खाल से किताब तक – समाल गांव की कहानी
तीन दलित पीढ़ियों के सत्य पर आधारित
हिमाचल प्रदेश की पश्चिमी सीमा पर बसा समाल गांव आज भी तीन हिस्सों में बंटा है और इस बंटवारे की जड़ें जाति में हैं। “खाल से किताब तक” एक ऐसे तीसरे हिस्से के जन्म की कहानी है जो खाल से किताब तक का सफ़र करता है। तीन पीढ़ियों में फैली एक यात्रा, जहाँ पिछली पीढ़ी के चमड़ा उतारने वाले हाथ आज की पीढ़ी में उन्हीं हाथों से कलम पकड़ते हैं। देवभूमि कहे जाने वाले प्रदेश में, यह कहानी उन आवाज़ों की है जिन्हें हमेशा दबाया गया, लेकिन जिन्होंने मिट्टी, खाल और स्याही तीनों से इतिहास लिखा। बीते समय के गिद्धों, आज के गुस्से, और आने वाले बदलाव के बीच, समाल गांव हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कितना मुश्किल है एक दबे हुए तबके के लिए आगे बढ़ना और फिर भी कितना ज़रूरी है आगे बढ़ते रहना।

कहानीकर्ता : हनीष कतनावर
गाँव समाल, ज़िला कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश
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आज के दिन में भी कल से कुछ ज़्यादा बदलाव नहीं था। आज लगातार तीसरा दिन हो गया था मूसलाधार बारिश गिरते हुए। बाहर सब हरा-भरा था, चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ और बारिश की गिरती हुई बूँदें आँखें खुलने ही नहीं दे रही थी।

“चलो उठो! 9 बज गए हैं। मुझे भूख लगी है।” दरवाज़ा खुलने के साथ-साथ अनीता की आवाज़ आयी। “नहीं! पहले मुझे गले लगाकर मेरे साथ लेटो।” मैंने कहा और दूसरी तरफ मुंह करके घूम गया। अनीता ने कमर के ऊपर से हाथ निकाल कर अच्छे से मुझे सुबह वाला आलिंगन किया। मैं उसकी तरफ मुड़ा, अपनी दायीं बाजु को उसके सर के नीचे रखा और उसके माथे को चूमके “आई लव यू” बोला। उसके शरीर की गर्मी से मुझे मेरी छाती में हलकी सी गर्मी महसूस हुई और मैं एक मीठी सी सपनों की दुनिया में खोने लगा।

अनीता बाहर किसी से बात कर रही थी। 9:50 हो चुके थे।
“वो अभी सो रहे हैं। जैसे ही उठेंगे, मैं उन्हें फ़ोन करने को कह दूंगी।” अनीता की धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज़ मुझे सुनाई दी। मैंने खिड़की खोल के पास के टेबल पर रखा लैपटॉप उठाया और कल की कहानी का लिखा हुआ अंत फिर से पढ़ा। फिर फर्स्ट पेज पे जाके बुक का शीर्षक पढ़ा-
खाल से किताब तक
लैपटॉप बाजु में रख के मैं उठा और हल्का होके ब्रश करने लगा। “बारिश तो रुकने का नाम नहीं ले रही” मैंने दांत घिसते-घिसते कहा।
“हाँ। मोहित आया था और कह रहा था की म्युनिसिपेलिटी वालों को कम्प्लेन करनी थी। अभी आधा घंटा पहले एक एक्सीडेंट हुआ था जिसमे एक गाडी सड़क पे एक गाय से टकरा गयी। म्युनिसिपल्टी वालों को बोलो की उसको उठाके लेके जाएँ।”
मैंने दांत घिसते-घिसते आईने में देखा और अनीता को पुछा “ये तो होना ही है। अच्छा फंगन बाबा घर पे ही होंगे न?”
“कौन?” अनीता ने किचन से ही जवाब दिया।
“मैं आता हूँ।” कहके मैं पड़ोस में फंगन बाबा के घर गया।
बारिश थोड़ी कम हो गयी थी। “फंगन बाबा!” मैंने उनके घर के बाहर जाके आवाज़ लगायी। वो अपने स्लेट वाले कच्ची ईंटों के घर के बरामदे में बैठकर हुक्का पी रहे थे। सफ़ेद दाढ़ी, उलझे बाल, नंगे पाँव, और अपने घुटने मोड़ के बैठे थे।
“अरे आओ आओ बेटा! कैसे आना हुआ?”
