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चंद्रकांता की अनकही दास्तान

जब कहानीकार पहली बार चंद्रकांता नाम की एक महिला पर आधारित एक लोकगीत सुनती है, तो उसे लगता है कि यह पहाड़ों की एक और भूली-बिसरी कहानी है। लेकिन जैसे ही वह सवाल पूछना शुरू करती है, उसे पता चलता है कि हर कोई केवल आधा सच ही जानता है और बाकी आधे से बचता है। बिखरी यादों, झिझकते जवाबों और अचानक छाई खामोशियों के बीच, धुन के पीछे एक ज़्यादा जटिल जीवन उभरने लगता है। समाज ने क्या गाना चुना और क्या छिपाना चुना, ये दो अलग-अलग कहानियाँ बन जाती हैं। और चंद्रकांता के जीवन के गुम हुए टुकड़ों को उजागर करते हुए, कहानीकार एक गहरे सवाल का सामना करने को मजबूर होती है: कुछ महिलाओं के सच खामोशी में क्यों खो जाते हैं?

कहानीकार : तमन्ना नेगी
गाँव कामरू, ज़िला किन्नौर
हिमाचल प्रदेश

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मैट्रिक पास लन लन, नामांग बान्थिन चंद्रकांता…”

चंद्रकांता नाम की एक सुंदर लड़की ने मैट्रिक पास कर लिया है।

मैं ड्राइवर की सीट के पीछे अपनी बहनों के साथ बैठी थी जब मेरी बड़ी बहन ने यह गीत कार में चलाया। हम सांगला घाटी की घुमावदार सड़कों से गुजर रहे थे। दोनों ओर पहाड़ें उठती हुईं और नीचे बास्पा नदी चमक रही थी। हम बात कर रहे थे कि अगला गीत कौन सा लगाया जाए, तभी यह पंक्ति सुनते ही मेरा ध्यान उधर चला गया। उसने मैट्रिक पास कर लिया। चंद्रकांता।

Chandrakanta, Kinnaur
चंद्रकांता की एक तस्वीर। फोटो: तमन्ना नेगी

जितने भी गीत मैंने किन्नौरी महिलाओं के बारे में सुने थे, उनमें ज़्यादातर त्याग, विवाह और परंपराओं की बातें होती थीं, जैसे ठाकुर मोणी और युमदासी की कहानियाँ। पर यह गीत एक स्त्री की शिक्षा का उत्सव मना रहा था। यह अलग था। और यही बात मेरे मन में बस गई।

जब मैंने अपनी बहन से इसके बारे में पूछा, तो उसने कहा, “यह बस एक साल पहले ही रिलीज़ हुआ है। इसमें दो कहानियाँ हैं। एक राम रतन नाम के पुरुष शिक्षक की और दूसरी चंद्रकांता की, जिसने मैट्रिक की परीक्षा पास की।”

मैं तुरंत उत्सुक हो गई। उस समय, जब बहुत कम महिलाएँ स्कूल जाती थीं, उसने यह कैसे कर दिखाया होगा? पर मेरी बहन को गीत के अलावा कुछ नहीं पता था। गीत उसकी सफलता का जश्न मनाता है, पर शायद कहानी में और भी कुछ था। गीत से मुझे इतना पता चला कि चंद्रकांता सांगला की थी और मैं कामरू से हूँ। शायद इसलिए उसका नाम हमारे घर तक कभी नहीं पहुँचा। ऐसा लगता था कि केवल सांगला के लोग ही उसे याद रखते हैं। यादों के रूप में नहीं, बल्कि एक गीत के रूप में।

Sangla village
सांगला गांव। फोटो: तमन्ना नेगी

सांगला और कामरू एक दूसरे के पड़ोस में हैं, बस कुछ किलोमीटर की दूरी पर, फिर भी कई बार उनकी दुनिया सदियों दूर लगती है। कामरू, जहाँ मैं रहती हूँ, अब भी अपने प्राचीन किले की प्रतिध्वनि समेटे हुए है। लकड़ी की नक्काशियों वाले देवस्थल और बद्रीनारायण मंदिर घाटी की रक्षा करते हुए खड़े हैं।

