एक लोक संगीतकार की यात्रा

कहानीकर्ताः अदित नेगी
हिमल प्रकृति फेलो
गांव कूपा, कामरू पंचायत, किन्नौर जिला,
हिमाचल प्रदेश
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किन्नौरी लोक संगीत की अनंत धुनों के पीछे एक ऐसे व्यक्ति की कहानी छिपी है जिसकी आवाज़ कभी इन घाटियों में गूंजा करती थी। कूपा, कमरू केस्व-शिक्षित संगीतकार श्री सतीश चंद्र नेगी ने 80 और 90 के दशक में किन्नौरी संगीत को एक नया स्वर दिया, जिसमें पारंपरिक धुनों को आधुनिक रंगोंके साथ पिरोया गया। उनके गीत जीवन की नश्वरता, बदलते समय और ‘फायुल’ (मातृभूमि) के प्रति गहरी लालसा से भरे हुए थे, जो एक पूरी पीढ़ी कीधड़कन बन गए।

इस आत्मीय बातचीत में वे अपने पहाड़ी जीवन से शहर के जीवन तक की यात्रा साझा करते हैं, एक ऐसा बदलाव जिससे वे कभी पूरी तरह सहज नहीं होपाए, और बताते हैं कि संगीत उनके लिए कैसे सहारा बना। वे अपनी बहन श्रीमती मयूम नेगी के साथ कैसेट रिकॉर्ड करने के अनुभवों और अपने गीतों केपीछे की कहानियों को याद करते हैं। संगीत उनका पेशा कभी नहीं बन सका, फिर भी उनके बनाए गीत आज भी किन्नौर की फिज़ाओं में गूंजते हैं, त्यौहारों, शादियों और मेलों में लोग आज भी उन पर गाते और नाचते हैं।
यह फ़िल्म उन गीतों के पीछे छिपे जीवन को सामने लाती है, यादों, दृढ़ता और एक ऐसे कलाकार की शांत विरासत का चित्र जो अपने पहाड़ों कोआवाज़ देना चाहता था। यह मेरे प्रयास का हिस्सा है कि उन अनकहे गीतों और उनके रचयिता की कहानी को दस्तावेज़ किया जाए जो आज भी किन्नौरमें गूंजती है।