“बाबा! मुझे पूछना था की आप अभी भी चमड़ा निकाल सकते हो ना?”
“अब तो कहाँ बेटा!”
“लेकिन तुम तो काफी साफ़ चमड़ा निकालते थे।”
गुड़ गुड़ गुड़ गुड़। हुक्के का इंजन चालु है वह इसी आवाज़ से पता चलता था।
“हाँ। वो तो अब भी निकाल सकता हूँ।”
“मेरे लिए निकालोगे? रोड पे 1 घंटा पहले ही एक एक्सीडेंट हुआ है और गाय मर गयी है।”
“अच्छा! उसे तो ले जाएंगे म्युनिसिपेलिटी वाले।”
“हाँ। लेकिन मुझे चाहिए की हम उसे लेके आएं और आप मेरे लिए साफ़ चमड़े का कागज़ निकालें।”
“पता है बेटा! 20 साल पहले तक गिद्ध मुझे पुछा करते थे की अगली बार हम कब आएं।”
गुड़ गुड़ गुड़ गुड़
“अब वो नहीं आते तो मेरा भी मैं नहीं करता।”
“बस एक आखिरी बार ये काम कर दो मेरे लिए, मैं तुम्हे एक नया हुक्का लाके दूंगा।”
फंगन बाबा हसने लगे, “चलो तुम्हारे लिए निकाल देता हूँ मैं।”
“कहाँ रखवाऊं गाय को?”
“वहीँ जहाँ कभी तुम्हारे दादा निकालते थे।”
गुड़ गुड़ गुड़ गुड़
“जगह याद है या भूल गए?” देसी तम्बाकू के जलने से निकले धुएं के पानी में से फ़िल्टर होने के बाद जब वो फेफड़ों में भर जाता है, तो एक भारी गहरी आवाज़ निकलती है।
“ठीक है बाबा। आप पहुँच जाना वहां आधे घंटे में। मैं इंतज़ाम करता हूँ।”
मैंने जेब से फ़ोन निकाला और कुछ तो बोल मेरे मुंह से निकले लेकिन वो हुक्के की गुड़गुड़ में अच्छे से सुनाई नहीं दिए। और फंगन बाबा की आँखों में मेरी जाती हुई छवि दिखी। उन्होंने एक लम्बी सांस खींची और समय रुक सा गया जैसे वो धुआं वहां रुक गया हो। फिर एक धुएं का गुब्बार हल्का-हल्का उनके मुंह और नथुनों से बहार निकला और उस धुएं में मेरी जाती हुई छवि गुम हो गयी।
“देखना! देखना लगे नहीं।” मैं हाथ आगे बढ़ाते हुए गाय की लाश को उतारने में बाकी के तीन लड़कों की मदद
कर रहा था।
फंगन बाबा गांव की तरफ से आते हुए दिखे। गाय का मृत शरीर मेरी दाईं तरफ रखा था, अच्छे से ज़मीन साफ़ करके। मैंने फंगन बाबा की तरफ नज़र घुमाई। नीचे चमड़े की चप्पल, उसके ऊपर पायजामा, घुटने तक आता कुरता। लेकिन चेहरा जैसे ही मैंने देखा वह मुझे फंगन बाबा का नहीं बल्कि मेरे दादा घुरको का लगा। कंधे पर रस्सी से बंधा डंडा जिस से टंगा, हथौड़ा और सरौता जैसे औज़ार लटके हैं और पीठ पर एक पुरानी खाल का झोला जिसमें छुरा, उस्तरा, खुरपी, सुई, रस्सी, छोटी पटरी, चुना–फिटकरी की पुड़िया वगेरा रखे हैं। एक छोटा संदूक सिर पर जिसमें धारदार औज़ार सुरक्षित रखे थे और हाथ में पानी और चुना-फिटकरी घोलने के लिए लोहे का डिब्बा।

“तुम्हारे दादा ने ज़मीन तो सही चुनी थी।”, उन्होंने पत्ते और कंकड़ एक तरफ किये और टंगे की मदद से गाय की एक टांग को पास के घुरको दादा के लगाए खूंटे से बाँध दिया।
सूरज भी बादलों से निकल आया था। फंगन बाबा ने अपना संदूक खोलकर उसमे हाथ डाला और मेरी आँखों में सूरज की किरण का परावर्तन गिरा जिससे मेरी आँखें हलकी सी चुंधियाँ गयीं। ऊपर से सूरज की रौशनी पल भर के लिए बंद हुई और मुझे हवा में हलकी सी लेहेर का एहसास हुआ।
“मुझे पता था एक तो आएगा।”, बिना ऊपर देखे फंगन बाबा ने घरती पर पानी की बूँदें बिखेरते हुए कहा।