कामरू गांव। फोटो: तमन्ना नेगी

पुराने स्लेट की छत वाले घर ढलानों से चिपके हुए और संकरे रास्ते सेब के बागानों के बीच से गुजरते हैं, जो शरद ऋतु में लाल हो उठते हैं।

कामरू किला। फोटो: तमन्ना नेगी

Bपर चंद्रकांता के समय, यानी 1950 के दशक में, यहाँ का जीवन बहुत शांत और सीमित था। सांगला घाटी तब तक पक्की सड़क से नहीं जुड़ी थी। सांगला घाटी, चारों ओर बर्फ़ से ढकी पर्वतमालाओं और कल–कल बहती बस्पा नदी से घिरी हुई, तब तक ठीक तरह से सड़कों से नहीं जुड़ी थी।

Baspa river.
बसपा नदी। फोटो: तमन्ना नेगी

सरकारी स्कूल भी बहुत कम थे और वे भी बड़े गाँवों में। लड़कियों की शिक्षा दुर्लभ थी। प्राथमिक स्तर से आगे पढ़ना लगभग असंभव सा माना जाता था। अधिकांश परिवार मानते थे कि बेटियों को किताबों की नहीं, घर के कामों की शिक्षा लेनी चाहिए।

मेरी दादी अक्सर कहती थीं, “ज़्यादा पढ़ लिख लें तो घर की ज़िम्मेदारियाँ भूल जाती हैं।” यह दुर्भावना नहीं थी। बस उसी तरह व्यवस्था चली आ रही थी।

जो महिलाएँ पढ़ती थीं, उनका सम्मान गीतों में होता था, वास्तविकता में नहीं। इसलिए जब चंद्रकांता ने मैट्रिक पास किया होगा, वह केवल उसकी सफलता नहीं रही होगी, बल्कि समाज की उम्मीदों के खिलाफ एक छोटी सी बगावत रही होगी। लेकिन इतनी नज़दीक होने के बावजूद, हमारे घर में उसकी कहानी किसी ने नहीं सुनी थी। केवल वे लोग जानते थे जो सांगला से विवाह करके कामरू आए थे।

मैंने माँ, पिता और दादी से पूछा, पर किसी को कुछ नहीं पता था। कामरू में तो लोग ज़्यादातर ठाकुर मोणी की कहानी ही सुनाते हैं। चंद्रकांता का नाम गीत में था, लोगों की बातचीत में नहीं। फिर भी सवाल मेरे भीतर बने रहे।

जो थोड़ा बहुत सुना, उससे लगा कि वह सांगला के सरकारी स्कूल में पढ़ती होगी। शायद हर सुबह लंबी पगडंडी से होकर स्कूल जाती होगी। किताबें कपड़े में लपेटकर ले जाती होगी, जबकि उसकी उम्र की बाकी लड़कियाँ अपनी माँओं के साथ खेतों में मदद करती होंगी।

मैट्रिक पास करने के बाद वह अध्यापिका बनी। उस समय यह सम्मानजनक भी था और दुर्लभ भी। पर यह उसके लिए कैसा रहा होगा? बच्चों की कक्षा के सामने खड़े होकर पढ़ाते हुए, यह जानते हुए कि वह उस सीमा को पार कर चुकी है जहाँ तक महिलाओं को जाने की इजाज़त शायद ही दी जाती थी।

लेकिन मेरे पड़ोस की चाची, जो सांगला से विवाह कर कामरू आई थीं, इस कहानी को जानती थीं। उनके दो बेटे थे। पति की मौत एक कार दुर्घटना में होने के बाद वह विधवा हो गईं। तब उनकी उम्र चालीस साल थी।

एक दोपहर, वह माँ के साथ महिला मंडल की बैठक में जाने आईं। वह माँ के तैयार होने का इंतजार करते हुए दादी के साथ बैठकर कामरू के होने वाले विवाहों की चर्चा कर रही थीं। मुझे मौका मिला और मैंने चंद्रकांता के बारे में पूछ लिया।

