंने कहा।

“मंदिर में?” मैंने पूछा।

“हाँ,” उन्होंने सिर हिलाया, “और पहले कोठी में भी आते थे। यह जगह सिर्फ रहने के लिए नहीं थी… यहाँ से सब कुछ चलता था—रक्षा भी, पूजा भी।”

श्रृंगा ऋषि मंदिर का प्रवेश द्वार। फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ

मैंने फिर से कोठी की ओर देखा। अचानक वह पहले से ज़्यादा गंभीर लगने लगी, जैसे वह सिर्फ खड़ी नहीं है, बल्कि देख रही है।

“चैहणी फागलणी, जो कि फरवरी और मार्च के महीने में मनाया जाता है, उसका समय यहां आना,” महिला ने कहा, “तब समझ आएगा इसकी असली रौनक।”

“क्या होता है तब?” मैंने उत्सुकता से पूछा।

“पूरे इलाके के लोग आते हैं,” उन्होंने बताया, “देवता को भोग चढ़ता है, ढोल-नगाड़े बजते हैं… और हर कोई अपनी मनोकामना लेकर आता है। श्रृंग ऋषि का मंदिर एक चमत्कारी स्थान माना जाता है। मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से यहाँ प्रार्थना करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है।”

तभी पास खड़ा एक युवक हँसते हुए बोला, “और कहते हैं, यहाँ माँगी गई हर मुराद पूरी होती है।”

मैं मुस्कुरा दी, “सच में?”

वह कंधे उचकाकर बोला, “सच क्या है, ये तो देवता जाने… पर लोग मानते हैं, और शायद वही सबसे ज़रूरी है।”

बात करते-करते मैं कोठी के मुख्य द्वार तक पहुँच गई। वह छोटा और संकरा था, इतना कि अंदर जाने के लिए झुकना पड़ता।

“ऐसे ही बनाया था इसे,” पीछे से आवाज़ आई।
 वही पुजारी थे।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“ताकि कोई भी सीधे अंदर न घुस सके,” उन्होंने कहा, “दुश्मन को धीमा करना जरूरी था… और अंदर आने के बाद उसे काबू करना आसान।”

मैंने उस संकरे दरवाज़े के भीतर झाँका, अंधेरा, ठंडा, और थोड़ा-सा रहस्यमय। कोठी की दीवारों में हल्की-हल्की दरारें थीं, जैसे समय ने अपने निशान छोड़ दिए हों।

कोठी की ओर देखते हुए लगा, यह सच में सिर्फ एक इमारत नहीं है। इसमें आस्था भी है, रणनीति भी, और समय की परतों में छुपी अनगिनत कहानियाँ भी।

हवा हल्के से चली। देवदार की खुशबू फिर से महसूस हुई।

मुझे लगता है की इस मंदिर की खासियत पूजा से ज़्यादा उस विश्वास में है, जो हर मुश्किल वक़्त में लोगों का सहारा बना। चैहणी कोठी जिस तरह हर कठिन दौर से निकलकर आज भी कायम है, वैसी ही मजबूती मुझे इस मंदिर की आस्था में दिखाई देती है।

यह स्थान लंबे समय से लोककथाओं, अनुभवों और इच्छाओं का घर रहा है। कुछ बातों को लोग कह नहीं पाते, लेकिन वे प्रार्थनाओं में शामिल होकर मंदिर की घंटियों के साथ बह जाती हैं। श्रृंग ऋषि की उपस्थिति को हवा, धूप और चुप्पियों में महसूस किया जा सकता है। 1905 के भयंकर भूकंप में जब

हिमाचल की कई इमारतें ढह गईं, चैहणी कोठी को सिर्फ हल्का नुकसान पहुँचा। स्थानीय लोग इसे श्रृंग ऋषि की कृपा मानते हैं।

स्थानीय देवता श्रृंगा ऋषि जी मंदिर, कोठी में प्रवेश करने के लिए लगी सीढियां । फोटो: बालेश्वरी वशिष्ठ
क्या हम सिर्फ़ सुन रहे हैं, या कुछ सँजो भी रहे हैं?

गाँववालों से सुना था कि यह किसी राजा का किला था। कुछ इसे सुरक्षा टावर कहते हैं, कुछ देवताओं का निवास। पर जब मैंने पहली बार इसकी ऊँचाई की ओर देखा, तो ऐसा लगा मानो यह खुद अपनी कहानी कहना चाहती हो।

एक बुज़ुर्ग स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “हमारे पूर्वजों ने इसे सिर्फ़ पत्थरों और लकड़ियों से नहीं, बल्कि अपनी आत्मा से बनाया था।” उनके चेहरे पर गर्व था, लेकिन आँखों में एक हल्की उदासी भी दिख रही थी।

चैहणी कोठी की दरारों में जैसे समय का बोझ दर्ज हो चुका है। वे धीमे स्वर में पूछती हैं, “हम बूढ़ी हो रही हैं, पर क्या कोई हमारी परवाह करता है?” मुझे याद आया कि गाँव के कई युवा अब शहरों में हैं। धरोहरें धीरे-धीरे जीवित स्मृति से निकलकर बस कहानियों में सिमटती जा रही हैं। और यही सोच मुझे भीतर तक छू गई,

क्या हम अपनी धरोहरों को सहेज भी रहे हैं, या सिर्फ़ उनकी कहानियाँ दोहरा रहे हैं?

Meet the storyteller

Baleshwari Vashisht
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Baleshwari Vashisht is a graduate student of arts, with a deep interest in the rich devta culture of Himachal Pradesh and its remarkable cultural heritage. Having grown up in the beautiful valleys of Himachal, she has always been inspired by its natural beauty and cultural diversity. She believes that the devta culture and traditions of Himachal are an integral part of our identity and history. Her aim is to bring these traditions and this invaluable heritage to younger generations, so they can understand its significance and contribute to its preservation. Baleshwari also enjoys drawing in her free time.

बालेश्वरी वशिष्ट, कला स्नातक की छात्रा हैं, जिसे हिमाचल प्रदेश की समृद्ध देव संस्कृति और इसकी अद्भुत सांस्कृतिक विरासत में गहरी रुचि है। हिमाचल की हसीन वादियों में पली-बढ़ी वाल्शेवरी ने यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता से हमेशा प्रेरणा पाई है। वह मानती हैं कि हिमाचल की देव संस्कृति और इसके रीति-रिवाज हमारी पहचान और इतिहास का अभिन्न हिस्सा हैं। उसका लक्ष्य है कि इन परंपराओं और इस अनमोल विरासत को नई पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए, ताकि वे इसकी महत्ता को समझें और इसके संरक्षण में योगदान दें। बालेश्वरी को ड्राइंग करना भी बहुत पसंद है।

Voices of Rural India

Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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