मैंने धीरे-धीरे ऊपर देखा तो एक गिद्ध अकेला हवा में उड़ रहा था। अगले ही पल वह चमकता छुरा गाय के शव के गले के ऊपर था जो बेहद प्यार से अंदर गया और पूँछ तक एक सीध में फंगन बाबा ने एक चीरा लगा दिया। एक तेज़ गंध मेरी नाक तक पहुंची और मैं तुरंत पीछे की तरफ घूम गया, फिर वापिस उस तरफ मुंह करके मैंने देखा; तो मुझे गाय के अंदर की अंतड़ियाँ दिखीं और एक बीते पल की झलक में मुझे अपने दादा, घुरको राम की झलक दिखी।

साल 1973 था और अभी 2 साल पहले ही हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला था। तब 50 करोड़ गिद्ध भारतवर्ष में हुआ करते थे और चमार और गिद्ध साथ मिल के पर्यावरण के पुनः उपयोगकर्ता और स्वच्छता कर्मी हुआ करते थे। गिद्ध घुरको बाबा को सिग्नल देते और वो पहुँच जाते कीमती चमड़ी निकालने। बाकी का छोड़ देते उन् गिद्धों के लिए; जो उसे चाव से खाते और बहुत सारी बीमारियां फैलने से सबको बचाते।
फंगन बाबा ने अगले चीरे पैरों और गर्दन के पास लगाए। हल्की-हल्की सी बारिश की बूँदें गिरी और पास से ही गिद्धों के चिल्लाने की आवाज़ आयी। गाय के चेहरे और शरीर से चमड़ा ढीला हो गया था।
“घबराओ मत! गिद्धों की शादी हो रही है।” छुरे की नोक से चमड़ा उठाते हुए फंगन बाबा ने कहा और मुझे अंदर मांस दिखा।
घुरको राम के परिवार की कहानी समझने के लिए थोड़ा और पीछे जाते हैं, सन 1950 में। हालांकि कहने को तो घुरको राम आये कुछ किलोमीटर दूर से थे, समाल गांव में, लेकिन तब कोई “उपरला समाल” नहीं हुआ करता था। होते थे तो सिर्फ मुख्य समाल गांव और थलका (निचला) समाल। दोनों में राजपूत रहते थे और कहीं से ये एक घूमते-फिरते चमार घुरको आ गए अपने दो भाइयों, पत्नी, भाभियों और 8 बच्चों के साथ भारत की आज़ादी के लगभग तीन साल बाद। उसको आगे आने वाले जनसँख्या विस्फोट के बारे में कुछ पता नहीं था। उसके लिए हर बच्चा एक संपत्ति था, एक संसाधन इस ज़बरदस्ती के घुमक्कड़ और अछूत ज़िन्दगी के साथ चलते रहने के लिए।
घूमना-फिरना फितरत से ज़्यादा उनकी मजबूरी था क्योंकि एक जगह कोई तभी रुकता है जब उसकी मालिकाना ज़मीन वहां हो। जब ज़मीन ही नहीं; तो फिर आप मुसाफिर ही होते हैं। कभी एक पल यहाँ और फिर एक पल वहां। हर 3-4 साल में एक जगह से दूसरी जगह के लिए निकलना ही पड़ता था, काम या तो रोज़ी-रोटी की तलाश में। लेकिन शायद घुरको राम ने भी नहीं सोचा होगा कि समाल गांव ही उनकी आखिरी मंज़िल बनेगा।
घुरको राम की बात ही कुछ निराली थी। सर पर सफ़ेद पगड़ी। सफ़ेद कुरता। सफ़ेद पायजामा। हाथों और पैरों में घुंघरू ताकि पता चले कि घुरको राम आया है। राजपूतो ने भी रख लिया जैसे पास के नँगड़वां गांव में ब्राह्मणो ने महाशों को रखा था। महाशे या डुमने मूल तौर पर बांस की टोकरियां बनाते, गाजे बाजे बजाते, या तो फिर मज़दूरी करते थे। ज़मींदारों पे काम करना कुछ जंचता नहीं है। महेशों और चमारों के पास ज़मीन तो होती नहीं थी; लेकिन वह काम करने में एकदम चुस्त थे।