Kamru temple
कामरू मंदिर (महिला मंडल की बैठक के लिए एकत्रित महिलाएं)। फोटो: तमन्ना नेगी

वह कुछ क्षण रुकीं और बोलीं, “वह तहसीलदार की बेटी थी और मैट्रिक पास कर लिया था। लेकिन बाद में उसने एक बाहरी आदमी से शादी कर ली। एक सरदार से।”

मेरे मन में तुरंत सवाल उठा, “पर यह गीत में क्यों नहीं है?”

उन्होंने सहजता से कहा, “गीत में ऐसी बातें कौन डालता है? यह कोई अच्छी बात थोड़े ही थी कि वह भागकर एक सरदार से शादी कर ले।”

मैंने और पूछना चाहा, पर वह आगे बात नहीं करना चाहती थीं। दादी, जो चुपचाप सुन रही थीं, अचानक पूछ बैठीं,चंद्रकांता हने शादी लन लन ?” (चंद्रकांता ने ऐसे शादी की?) मुझे आश्चर्य नहीं हुआ। उनके मायके और ससुराल दोनों कामरू में थे। उस समय बाहरी से विवाह करना अच्छा नहीं माना जाता था।

थोड़ी देर बाद माँ और चाची बैठक के लिए निकल गईं। मैं वहीं बैठी रह गई, मन में और भी सवाल लिए।

उन्होंने उस वक्त कैसे मैट्रिक पास की, जब बहुत कम औरते पढ़ा करती थी?

वह इतनी हिम्मत कहाँ से लाई?

उसकी कहानी क्यों दबाई गई?

और गीत उसका पूरा सच क्यों नहीं बताता?

मुझे और जानने का मौका तब मिला जब मैं अपनी नानी के घर, बतसेरी गई। बतसेरी , सांगला घाटी का एक और गाँव, बास्पा नदी के बाएँ किनारे पर है। देवदार और चीड़ के जंगल, सेब और खूबानी के बागानों और पारंपरिक लकड़ी के घरों के बीच बसा हुआ। सांगला से बस सात किलोमीटर की दूरी पर।

Batseri village
बतसेरी गांव. फोटो: तमन्ना नेगी

एक शाम, मैं मामी जी के साथ रोटियाँ बेलने में लगी थी। बातचीत के दौरान याद आया कि वह भी सांगला से ब्याही थीं। शायद उन्हें कुछ और जानकारी हो।

“नानी जी,” मैंने पूछा, “आपने बंथिन चंद्रकांता गीत सुना है?”

उन्होंने सिर हिलाया। “हाँ, सुना है।”

“उसकी कहानी क्या थी?” मैंने पूछा, किसी सुराग की उम्मीद में।

उन्होंने बिना ऊपर देखे कहा, “उसके पिता तहसीलदार थे। हमारे ही ऊपरी जाति के प्रतिष्ठित परिवार से थी। इसी वजह से उसे पढ़ने का मौका मिला। उसने पढ़ाई की, मैट्रिक पास किया और शिक्षिका बनी।”

मैंने उत्साहित होकर पूछा, “तो क्या वह लंबे समय तक पढ़ाती रहीं? किस स्कूल में थीं? अभी कहाँ हैं?”

उन्होंने रुककर मेरी ओर देखा और धीमे से कहा, “उसने आत्महत्या कर ली। समाज ने उसके विवाह को स्वीकार नहीं किया। उसके अपने माता पिता ने भी नहीं।”

मेरे पास कोई शब्द नहीं थे। “उसने सरदार से शादी की थी ना? बाहरी आदमी। पर यह कैसे हुआ कि वह आत्महत्या कर बैठी?”

उन्होंने कहा, “उसके पति का परिवार गरीब था और उन्होंने उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। उसके दो बच्चे थे, फिर भी उसने अपनी जान सतलुज में दे दी। कम से कम उसे बच्चों के बारे में तो सोचना चाहिए था।”

मैंने वही सवाल दोहराया, “तो गीत में यह सब क्यों नहीं है?”