घुरको राम चमड़ा बनाके कुछ पैसे कमाते और उनके पाँचों बेटे राजपूतों के खेतों और घरों में मज़दूरी करते और तीन बेटियां अपनी माँ, चिंतो देवी के साथ घर सम्भालती। बदले में शाम को उनको वह एकदम स्वादिष्ट मोटे बाजरे की मीठी और घी लगी रोटी मिलती जो उनकी पुरे दिन की थकान भुला देती। और जिस दिन मज़दूरी नहीं मिलती; उस दिन गेंहू की चपाती के साथ नमक लगाके खाया जाता या तो फिर कोयले से काम चलाया जाता। कोयला या नमक खाने में और कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन वो सब्ज़ी, दाल या मीट से स्वादिष्ट तो नहीं होता था।
चमड़ा एक ही बार में उतर चुका था और ज़मीन पे फैला था। फंगन बाबा ने मुट्ठी भर नमक निकाल के उस खाल पर बिखेर दिया और अच्छे से चमड़े को रगड़ने लगे।
“बहुत खाया होगा न बचपन में। चमार रोटी से रह जाए लेकिन नमक हमारे घर से कभी ख़तम नहीं होता,” चमड़े को चूना मिली पानी की बाल्टी में डालते हुए फंगन बाबा ने कहा।
“उस तरह से गाँधी तो सबसे बड़ा चमार था, नहीं?” मैंने चिल्लम में चरस और तम्बाकू भरकर फंगन बाबा को देते हुए पुछा।
“ऐसे चमारों को क्यों गाली दे रहा है। अच्छा चल अभी जादू दिखाता हूँ।” और खुरपी चमड़े पर जैसे ही चली, चमड़े से बाल ऐसे उखड़ने लगे जैसे कोई उच्च जाती उम्मीदवार का किसी नीची जाती वाले उम्मीदवार को आरक्षण के आधार पर सरकारी जॉब मिलता हुए देख उखड़ता है।
घुरको राम के दोनों बड़े बेटे, ब्यारी और चरणों, दिहाड़ी लगाने जब भी जाते; तो कई-कई बार समाल के राजपूत उनके पीछे 4-5 किलोमीटर तक भी आ जाते थे। और कभी-कभी घर में भी बाहर तक आते थे; कि वह चलते-चलते रुकें या घर से बाहर आएं और उनके पाँव छुएं।
पांव छूना हमें बचपन से सिखाया जाता है, बड़ों का आदर करने के लिए। लेकिन इस मामले में पांव छूने पर इसलिए राजपूत तर्ज़ दे रहे थे क्योंकि वो जताना चाहते थे कि वो बड़े हैं और चमार छोटे ताकि वो अपनी औकात न भूलें।
शायद कोई इंसान उनके पैर छूता था तो उनके अंदर एक उच्चता की भावना आती होगी; जिसका शायद एक अलग मज़ा होता होगा। जैसे शराब हमारे दिमाग पे चढ़ती है और हमें कुछ और बना देती है; ये उच्चता का नशा इंसान को एक अलग किस्म की भावना से भर देता है। क्योंकि अगर कोई 4-5 किलोमीटर तक पीछे चलता रहे सिर्फ इसके लिए; उसके दो मतलब हो सकते हैं – एक तो उसके पास बहुत दौलत है और काम करने की ज़रूरत नहीं है तभी तो फ्री में सिर्फ उच्च दिखने के लिए ऐसा कर रहा है और दूसरा की कोई और नया लक्ष्य नहीं है।

“बीबी! पापा को बोलना की करनैल जी के घर की गाय मर गयी है। उसको उठाना है,” घुरको के तीसरे बेटे प्रकाश ने कहा।
“तू भी जा आज इनके साथ और सीख ले कैसे निकालते हैं चमड़ा।” चिंतो देवी ने चूल्हे में फूंक मारते मारते कहा।
“मुझे आता है माँ लेकिन मुझे दौड़ लगाने जाना है। मेरी सेना की भर्ती है।” प्रकाश ने जवाब दिया।
“नहीं तू चलेगा और तेरे साथ पिरथी (उनका चौथा बेटा) और गैनो भी चलेंगे।” घुरको राम ने चिल्लम में तम्बाकू भरते हुए कहा।
चारो रस्ते में चल रहे थे। घुरको राम आराम से चिल्लम पीते चल रहे थे और चमड़े का झोला उनके शरीर पर था। प्रकाश ने डंडा, गैनो ने संदूक और पिरथी ने बाल्टी पकड़ी थी।
“पापा! क्या ये सच था की पहले हमारे लोगों को गाय उठाने के लिए बिगुल[1] बजाके बुलाया जाता था?” प्रकाश ने पुछा।
घुरको ने उसकी तरफ देखा और कहा “हाँ! क्योंकि वो हमारे घर में नहीं आते थे और जब हम उनके घर से गाय उठा के लेके जाते थे; तो हमें अपने कंधे पे काँटों का झाड़ भी रखना पड़ता था; ताकि हमारे क़दमों के निशान मिट जाएँ और ये पता ना चले कि हमारे कदम भी वहां पड़े थे।”
“लेकिन ऐसा क्यों?” गैनो ने पुछा।
“हाहाहाहा” घुरको राम को चिल्लम का धुआं गले में लगा। खांसते-खांसते और हँसते-हँसते उनकी आँखों में आंसू आ गए।
फंगन बाबा ने चमड़े को इतना खुरचा की उसपे ऊपर कोई बाल नहीं रहा और पूरा चमड़ा एक सफ़ेद झिल्ली जैसा बन गया।
“चल अभी कुछ दिन बाद आना। अभी मैं इसको रस्सी से खींच के हलकी धूप और हवा में अपने घर पे सुखाऊँगा। ले चल, आखिरी दम लगवा”, मुझे माचिस पकड़ाते हुए उन्होंने कहा।
मैंने माचिस जालयी और उसकी संतरी लपट में मुझे उनकी चिल्लम का छेद और उनकी आँखें दिखीं। मैंने जली हुई तीली को चिल्लम के मुंह पे लगाया। उन्होंने खींचा हुआ पूरा धुआं अपने नथुनों से निकाला और चले गए।
समाल में समय बीत रहा था और चिंतो देवी, मेरी दादी फिर से पेट से थी। बात 1961 की थी और बस थोड़े ही महीनो में एक और बेटा पैदा हो गया और उसका नाम रखा गया आणसो। समाल गांव में पैदा हुआ पहला चमार बच्चा क्योंकि बाकी सब घुरको दादा के साथ आये थे। देखते-देखते वह 7 साल का हो गया।
“इसको कब से भेज रहे हो हमारे खेत में। ये भी तो अपने भाइयों से सीखे।”, दवान (उसी गाँव का एक राजपूत दुकानदार) ने पुछा।
[1] बिगुल – एक पीतल या काँसे का बना फूँकने वाला वाद्य यंत्र होता है जिसे होंठों से हवा फूँककर बजाया जाता है। खासतौर पर जब कोई आदेश देना हो।
“तू ही बता कब से जाएगा?” घुरको ने आणसो को देखते हुए पुछा।
“मैं स्कूल जाना चाहता हूँ” आणसो ने शर्माती आँखों से अपने पापा को पुछा।
वहां पे 2 मिनट के लिए शान्ति हो गयी जैसे की कोई मर गया हो और शायद कुछ तो मरा ही था। चमारों के बच्चों में से किसी ने ऐसी बात कह दी थी जो पहले कभी नहीं कही गयी थी समाल मेँ।
“हाँ हाँ क्यों नहीं। स्कूल तो जैसे यहीं दो कदम पे ही है।”, दवान ने एक कटाक्ष कसा।
“अरे पढ़ने दो अगर कह रहा है तो।”, घुरको दादा ने जवाब दिया।
आणसो ने स्कूल जाना शुरू कर दिया और उसका मुकाबला पढाई के मामले में अक्सर कृष्ण (समाल गांव का एक और राजपूतों का पढ़ाकू लड़का) से होता था। कृष्ण ज़्यादातर अव्वल आ जाता था लेकिन एक बार आणसो प्रथम आ गया। तो कृष्ण के पिता स्कूल में आ गए ये पूछने कि आपने कैसे उनके लड़के को ज़्यादा नंबर दे दिए। फिर स्कूल वालों ने उन्हें समझाया कि ये तो उनकी मेहनत का परिणाम है। जिसने जैसे पेपर लिखा है, उसको वैसे ही नंबर मिले हैं। खैर कृष्ण के पिता कुछ कह तो नहीं पाए, लेकिन एक घबराहट का माहौल पहली बार बना था जिसमे चमार लड़का राजपूत या ब्राह्मण लड़कों से अव्वल आया था।