रसोई से बाहर जाते हुए उन्होंने बस इतना कहा, “ऐसी शर्मनाक बातें कौन गीतों में डालता है?” और इतना ही उन्होंने कहा। पर वह चुप्पी बहुत कुछ कह गई।

रामपुर बुशहर, सतलुज किनारे बसा छोटा सा ऐतिहासिक नगर। शिमला से लगभग 130 किलोमीटर और सांगला से 93 किलोमीटर दूर।

Rampur Bushahr on the banks of the River Satluj
रामपुर बुशहर, सतलुज नदी के तट पर। फोटो: तमन्ना नेगी

कभी बुशहर रियासत की शीतकालीन राजधानी रहा रामपुर व्यापारियों के लिए मध्य एशिया और भारत के बीच का द्वार था। आज भी लवी मेले के दौरान वही पुराना रौनक दिख जाती है जहां पर पहाड़ों से लोग कहानियां, परंपरा, सामान बदलने आते है।

मेरे मन में और भी सवाल उठे।

उसने आत्महत्या क्यों की?

वह कहाँ पढ़ाती थी?

गीत सच से इतना अलग क्यों है?

गीत उसकी सफलता गाता है। पर उसकी चुप्पियाँ उसकी पीड़ा छुपाती हैं।

समाज को उसकी पढ़ाई से परेशानी नहीं थी। परेशानी थी उसकी पसंद से, उसके विवाह से।

मैंने इसे अपने घर में भी देखा है। महिलाओं को पढ़ने दिया जाता है, पर एक सीमा तक। फिर शादी का समय आते ही पढ़ाई रुक जाती है। सपने छोटे हो जाते हैं।

मेरी माँ की ज़िंदगी इसका उदाहरण है। मेरी माँ कॉलेज के पहले वर्ष में थीं। वॉलीबॉल टीम में खेलती थीं। तभी उन्हें बताया गया कि उनका विवाह तय हो चुका है। वह मना नहीं कर सकती थीं। उनकी उम्र 23 थी। मुझे याद है मेरी माँ ने मुझे उस दिन के बारे में बताया था जब वह कॉलेज की छुट्टियों में सोलन से बतसेरी अपने घर आई थीं। वह अपने पहले साल में थीं और आगे क्या होगा, इसकी योजनाएँ बना रही थीं, तभी उनके माता-पिता ने अचानक उन्हें बताया कि उनकी शादी होने वाली है।

मेरे पिता उस समय एक शिक्षक थे, एक सम्मानित पद, जिसे बहुत कम परिवार ठुकरा सकते थे। कोई बहस नहीं, कोई सवाल नहीं, बस एक शांत स्वीकृति कि चीज़ें ऐसी ही थीं। “मुझे मना करने का कोई अधिकार नहीं था,” उन्होंने एक बार धीरे से कहा था। तो वह चुपचाप मान गईं।

उनकी छोटी बहन ने बाद में पढ़ाई जारी रखी और शिक्षिका बनी। अंतर सिर्फ समय का था। समाज धीरे बदलता है और यह तय करता है कि किसे कहाँ तक जाने दिया जाए।

मेरी माँ अक्सर कहती हैं, “बात इस बात की नहीं कि स्त्री क्या कर सकती है, बात इस बात की है कि समाज उसे कब करने देता है।”

चंद्रकांता की यात्रा इसलिए असाधारण थी कि उसने न केवल पढ़ाई की, बल्कि प्रेम भी चुना। वह उस अदृश्य रेखा को पार कर गई जहाँ तक महिलाओं को जाने की मनाही थी।

मैंने एक बार फिर अपने सवालों के जवाब ढूँढ़ने की कोशिश की और एक दिन अपनी मामी को फ़ोन किया। मैंने उनसे बहुत कुछ पूछा, लेकिन उन्होंने बस कुछ ही सवालों के जवाब दिए।

पूछा, “सरदार और चंद्रकांता कैसे मिले?”

लंबी चुप्पी के बाद उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता।”

बाद में माँ से पता चला कि मामी जी की माँ भी सांगला की ही थीं और शादी भी सांगला में ही हुई थी। मैंने फिर पूछा, “तो आपी (नानी) को पता होगा?”

उन्होंने कहा, “नहीं। उन्हें राम रतन की कहानी पता है। तुम्हें वही पूछना चाहिए। वह अधिक प्रेरणादायक है। वह भी उसी समय पढ़कर शिक्षक बने थे। रारंग के थे। बहुतों को प्रेरित किया।”

Rarang Village.
रारंग गांव। फोटो: तमन्ना नेगी

उनका ढंग ऐसा था जैसे मेरी जिज्ञासा से एक दीवार खड़ी हो गई हो। यह सिर्फ उदासीनता नहीं थी, बल्कि डर था। डर कि अगर यह कहानी फिर से बोली गई तो लोग क्या कहेंगे।

किन्नौर में बाहरी लोगों को हमेशा संदेह की दृष्टि से देखा गया है। लोग डरते हैं कि नए लोग यहाँ की संस्कृति बिगाड़ देंगे और पर्यावरणीय बदलाव लायेंगे। बुज़ुर्ग अक्सर कहते हैं कि बाहरी लोग पहाड़ों की लय, देवी-देवताओं के प्रति सम्मान, त्योहारों से जुड़े रीति-रिवाज़ों या हमारे छोटे-छोटे समुदायों को एकजुट रखने वाले संतुलन को नहीं समझते। उन्हें चिंता है कि बाहरी लोगों के साथ जीने के नए तरीके, त्योहारों पर तेज़ संगीत, लकड़ी और पत्थर की जगह कंक्रीट के घर, और पारंपरिक पहनावे और बोली का लुप्त होना भी आता है।

पर्यावरण की चिंता भी उतनी ही गहरी है। प्लास्टिक कचरा, अनियंत्रित पर्यटन, अव्यवस्थित निर्माण पहाड़ों को नुकसान पहुँचा रहे हैं। लोग मानते हैं कि बाहरी लोगों का बसना प्रकृति और संस्कृति दोनों को धीरे धीरे मिटा देता है। और शायद इसी डर ने चंद्रकांता की कहानी को चुप करा दिया।

जब मैंने उसकी कहानी को समझने की कोशिश की, तो एक और बात महसूस हुई।  उसकी कहानी घरों में नहीं घूमती, केवल गीत में ही जीवित है।  वह गीत सुनने से पहले तो मुझे यह भी नहीं पता था कि वह कभी अस्तित्व में थी।

इस बात ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। “बान्थिन चंद्रकांता” आज स्थानीय मेलों में गाया जाता है, कभी कभी शादियों और त्योहारों में भी बजता है। उसकी धुन हल्की है, लगभग उत्सव जैसी।

     A group of women gathered to prepare dry fruit garlands for the wedding ceremony
शादी समारोह के लिए मेवों की माला तैयार करने के लिए इकट्ठा हुई महिलाओं का एक समूह। फोटो: तमन्ना नेगी

कोई नहीं जानता कि इसे किसने लिखा। किसी के अनुसार किसी बुजुर्ग लोकगायक ने, तो किसी के अनुसार यह एक कविता थी जिसे बाद में धुन दी गई।

हमारे जैसे पहाड़ी समाजों में कहानियाँ अक्सर किताबों में नहीं, गीतों में जीवित रहती हैं। एक गीत सच से तेज़ चलता है। वह वही लेकर चलता है जिसे लोग याद रखना चाहते हैं, गर्व और गौरव की बातें, और धीरे से पीछे छोड़ देता है वह सब जिसे लोग भुला देना चाहते हैं। यही कारण है कि छात्रा के रूप में चंद्रकांता का साहस गीत का केंद्र बन गया, जबकि एक स्त्री के रूप में उसका दर्द दफन रह गया।

शायद लोगों को डर था कि उसकी पूरी कहानी बताने से उनकी आस्थाओं में खलल पड़ेगा। शायद वे चाहते थे कि वह सफलता का प्रतीक बनी रहे, न कि उस बात की याद दिलाती रहे जो समाज ने उसे कभी नकार दी थी।

क्या उसकी कहानी दुर्लभ थी?