पढाई लिखाई के अलावा स्कूल में पहनावा भी देखा जाता है। वहां छोटे कस्बों के और भी बच्चे आते थे और आणसो को उनके जैसे यूनिफार्म पहनने का मन करता था। क्योंकि कमीज-पायजामे में वह बाकी छात्रों से अलग दिखता था और अलग दिखना कभी-कभी अच्छी बात है लेकिन इस मामले में नहीं। उसने बहुत जुगाड़ लगाने की कोशिश की। बूढ़े से माँगना अच्छा नहीं लगता था क्योंकि फिर शायद घुरको राम उनका स्कूल छुड़वा देते खर्चे के नाम पर। अगर दिहाड़ी लगानी पड़ती तो फिर स्कूल नहीं हो पाता। कहीं न कहीं पैसे की कमी यहाँ पर आणसो को खाल रही थी जिसमे वो अपनी यूनिफार्म तक का वहन नहीं कर सकता था।
एक दर्ज़ी की दुकान पड़ती थी रास्ते में; जिसमे उसे रोज़ वर्दियां लटकी हुईं दिखती। वो रोज़ उनको देखता और अपने आप को उसमे काल्पनिक तौर पे देखता कि वो कितना अच्छा दिखता उसमें और क्लास के सब बच्चे उसको देख रहे हैं लेकिन प्रशंसा से नाकि हीन भावना से। वह खाकी पैंट उसे कैसे भी चाहिए थी और फिर एक दिन उसे मौका मिल ही गया।
दर्ज़ी शायद पास के घर से पानी लेने गया था। आणसो ने थोड़ी देर सोचा और जल्दी से दुकान में घुस कर पेण्ट उठा ली और भाग कर घर आ गया। अगले दिन जब उठा, वह एक नया इंसान बन चूका था। पहली बार उसने वो खाकी पैंट पहनी और स्कूल गया। दर्ज़ी को तो पता चल ही गया था और शाम को उसको पता था की उसकी बहुत धुलाई होने वाली है। लेकिन उस दिन उसने पहली बार एक चाहत को मंज़िल में बदल के हासिल किया था और इसीलिए उसे कोई मलाल नहीं था।
शाम को उसके बड़े भाई ब्यारी से उसे बहुत मार पड़ी लेकिन आणसो को तो जैसे कुछ महसूस ही नहीं हो रहा था। और ये जो नशा उसे महसूस हो रहा था; वो पहली बार देसी तम्बाकू के नशे से भी ज़्यादा अच्छा था। उसने एक ऐसी दुनिया को महसूस कर लिया था; जिससे वो वापिस मज़दूरी में कभी कदम नहीं रख सकता था। और वहां से चमड़ा बंद हुआ और किताबें खुलनी शुरू ऐसी हुईं कि वो बाकी सब भूल गया।
“ये पागल हो जाएगा। इसका दिमाग ख़राब हो जाएगा।” दवान आके ऐसे बातें करते रहता और घुरको राम हँसके टाल देते।
लेकिन धीरे-धीरे एक अपना मालिकाना घर और ज़मीन होने की इच्छा सब में बनने लगी थी। आखिर कब तक ये चलता रहता। इतने बड़े परिवार का कुछ तो सुरक्षित भविष्य होना चाहिए। फिर एक बार पास के गांव में घुरको राम और उनके परिवार ने जाटों की एक ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया और उस समय तक घुरको राम और उनके 8 बेटों की एकता से आसपास के गांव वाले बहुत डरते थे क्योंकि अगर किसी ने हाथ भी लगा दिया; तो वो सब पहुँच जाते थे।
फिर क्या, जाटों ने समाल गांव के राजपूतों में से एक काला जादू जानने वाले की मदद मांगी और उस ने आणसो पे ही अपना जादू किया क्योंकि वही कुछ ऐसा कर रहा था जो चमारों के खानदान में और कोई कर नहीं रहा था। आणसो को अक्सर पेट में दर्द रहने लगा और वो उसी के पास उसे ठीक करने के लिए लेके जाने लगे जिसने उसे काला जादू किया था। वह आणसो के पेट पे हाथ फेरता और कहता, “जाओ ठीक हो जाएगा।” लेकिन कुछ फरक नहीं पड़ता। धीरे-धीरे घुरको राम और उसके बेटों को पता चल गया की वही काले जादू वाला आणसो पर जादू कर रहा है। फिर उन्होंने उसको धमकाना शुरू किया और काला जादू जानने वाले को अपनी सलामती के लिए आणसो को ठीक करना पड़ा।