या उसका दस्तावेज़ीकरण दुर्लभ था?

कई महिलाये चुपचाप प्रतिरोध करती हैं। मेरे गाँव में एक बुजुर्ग महिला हैं जो कभी शादी नहीं कर पाईं।

दादी कहती हैं कि वह “सही उम्र” में शादी नहीं कर सकीं और अब वो अकेले रहती है। उन्हें ज़्यादा बात करना पसंद नहीं है पर एक दिन अक्टूबर में जब मैं और माँ मेरे लिए सेब पैक कर रहे थे, तो उन्होंने बताया –

“वह अकेली महसूस करती हैं। उनके भाई या पड़ोसी कभी कभी जाते है उनसे मिलने। जब कोई मिलने आता है तो रो पड़ती हैं। उनके पास गाय है, उनके भाई ज़रूरत का सामान पहुंचा देते हैं। पर उनकी भी तो अपनी जिंदगी और शादियां है।”

“वह शादी क्यों नहीं कर पाईं?” मैंने पूछा। माँ ने कहा, “वह सबसे बड़ी बहन थी। सबसे पहले बड़ी बहन होने की ज़िम्मेदारियाँ आईं। उसने अपने भाइयों की शादी करवाई, उन्हें बसाया। उनके माता पिता जल्दी ही गुजर गए थे। और जब उसकी अपनी शादी की सही उम्र थी, वह निकल चुकी थी।”

उसकी स्वतंत्रता समाज की नज़र में आज भी अकेलेपन की तरह दिखती है।

एक युवा स्त्री होने के नाते, चंद्रकांता की कहानी मुझे गहराई से सोचने पर मजबूर करती है। हमारे चुनाव अभी भी नियंत्रित क्यों किए जाते हैं? हम किससे प्रेम करें, कब विवाह करें, काम करें या न करें, यह सब दूसरों के बनाए नियमों में क्यों बंधा होना चाहिए?

उसकी मृत्यु को याद करना ज़रूरी है, पर उसे उसकी पहचान नहीं बनने देना चाहिए। उसकी हिम्मत अधिक महत्त्वपूर्ण है।

उसने पढ़ाई की, जब लड़कियाँ नहीं पढ़ती थीं। वह शिक्षक बनी, जब महिलाओं की क्षमताओं पर शक किया जाता था। उसने प्रेम किया, यह जानते हुए कि यह उसे मुश्किलों में डाल सकता है।

ये सब हिम्मत के काम थे।

आज जब मैं “बान्थिन चंद्रकांता” सुनती हूँ, तो मेरे भीतर उसकी एक बिल्कुल अलग तस्वीर उभरती है। गीत सिर्फ उसकी सफलता को याद रखता है, जबकि वे संघर्ष जिनसे उसकी कहानी बनी, कहीं नहीं सुनाई देते। यह चुनिंदा याददाश्त, जिसमें उपलब्धि का जश्न तो है पर पीड़ा को मिटा दिया गया है, अपने आप में एक और तरह का अन्याय है।

और फिर भी, जब मैं अपने आसपास देखती हूँ, तो महसूस होता है कि उसका साहस आज भी कहीं न कहीं ज़िंदा है। मेरी अपनी माँ को, उदाहरण के लिए, यह तय करने का अधिकार कभी नहीं मिला कि वह कब शादी करेंगी। फिर भी वह आज भी गर्व से बताती हैं कि वह कभी अपने कॉलेज की वॉलीबॉल टीम में खेला करती थीं। वह उस समय बातसेरी की एक युवा लड़की के लिए छोटा सा कदम नहीं था, बल्कि एक साहसी शुरुआत थी। उनकी छोटी बहन बाद में शिक्षिका बनी और वह सपना पूरा किया जिसे मेरी माँ को अधूरा छोड़ना पड़ा।