उसी समय 1975 में सरकार ने लोगों को ज़मीन के पट्टे देना शुरू किया और उस वजह से घुरको राम और उसके पांच बड़े बेटों को उनकी ज़मीने मिलीं और उन्होंने पुरानी जंगली ज़मीन छोड़ कर अपने मालिकाना ज़मीन में अपने घर बनाना शुरू किया। मज़दूर अब जमींदार बन गए थे और कोयले और नमक से गेंहू की रोटी खाने वाले दिन ख़तम हो गए थे।
इस तरह से उपरला समाल बसा- समाल गांव का तीसरा भाग। आणसो अब और सशक्त और जागरूक हो गया था। अपनी ग्रेजुएशन ख़तम करके वह स्कूल में शास्त्री मास्टर बन गया और कलम की शक्ति को समझ गया था। आस पास के लोग जब भी पास से जाते तो कहते, “माराज मास्टरजी।”

उसने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को पत्र लिख के गांव में बिजली, पानी और रास्तों को बहाल करवाया और गांव की हर छोटी बड़ी समस्या को सरकार तक पहुंचाने लगा। हालांकि गांव के खुद की जाति के लोग उनकी अच्छे से इज़्ज़त तो करते लेकिन उसके पीछे का कारण कृतज्ञता की जगह स्वार्थीपन ज़्यादा था। काफी ऐसे काम जिसके लिए उन्हें श्रेय मिलना चाहिए था, खुले तौर पर किसी ने नहीं दिया। उसके पीछे ज़्यादातर कारण दिखता है कि किसी उच्च जाती वाले ने नहीं किया तो इसको दबा देना चाहिए।
लेकिन आणसो ने कभी इन सब चीज़ों का श्रेय माँगा भी नहीं क्योंकि उसकी सोच असली बदलाव लाना था, नाकि उसका श्रेय लेना।
खैर बाकियों की तरह उसकी भी शादी हो गयी और धीरे-धीरे दो बच्चे हो गए। समय का पहिया घुमते-घुमते आणसो और लीलो के बेटे मनु और बेटी तनु को इस दुनिया में ले आया था। वो दोनों बड़े हो रहे थे और सन था 2000।
“अच्छा आज शाम को लाल अंकल के घर में धाम है।”, लीलो ने मनु से कहा।
“ठीक है मम्मी”,
“अरे चल जल्दी। देर हो जायेगी।” बाहर से बीणू ने आवाज़ दी।
“हाँ आया।” मनु ने जल्दी-जल्दी दाल का डिब्बा और एक गमछा उठाते हुए कहा।

बीणू गैनो ताऊ का छोटा बेटा था और मनु का गांव में घनिष्ठ मित्र था। दोनों अपने ताऊओं और चाचाओं के लड़कों के साथ लाल अंकल के घर में गए। बाकी सारे लोग खाना खा रहे थे धाम में नीचे बैठ कर। ये सब भी अलग से घर के बाहर पीछे की तरफ बैठ गए। क्योंकि कोई भी दलित उनकी धाम साथ में बैठ कर नहीं खा सकता था। थोड़ी देर में खाना परोसने वाले आये और चावल गमछे में भर दिए और डालें डिब्बे में दाल दी। सब बच्चे फिर से खाना लेकर ख़ुशी-ख़ुशी घर की तरफ चल दिए।
समय आगे बढ़ता गया। अब 2025 आ गया था। मनु और तनु बड़े हो चुके थे और दूसरे राज्यों में पढाई करके तनु कॉलेज में प्रोफेसर और मनु एक छोटा उद्यमी और कहानीकार बन चुका था। अभी वापिस आकर वो सबको एक साथ खाना खाते देखते थे और समझते थे की गमछा और डिब्बा लेके जाने का और धाम में अंदर न खाने का क्या मतलब था।
विश्वकर्मा दिवस पर चमारों, राजपूतों और ब्राह्मणों की धाम अभी भी अलग होती हैं।
कुछ अच्छे लोग उस तरफ भी थे और कुछ अच्छे लोग इस तरफ। लेकिन अंतर अभी भी एक सोच के रूप में कहीं न कहीं दिखता था। अब बस उच्च जाति से कोई ये बातें नहीं करता था, लेकिन एक आंतरिक भारीपन और दबा हुआ गुस्सा कहीं महसूस होता है। यह उस तरह से महसूस कर सकते हैं कि कहीं ज़्यादा शामिल नहीं किया जाता है। सब लोग अपना अपना कर रहे हैं। कोई मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश या पहल नहीं है। शायद उच्च जातियों का ये आंतरिक गुस्सा एक बदलाव का हिस्सा हो सकता है या फिर एक आग लगने से पहले की थमी हुई सांस, ये तो वक़्त ही बतायेगा।