किन्नौर की महिलाएँ अब सीमाओं को थोड़ा थोड़ा बदल रही हैं।कुछ व्यवसाय चलाती हैं। कुछ शिक्षक हैं। कुछ ऊँची शिक्षा के लिए शहर जाती हैं। फुसफुसाहटें अब भी हैं, पर अब जवाब भी हैं। बातचीत बदल रही है, स्कूलों में, परिवारों में, यहां तक ​​कि गांव के मंदिरों में भी जहां पहले महिलाओं की आवाज अनसुनी कर दी जाती थी।

चंद्रकांता की कहानी सिखाती है कि हिम्मत हमेशा शोर नहीं करती। कभी यह बस इतना होता है कि कोई थोड़ा और पढ़ ले। थोड़ा आगे बढ़ जाए। या वहाँ बोले जहाँ चुप रहना आसान होता है।

आज जब हम उसकी पूरी कहानी सुनते हैं, हम केवल एक स्त्री को याद नहीं करते।

हम उसकी ताकत को,

उसके सपनों को

और उसकी आवाज़ को उसकी पूरी गरिमा के साथ वापस लाते हैं।

और शायद इसी तरह, हम उन अनगिनत चंद्रकांताओं के लिए जगह बनाते हैं जो अभी भी सुने जाने का इंतजार कर रही हैं।

Meet the storyteller

Tamanna Negi
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Tamanna Negi is a curious writer and cultural storyteller from Kamru, a Himalayan village in Kinnaur, Himachal Pradesh. A student of Arts, she finds her roots in the quiet rhythm of mountain life and the unspoken strength of its women. Deeply moved by temple festivals and the traditions surrounding them, she believes in writing to preserve culture and express imagination. Though not active in projects yet, she dreams of building something meaningful through words, something that helps others reflect, remember, and reconnect. For Tamanna, the mountains are more than home; they are her language, her lens, and her legacy in the making.

तमन्ना नेगी हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के हिमालयी गांव कामरू से आने वाली एक जिज्ञासु लेखिका और कहानीकार हैं। कला की छात्रा तमन्ना को पहाड़ों के शांत जीवन और वहाँ की महिलाओं की अनकही ताकत में अपनी जड़ें दिखाई देती हैं। मंदिरों के त्योहारों और उनसे जुड़ी परंपराओं से वे गहराई से प्रभावित हैं। तमन्ना का लेखन ईमानदारी और रचनात्मकता से प्रेरित है, ये दोनों मूल्य उनके लिए बहुत मायने रखते हैं। हालांकि वे अभी किसी परियोजना में सक्रिय रूप से शामिल नहीं हैं, लेकिन उनका सपना है कि वे शब्दों के ज़रिए कुछ ऐसा रचें जो लोगों को सोचने, याद करने और अपनी जड़ों से फिर जुड़ने में मदद करे। तमन्ना के लिए पहाड़ सिर्फ उनका घर नहीं, बल्कि उनकी भाषा, नज़रिया और एक विरासत हैं, जिसे वे आकार दे रही हैं।

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Voices of Rural India is a not-for-profit digital initiative that took birth during the pandemic lockdown of 2020 to host curated stories by rural storytellers, in their own voices. With nearly 80 stories from 11 states of India, this platform facilitates storytellers to leverage digital technology and relate their stories through the written word, photo and video stories.

ग्रामीण भारत की आवाज़ें एक नॉट-फ़ॉर-प्रॉफ़िट डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म है जो 2020 के महामारी लॉकडाउन के दौरान शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीण कहानीकारों द्वारा उनकी अपनी आवाज़ में कहानियों को प्रस्तुत करना है। भारत के 11 राज्यों की लगभग 80  कहानियों के साथ, यह मंच कहानीकारों को डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर और लिखित शब्द, फ़ोटो और वीडियो कहानियों के माध्यम से अपनी कहानियाँ बताने में सक्रीय रूप से सहयोग देता है।

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