किताब की ताकत ने दुनिया में तो एक हैसियत बना दी थी लेकिन आस-पास के लोगों के नज़र में अभी भी घुरको राम और उनका परिवार चमारों का परिवार था। उपरले समाल के चमारों की आपस में भी जो कभी एकता थी वो धीरे-धीरे समय के साथ अपने आप कम होती गयी। आज ये गांव के चमार भी खुद आपस में इतने ज़्यादा बंटे हुए हैं कि ऐसा लगता है जैसे इनके अंदर एक अलग तरह का जातिवाद चल रहा हो। शायद ये सोच और ऐसा बिखरता विचार भारतियों के मन में इतना ज़्यादा भरा है कि उनके डीएनए में शामिल हो गया है। हम शायद कभी न तो एक थे और न ही कभी होंगें। और शायद यही हमारे देश का एक यथार्थ है।
“आज का हमारा कार्यक्रम ‘व्यवस्था बड़ी या नियम – आइये जानें!’ आप सब को कैसा लगा?” मनु ने स्कूल के बच्चों को अपने एक कार्यक्रम के अंत में पूछा।
“बहुत अच्छा”, सब बच्चों ने एक साथ कहा। मनु अपनी एक कहानीकार फ़ेलोशिप के अंतर्गत ये कार्यक्रम अनीता और अनीता के बहन, रेखा के साथ कर रहा था। कार्यक्रम में छठीं से आठवीं तक के 30 बच्चों ने भाग लिया औऱ उनमें एक रिश्तेदार का बेटा भी था।
“बाय सर!. बाय मैम!” बच्चे हमें जाते हुए हाथ हिला रहे थे।
“हमें बहुत अच्छा लगा। आप लोग बहुत अच्छे हो। हम फिर से आपके साथ खेलेंगें। ” एक बच्ची ने कहा।
“इतना क्या वाह-वाही कर रहे हो। वो लोग भी मेरी तरह चमार ही हैं।” रिश्तेदार के बेटे ने ज़ोर से उनको कहा।
जब खुद उसे कभी सराहना नहीं मिली, तो अपनी ही हीन भावना के कारण वह किसी और चमार की प्रशंसा भी बर्दाश्त नहीं कर पाया।
शाम का सूरज निकल आया था। बादल अभी भी हल्के-हल्के थे, लेकिन समाल का सूर्यास्त हमेशा की तरह अभी भी सुन्दर था।

“फंगन बाबा! बन गया क्या?”
“वही कर रहा हूँ। ३-4 दिन उसको अच्छे से पीस के वहां पत्थरों के नीचे दबा के रखा था। बस कल ही इसको समतल करके इस्पे तेल की मालिश करके चिकने पत्थर पर रगड़ा था। आजा देखते हैं। लेकिन तू लिखेगा किस से?”
फंगन बाबा ने मुझे चमड़े का पेपर देते हुए कहा।
मैंने अपने झोले से मोर पंख और स्याही निकाली और पहले पन्ने पे लिखा।

मैंने मुड़ कर पीछे देखा तो फंगन बाबा धीरे-धीरे धुएं में बदलते दिख रहे थे। उसी धुएं में उनका पुराने स्लेट वाला घर दिखा। वो जवान थे और अपनी चिलम पी रहे थे। पास में ही उनकी पत्नी चूल्हे में फूंक मार रही थी और बच्चे खेल रहे थे।
“घुरको घुरको! “
“हाँ पापा!”
“जा भाग के अपनी माँ के चूल्हे से कोयला ले आ।”
“जी पापा।”घुरको राम बढ़िया सा कोयला चूल्हे में से लेकर आया।
फंगन बाबा ने कोयला चिलम में रख कर के कश खींचा और उसी समय एक बिगुल की आवाज़ सुनाई दी।
“चलो बेटा! समय हो गया। किसी ब्राह्मण की गाय मर गयी है।”
फंगन बाबा ने अपना सामान उठाया और बिगुल की आवाज़ की और चल पड़े।
थोड़ा आगे पहुँच कर उन्होनें मेरी तरफ पीछे मुड़ कर देखा और मेरे आंसू की एक बूँद टप से मेरी किताब पर पड़ी। उनके चेहरे पर एक मुस्कराहट आयी और वो वापिस आगे चल दिए।